धर्म का राजनीतिक कारोबार: आस्था, भीड़ और सत्ता का गठजोड़

धार्मिक आयोजनों का राजनीतिक प्रचार और पर्यटन के नाम पर विस्तार बढ़ती भीड़, दुर्घटनाओं और पर्यावरणीय क्षति का जोखिम बढ़ा रहा है।
Editorial Analysis
Published: October 18, 2026 | Editor in Chief
The Political Business of Religion: Crowds, Safety & Power

Abstract: Religious gatherings in India are increasingly shaped by political promotion, tourism development and revenue generation. From the Kumbh Mela and Ram Mandir to the Ambubachi Mela, the growing public visibility of major religious destinations raises critical questions about crowd safety, political accountability and environmental sustainability. When governments promote religious events as symbols of cultural pride and political achievement, attracting larger crowds can become an objective in itself, often placing additional pressure on infrastructure and fragile ecosystems. This editorial argues that religious development must be guided by scientific crowd management, environmental safeguards and transparent accountability. Political prestige and economic gains cannot justify putting human lives and nature at risk.

Keywords: Religious crowd disasters, political use of religion, India religious tourism, Kumbh Mela crowd management, temple tourism, environmental impact of mass gatherings, government accountability.

कोलकता दुर्गापूजा पांडाल में भगदड़ से 17 की मौत

धर्म का राजनीतिक कारोबार: आस्था, भीड़ और सत्ता का गठजोड़ भारत में धार्मिक आयोजनों के दौरान भीड़ दुर्घटनाएँ अब केवल प्रशासनिक विफलता का प्रश्न नहीं रह गई हैं। दुर्गापूजा के अवसर पर कोलकाता, पश्चिम बंगाल में सामने आई ताजा घटना एक व्यापक प्रवृत्ति की ओर ध्यान खींचती है—धार्मिक आयोजनों का लगातार विस्तार, उनका राजनीतिक प्रचार और पर्यटन एवं राजस्व से जुड़ती उनकी अर्थव्यवस्था।

समस्या धार्मिक आस्था या श्रद्धालुओं की संख्या नहीं है। समस्या उस व्यवस्था में है, जो अधिकाधिक लोगों को आकर्षित करने को उपलब्धि मानती है, लेकिन स्थान की सुरक्षित क्षमता, पर्यावरणीय सीमाओं और मानवीय जोखिमों को उसी प्राथमिकता से नहीं देखती।

जब सत्ता स्वयं किसी धार्मिक आयोजन की लोकप्रियता बढ़ाती है, तो वह उससे उत्पन्न जोखिमों की जिम्मेदारी से बच नहीं सकती।
जब सत्ता स्वयं किसी धार्मिक आयोजन की लोकप्रियता बढ़ाती है, तो वह उससे उत्पन्न जोखिमों की जिम्मेदारी से बच नहीं सकती।

आस्था का राजनीतिक विस्तार

भारत में गाँवों, कस्बों और नगरों के असंख्य देवस्थान, मंदिर और पारंपरिक मेले धार्मिक जीवन के स्थानीय केंद्र रहे हैं। लेकिन धर्म जब राजनीतिक शक्ति और जनसमर्थन के प्रदर्शन का माध्यम बनता है, तो कुछ बड़े आयोजन असाधारण सार्वजनिक महत्त्व प्राप्त करने लगते हैं।

कुंभ, राम मंदिर और असम के कामाख्या मंदिर में आयोजित अंबुबाची मेले जैसे आयोजनों को व्यापक सार्वजनिक चर्चा, सरकारी प्रचार और पर्यटन संबंधी पहलों में प्रमुखता मिलती है। इनके धार्मिक महत्त्व से इनकार नहीं किया जा सकता। प्रश्न यह है कि जब धार्मिक आयोजनों को सरकारी उपलब्धियों, सांस्कृतिक गौरव और राजनीतिक प्रतिष्ठा से जोड़ा जाता है, तब उनकी सफलता का पैमाना क्या बनता है?

विशाल आयोजन, श्रद्धालुओं की संख्या और व्यापक प्रचार राजनीतिक नेतृत्व के लिए जनसमर्थन प्रदर्शित करने के माध्यम बन सकते हैं। धार्मिक स्थल भी सार्वजनिक विमर्श में आस्था के केंद्र के साथ-साथ राजनीतिक पहचान के प्रतीक बन जाते हैं।

इस प्रक्रिया में एक विरोधाभास है। सत्ता आयोजन की लोकप्रियता बढ़ाने में सक्रिय रहती है, लेकिन उससे उत्पन्न भीड़, यातायात, सुरक्षा और पर्यावरणीय दबाव का प्रबंधन अक्सर अलग प्रशासनिक विषय मान लिया जाता है।

धर्म का राजनीतिक लाभ उठाने की आकांक्षा यदि भीड़ बढ़ाती है, तो उस भीड़ की सुरक्षा सुनिश्चित करना भी राजनीतिक उत्तरदायित्व का हिस्सा होना चाहिए।

देवस्थान से पर्यटन और राजस्व तक

धार्मिक स्थलों का सुन्दरीकरण और श्रद्धालुओं के लिए सुविधाओं का विकास आवश्यक हो सकता है। लेकिन जब विकास का मुख्य उद्देश्य अधिक पर्यटक आकर्षित करना, आर्थिक गतिविधियाँ बढ़ाना और राजस्व अर्जित करना बन जाता है, तब धार्मिक स्थल की सफलता भी आगंतुकों की संख्या से मापी जाने लगती है।

सड़कें, पार्किंग, होटल, व्यावसायिक प्रतिष्ठान और अन्य सुविधाएँ पर्यटन को विस्तार देती हैं। इससे स्थानीय रोजगार और कारोबार के अवसर पैदा हो सकते हैं, लेकिन अनियंत्रित विस्तार भूमि, जलस्रोतों, यातायात और प्राकृतिक आवासों पर दबाव भी बढ़ाता है।

