Public Discourse
Date : 18 March 2026
Author : Achal Pulastey
काशी के शताब्दी-पुरातन आयुर्वेद संकाय का “बीएचयू की दौड़ में पीछे छूटना” कोई आकस्मिक घटना नहीं, बल्कि हमारी नीतिगत दृष्टिहीनता का प्रत्यक्ष परिणाम है। यह केवल एक संस्थान की पीड़ा नहीं, बल्कि उस सभ्यता-बोध का क्षरण है जिसने कभी शरीर, प्रकृति और चेतना के संतुलन को चिकित्सा का आधार बनाया था। आज वही परंपरा अपने ही घर में उपेक्षा की शिकार है—और हम विकास के इश्तिहारों में उसकी उपलब्धियाँ खोज रहे हैं।
आयुर्वेद को हमने सम्मान के शब्द तो दिए, पर अधिकार का स्थान नहीं। उसे “वैकल्पिक” कहकर हमने अपने ही ज्ञान-वृक्ष की जड़ों को काटने का काम किया। विडंबना देखिए—जिस देश ने आयुर्वेद को जन्म दिया, वहीं उसे प्रमाणपत्रों और अनुमोदनों की कतार में खड़ा कर दिया गया। क्या यह केवल प्रशासनिक भूल है, या एक गहरी वैचारिक पराजय? सरकार का रवैया इस पूरे परिदृश्य में सबसे अधिक प्रश्नों के घेरे में है। एक ओर हर वर्ष नए आयुर्वेद संस्थानों की घोषणाएँ—भव्य भवन, चमकदार उद्घाटन, और मीडिया में “स्वर्णकाल” की छवियाँ; दूसरी ओर उत्तर प्रदेश सहित अनेक राज्यों में दशकों से रिक्त पड़े फैकल्टी पद, न नियुक्ति, न पदोन्नति। बिहार, जहाँ कभी पाँच सरकारी आयुर्वेद कॉलेज ज्ञान के केंद्र थे, आज दो पर सिमट चुका है। यह विकास नहीं, संस्थागत क्षरण का क्रम है—बस उसकी पैकेजिंग बदल दी गई है।निजी क्षेत्र में आयुर्वेद कॉलेजों का “मशरूमिंग” इस संकट को और गहरा करता है। हर वर्ष हजारों स्नातक निकलते हैं, पर जमीन पर आयुर्वेदिक चिकित्सक दुर्लभ होते जा रहे हैं। शहरों में सैकड़ों पंजीकृत डिग्रियाँ हैं, पर उपचार कक्षों में आयुर्वेद की उपस्थिति नगण्य। यह विरोधाभास बताता है कि हमने शिक्षा को उत्पादन बना दिया है, साधना नहीं। डिग्री है, पर अभ्यास नहीं; संख्या है, पर सार नहीं।
विज्ञापनों में आयुर्वेद का स्वर्णकाल चमकता है, पर वास्तविकता में वह संक्रमणकाल से गुजर रहा है। संसाधनों, परंपरा और वैश्विक प्रतिष्ठा के बावजूद बीएचयू के आयुर्वेद संकाय को “आयुर्वेद एम्स” का दर्जा न मिलना केवल प्रशासनिक उदासीनता नहीं, बल्कि प्राथमिकताओं की विकृति है। यह वही संस्थान है जिसने विश्व को अनेक शीर्ष आयुर्वेदाचार्य दिए—पर आज वही अपने अस्तित्व की स्वायत्तता के लिए संघर्षरत है।
मूल प्रश्न यह है कि क्या हम आयुर्वेद को वास्तव में विकसित करना चाहते हैं, या केवल उसका प्रतीकात्मक उत्सव मनाना चाहते हैं? यदि विकास लक्ष्य है, तो संस्थानों को स्वायत्तता, शोध को स्वतंत्रता और शिक्षकों को सम्मान देना होगा। साथ ही, ऐसे स्नातकों का निर्माण भी करना होगा जो आयुर्वेद को जमीन पर जीएँ—केवल डिग्रीधारी न हों, बल्कि चिकित्सक बनें। इसके लिए आर्थिक सुरक्षा, व्यावसायिक स्थिरता और अनुकूल कार्य-परिस्थितियाँ अनिवार्य हैं; अन्यथा आयुर्वेद कागजों में बढ़ेगा, समाज में नहीं। अब समय है कि शब्दों के नहीं, संकल्पों के निर्णय लिए जाएँ। वाराणसी के सांसद और देश के प्रधानमंत्री से यह अपेक्षा केवल राजनीतिक आग्रह नहीं, सांस्कृतिक उत्तरदायित्व है कि बीएचयू के इस ऐतिहासिक संकाय को “आयुर्वेद एम्स” का दर्जा दिलाया जाए। अन्यथा आयुष मंत्रालय भी एक सुव्यवस्थित भ्रम से अधिक सिद्ध नहीं होगा—जहाँ परंपरा का नाम है, पर उसका भविष्य अनिश्चित।
आख़िरकार, यह प्रश्न आयुर्वेद का नहीं, हमारी बौद्धिक ईमानदारी का है—क्या हम अपनी जड़ों को सच में सींचना चाहते हैं, या केवल उनके नाम पर छाया बेचते रहेंगे?
This section of Eastern Scientist seeks to encourage thoughtful engagement with scientific, social and cultural questions of our time.
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