Current Affairs
Date : 25 January 2026
Author : Achal Pulastey
देश हित का महत्वपूर्ण फैसला-यूजीसी,
शंकराचार्य जैसे गैर जरूरी शोर में दब
गया।
भारत और यूरोपीय संघ (EU) के बीच प्रस्तावित मुक्त व्यापार समझौता (FTA),
जिसे ब्रॉड-बेस्ड ट्रेड एंड इन्वेस्टमेंट एग्रीमेंट (BTIA) कहा जाता है, आज भारत की घरेलू अर्थव्यवस्था के लिए एक निर्णायक
मोड़ के रूप में उभर रहा है। यह समझौता केवल आयात–निर्यात शुल्क घटाने का
दस्तावेज़ नहीं, बल्कि उत्पादन
संरचना, रोज़गार, कृषि, स्वास्थ्य और नीति-स्वायत्तता को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करने वाला
आर्थिक–राजनीतिक हस्तक्षेप है।
यूरोपीय संघ विकसित अर्थव्यवस्थाओं का समूह है,
जहाँ उच्च सब्सिडी, तकनीकी बढ़त और पूँजी-सघन उत्पादन व्यवस्था
मौजूद है। इसके विपरीत, भारत की
घरेलू अर्थव्यवस्था आज भी बड़े पैमाने पर कृषि, असंगठित क्षेत्र, लघु एवं मध्यम उद्योगों तथा श्रम-प्रधान उत्पादन पर
आधारित है। ऐसे में दोनों के बीच मुक्त व्यापार की अवधारणा स्वभावतः असमान धरातल
पर खड़ी दिखाई देती है।
FTA के तहत यूरोपीय संघ ऑटोमोबाइल,
डेयरी, वाइन–स्पिरिट्स और औद्योगिक उत्पादों पर टैरिफ में
भारी कटौती की माँग कर रहा है। ये क्षेत्र भारत की घरेलू अर्थव्यवस्था के
संवेदनशील स्तंभ हैं। विशेष रूप से डेयरी और कृषि क्षेत्र करोड़ों छोटे किसानों की
आजीविका से जुड़े हैं। यूरोपीय कृषि उत्पाद भारी सरकारी सब्सिडी के साथ आते हैं,
जबकि भारतीय किसान पहले से ही लागत,
कर्ज़ और बाज़ार अस्थिरता से जूझ रहे
हैं। ऐसी स्थिति में बाज़ार का खुलना घरेलू उत्पादन को कमजोर कर सकता है।
भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए सबसे गंभीर
प्रश्न बौद्धिक संपदा अधिकारों (IPR) से जुड़ा है। यूरोपीय संघ द्वारा प्रस्तावित TRIPS-plus प्रावधान भारतीय जेनेरिक दवा उद्योग को
प्रभावित कर सकते हैं, जो न केवल
भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था का आधार है, बल्कि वैश्विक दक्षिण के लिए सस्ती दवाओं का प्रमुख स्रोत भी है। पेटेंट
संरक्षण को सख़्त करना दवा की कीमतों में वृद्धि और सार्वजनिक स्वास्थ्य पर
अतिरिक्त बोझ डाल सकता है—जिसका सीधा असर आम नागरिक पर पड़ेगा।
सेवा क्षेत्र में भारत को IT और पेशेवर सेवाओं में अवसर की बात कही जाती है,
किंतु व्यवहार में यूरोपीय बाज़ार वीज़ा
नियमों, डेटा संरक्षण कानूनों और
पेशेवर मान्यता जैसी शर्तों के माध्यम से अपेक्षाकृत बंद रहता है। इस असंतुलन में
घरेलू रोज़गार सृजन की संभावनाएँ सीमित हो जाती हैं, जबकि विदेशी कंपनियों के लिए भारतीय बाज़ार अधिक खुला
होता है।
इसके अतिरिक्त, श्रम और पर्यावरण मानकों को व्यापार समझौते से जोड़ने
की यूरोपीय नीति भारत की घरेलू अर्थव्यवस्था पर दबाव डालती है। हालाँकि सतत विकास
एक आवश्यक लक्ष्य है, लेकिन इन
मानकों का प्रयोग कई बार गैर-टैरिफ अवरोध के रूप में होता है, जो विकासशील देशों की औद्योगिक नीति और
सामाजिक यथार्थ को अनदेखा करता है।
अतः भारत–यूरोपीय संघ एफटीए को घरेलू
अर्थव्यवस्था के संदर्भ में केवल अवसर के रूप में नहीं, बल्कि संरचनात्मक जोखिम के रूप में भी देखे जाने की
आवश्यकता है। भारत के लिए यह अनिवार्य है कि वह मुक्त व्यापार की शर्तों पर नहीं,
बल्कि संतुलित, न्यायसंगत और विकासोन्मुख व्यापार की शर्तों पर वार्ता
करे। अन्यथा, यह समझौता घरेलू
उत्पादन, रोज़गार और आर्थिक
आत्मनिर्भरता को कमजोर करने वाला सिद्ध हो सकता है।
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