यहाँ नीति का मूल प्रश्न है: क्या किसी धार्मिक स्थल की वहन-क्षमता निर्धारित किए बिना अधिकाधिक पर्यटकों को आकर्षित करना उचित है? यदि सरकारी प्रचार से आगंतुकों की संख्या बढ़ती है और पर्यटन से आय की अपेक्षा की जाती है, तो उस विस्तार की सुरक्षा एवं पर्यावरणीय लागत का आकलन भी अनिवार्य होना चाहिए। अन्यथा लाभ का मूल्यांकन आर्थिक आँकड़ों से होगा, जबकि भीड़ दुर्घटनाओं, प्रदूषण, कचरे और प्राकृतिक संसाधनों की क्षति की कीमत स्थानीय समाज चुकाएगा।

भीड़ की उपलब्धि, दुर्घटना की जवाबदेही

बड़ी भीड़ अपने आप में धार्मिक आस्था की गहराई का प्रमाण नहीं है। फिर भी, राजनीतिक प्रतिष्ठा और पर्यटन की अर्थव्यवस्था मिलकर अधिकाधिक लोगों को आकर्षित करने का प्रोत्साहन पैदा कर सकती हैं। जब आयोजन की लोकप्रियता बढ़ाने पर जोर हो, लेकिन उसकी सुरक्षित क्षमता के अनुरूप व्यवस्था न हो, तब जोखिम बढ़ना स्वाभाविक है।

भीड़ दुर्घटनाएँ अपरिहार्य नहीं होतीं। वैज्ञानिक क्षमता-निर्धारण, नियंत्रित प्रवेश, पर्याप्त निकास मार्ग, प्रशिक्षित सुरक्षा बल, चिकित्सा सुविधाएँ और आपातकालीन योजना अनेक हादसों को रोक सकती हैं। इसके लिए आयोजन की अनुमति से लेकर उसके समापन तक आयोजकों और प्रशासन की जिम्मेदारियाँ स्पष्ट होनी चाहिए।

सरकार यदि किसी आयोजन का व्यापक प्रचार करती है, तो उसे यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि कितने लोगों के लिए व्यवस्था की गई है, संभावित जोखिमों का आकलन कैसे हुआ है और सुरक्षा मानकों के उल्लंघन पर जवाबदेही किसकी होगी। राजनीतिक प्रतिष्ठा के कारण निर्धारित क्षमता से अधिक लोगों को प्रवेश देने या सुरक्षा संबंधी निर्णयों में हस्तक्षेप करने की कोई गुंजाइश नहीं होनी चाहिए।

आस्था की कीमत प्रकृति क्यों चुकाए?

धार्मिक पर्यटन का प्रभाव आयोजन स्थल तक सीमित नहीं रहता। सड़क और निर्माण विस्तार, जल की बढ़ती खपत, ठोस कचरा, प्लास्टिक, ध्वनि प्रदूषण और प्राकृतिक आवासों पर दबाव दीर्घकालीन समस्याएँ पैदा कर सकते हैं।

कुंभ जैसे विशाल समागमों में नदी की पारिस्थितिकी, जल गुणवत्ता और अपशिष्ट प्रबंधन विशेष महत्त्व रखते हैं। इसी तरह, कामाख्या पहाड़ी जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में पर्यटन और निर्माण संबंधी निर्णय स्थानीय पर्यावरण की सीमाओं को ध्यान में रखकर किए जाने चाहिए।

इसलिए पर्यावरणीय मूल्यांकन केवल आयोजन के दिनों तक सीमित नहीं होना चाहिए। स्थायी निर्माण, बढ़ते यातायात और पर्यटन सुविधाओं के दीर्घकालीन प्रभावों को भी इसमें शामिल करना आवश्यक है। विकास का अर्थ प्रकृति को असीमित संसाधन मान लेना नहीं हो सकता।

निष्कर्ष: प्रचार की जिम्मेदारी भी सत्ता की

धार्मिक आयोजनों का सम्मान और उनका सुरक्षित संचालन परस्पर विरोधी नहीं हैं। विरोधाभास तब पैदा होता है, जब भीड़ राजनीतिक प्रतिष्ठा और आर्थिक आय का साधन बनती है, लेकिन उसकी सुरक्षा तथा पर्यावरणीय लागत को गौण मान लिया जाता है।

सरकार का दायित्व केवल धार्मिक स्थलों का सुन्दरीकरण या आयोजनों का प्रचार करना नहीं, बल्कि उनकी सुरक्षित क्षमता निर्धारित करना, पर्यावरणीय सीमाओं की रक्षा करना और सार्वजनिक संसाधनों के उपयोग में पारदर्शिता सुनिश्चित करना भी है। धार्मिक आयोजनों को राजनीतिक लाभ के लिए बढ़ावा देने वाली सत्ता उनकी विफलताओं से स्वयं को अलग नहीं रख सकती।

आस्था नागरिक का अधिकार है, भीड़ जुटाना सत्ता की उपलब्धि हो सकती है, लेकिन जीवन और प्रकृति की रक्षा उसका अनिवार्य दायित्व है।

धर्म की प्रतिष्ठा भीड़ की विशालता से नहीं, मनुष्य और प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता से तय होनी चाहिए।

Dr. R. Achal Pulastey

Dr. R. Achal Pulastey

Editor-in-Chief, Eastern Scientist

A multifaceted scholar with a keen insight into—and a research focus on—socio-cultural, folkloric-literary, economic, geopolitical dynamics, and Ayurveda.

ORCID iD ORCID: 0009-0002-8240-2689

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