आखिर महीने के बीच में नववर्ष कैसे ?

Public Discourse

Date : 19 March 2026

Author : Achal Pulastey


Public discourse plays a vital role in shaping democratic thought and social awareness. It enables citizens, scholars and thinkers to critically reflect on contemporary issues affecting society, culture and governance.

अब आज यानि चैत्र माह के 15 दिन (एक पक्ष) बीतने के बाद चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को करीब 15-20 सालो से कुछ लोग नववर्ष मनाते तो नहीं, सोसल मीडिया पर बधाई जरूर देते है। खास कर वे लोग जो एक संगठन या उस उसके आनुषांगिक राजनैतिक दल से जुडे होते है। पर वे यह नही सोच पाते है कि आखिर महीने के बीच में नववर्ष कैसे हो सकता है? कई मित्रो से यह सवाल किया,पर जवाब नहीं मिला । क्योकि हमारा समाज सोचना भूलकर. हवा के साथ बहना जानता है।ऐसे मित्रो के लिए यह लेख जरूरी है।

आज लोक में बासंतिक नवरात्रि है। सोसल मीडिया में हिन्दू नववर्ष का प्रचार और शुभकामनायें है। जबकि हमारी (काशी) नहीं, यह उज्जैन- महाराष्ट्र की परम्परा है। दरअसल भारत में यूँ कहें तो हिन्दू संस्कृति में कम से कम पाँच नववर्ष है। जैसे गुजरात मे कार्तिक अमावश्या दीपावली को वर्ष खत्म होता है, अगले दिन नये वर्ष की शुरुआत होती है। मिथिला,बंगाल,तमिलनाडु,कर्नाटक,असम ,उडिसा आदि में मेष संक्रांति (14 अप्रैल) को नववर्ष शुरु होता है। नेपाल सहित कुछ क्षेत्रो में मकरसंक्राति (14 जनवरी) को नववर्ष शुरु होता है। उत्तर भारत में की परम्परा में होली के दिन चैत्र कृष्णप्रतिपदा को नववर्ष शुरु होता है।

वास्तव में हिन्दू कलैण्डर में कालगणना की मुख्यतः तीन विधियाँ है। सूर्य पद्धति में मकर संक्रांति को फाल्गुन मास या मेष संक्राति को वैशाख मास से नये साल की शुरुआत मानी जाती है। दूसरी विधि चान्द्र पद्धति है, जिसमें दो विधियाँ प्रचलित हैं। पहली विधि में पूर्णिमा को महीना पूरा होता है,यह उत्तर भारत विशेषतःकाशी क्षेत्र में प्रचलित है। अर्थात कृष्ण प्रतिपदा से महीने की शुरुआत होती है। इस विधि से फाल्गुन पूर्णिमा को संवत (अब होली) जला कर वर्ष (संवत) का समापन किया जाता है। दूसरे दिन चैत्र कृष्ण प्रतिपदा को नये वर्ष की शुरुआत के रुप में फगुआ (बसंतोत्सव) बनाया जाता है। लोक परम्परा यही रही है,आज भी है। परन्तु समय के साथ पश्चिमोत्तर भारत की होली ने इसका अर्थ बदल दिया,संवत जलाने के बजाय होलिका दहन होने लगा। इस विधा के अनुसार 3 मार्च को फाल्गुल पुर्णिमा के समाप्त के पश्चात 4 मार्च को चैत्र कृष्ण पक्ष के साथ संवत 2083 आरम्भ हो चुका है। सभी जानते है कि चैत्र महीना शुरु है। अब आज यानि चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को कुछ लोग नववर्ष मनाते तो नहीं हैं पर बधाई जरूर देते हैं। पर यह नही सोच पाते है कि आखिर महीने के बीच में नववर्ष कैसे हो सकता है? कई मित्रो से यह सवाल किया,पर जवाब नहीं मिला । क्योंकि हमारा समाज सोचना भूलकर विज्ञापन की धारा में बहने की आदत डाल चुका है, ऐसे मित्रो के लिए यह लेख जरूरी है।

This section of Eastern Scientist seeks to encourage thoughtful engagement with scientific, social and cultural questions of our time.

यह चन्द्र काल गणना दूसरी पद्धति की दक्षिण भारतीय परम्परा की बात करते है। जिसमें महीने की समाप्ति अमावश्या को मानी जाती है। इसके अनुसार अभी आज सुबह 6.35 तक फाल्गुन मास था,इसके बाद चैत्र शुक्ल प्रथमा के साथ संवत् 2083 शुरु हुआ। अर्थात उज्जियनी पंचांग के अनुसार चैत्र मास का आरम्भ आज हो रहा है इसलिए नववर्ष है। यह मूलतः उज्जैन क्षेत्र का नववर्ष है। न कि काशी क्षेत्र का, जैसा कि उपरोक्त पंक्तियों में उल्लेख किया जा चुका है कि काशी क्षेत्र का नववर्ष 4 मार्च को होली के दिन था। काशी के अनुसार आज चैत्र मास का मध्य है, चैत्र महीने का 15 दिन बीत चुका है।

निष्कर्ष यह कि कालगणना ,नववर्ष का आरम्भ क्षेत्रिय सूर्योदय,चन्द्रोय, खगोलीय,भौगोलिक स्थिति के अनुसार होता है। जिस क्षेत्र जिस दिन सुखद मौसम शुरु होता है उसी दिन से नववर्ष आरम्भ का उत्सव मनाया जाता है। अततः कहना यह है हर क्षेत्र के लोगो को अपनी संस्कृति और परम्पारओं के अनुसार पर्व व नववर्ष को मानना चाहिए न कि विज्ञापन के अनुसार।इस मामले में हम भोजपुरिया काफी कमजोर है,अपनी परम्पाराओं को छोड़ कर दूसरी परम्पराओं को झट से पकड़ लेते है।यही कहीं कहीं हीनता बोध है,जबकि देश अन्य हिस्सों जैसे मिथिला,बंगाल,असम,तमिल,मलयालम आदि अपनी परम्पराओं आज संरक्षित किये हुए हैं।


Public Discourse Archive
Related Articles

Post a Comment

0 Comments