मध्य पूर्व का तनाव और भारतीय प्रवासी: अदृश्य संकट की गूंज

Editorial

Date : 28 मार्च 2026

Editor-in-Chief :


मध्य पूर्व में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव का सबसे गहरा और तात्कालिक प्रभाव उन लाखों भारतीय प्रवासी कामगारों पर पड़ रहा है, जो खाड़ी देशों की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाते हैं। सेंटर फ़ॉर इंडियन माइग्रेंट स्टडीज़ के रफ़ीक रवुथर के शब्द—“अनिश्चितता और डर बढ़ रहा है”—इस पूरे संकट की मानवीय त्रासदी को उजागर करते हैं। यह केवल एक क्षेत्रीय संघर्ष नहीं, बल्कि वैश्विक श्रम-प्रवाह, आर्थिक निर्भरता और सामाजिक सुरक्षा के ताने-बाने पर सीधा प्रहार है।

केरल के नॉन रेजिडेंट केरलाइट अफ़ेयर्स (NORKA) विभाग के आंकड़े इस संकट की गहराई को प्रमाणित करते हैं। लगभग 1000 शिकायतों में जो प्रवृत्तियाँ उभरकर सामने आती हैं, वे केवल व्यक्तिगत समस्याएँ नहीं, बल्कि एक व्यापक संरचनात्मक असुरक्षा का संकेत हैं। 16 प्रतिशत शिकायतें उड़ानों की कमी से जुड़ी हैं—यह आंकड़ा दर्शाता है कि संकट की घड़ी में वापसी का रास्ता भी संकीर्ण हो गया है। वहीं, 12 प्रतिशत लोग फंसे हुए हैं, 10.9 प्रतिशत सुरक्षा को लेकर भयभीत हैं, और लगभग 10 प्रतिशत लोग देश लौटना चाहते हैं। यह स्पष्ट करता है कि प्रवासी जीवन, जो सामान्य परिस्थितियों में अवसरों का प्रतीक माना जाता है, संकट के समय असुरक्षा और बेबसी का पर्याय बन जाता है।

विशेष चिंता का विषय है कि 65.8 प्रतिशत लोग अपने परिजनों की सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं। यह आंकड़ा उस मनोवैज्ञानिक दबाव को दर्शाता है, जो सीमाओं के पार फैले परिवारों को भीतर ही भीतर तोड़ रहा है। प्रवासी केवल आर्थिक इकाई नहीं होते; वे सामाजिक-सांस्कृतिक संबंधों के वाहक भी होते हैं। जब वे असुरक्षित होते हैं, तो उसका प्रभाव भारत के गांवों और कस्बों तक महसूस किया जाता है।

आर्थिक दृष्टि से भी यह संकट गंभीर है। होस्पिटैलिटी सेक्टर, जो खाड़ी देशों में भारतीय कामगारों का एक बड़ा आधार है, सबसे अधिक प्रभावित हुआ है। इसके साथ ही टैक्सी सेवाएं और अन्य सहायक क्षेत्र भी प्रभावित हो रहे हैं। नौकरियों के अस्थिर होने की खबरें इस बात का संकेत हैं कि यदि यह स्थिति लंबी चली, तो इसका असर भारत की अर्थव्यवस्था—विशेषकर रेमिटेंस—पर भी पड़ेगा। याद रहे कि भारत को हर साल अरबों डॉलर की विदेशी मुद्रा प्रवासियों से प्राप्त होती है, जिसमें खाड़ी देशों का महत्वपूर्ण योगदान है। यह स्थिति भारतीय विदेश नीति और प्रवासी संरक्षण तंत्र के लिए भी एक कसौटी है। अब यह आवश्यक हो गया है कि भारत सरकार केवल आपातकालीन निकासी तक सीमित न रहे, बल्कि एक दीर्घकालिक रणनीति तैयार करे। इसमें सुरक्षित और सस्ती वापसी के विकल्प, कानूनी सहायता, मानसिक स्वास्थ्य समर्थन, और संकट-पूर्व चेतावनी तंत्र शामिल होना चाहिए। साथ ही, खाड़ी देशों के साथ द्विपक्षीय समझौतों को इस प्रकार सुदृढ़ किया जाना चाहिए कि संकट के समय भारतीय कामगारों के अधिकार और सुरक्षा सुनिश्चित हो सकें।

अंततः, यह संकट हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या भारत की विकास-नीति प्रवासी श्रम पर अत्यधिक निर्भर हो गई है? क्या हमें घरेलू स्तर पर ऐसे अवसर नहीं बनाने चाहिए, जिससे युवाओं को विदेश जाने की मजबूरी कम हो?

मध्य पूर्व का यह तनाव केवल सीमाओं के भीतर सीमित नहीं है; यह भारत के सामाजिक, आर्थिक और मानवीय ताने-बाने में गूंज रहा है। समय की मांग है कि इस गूंज को सुना जाए और ठोस, संवेदनशील और दूरदर्शी कदम उठाए जाएं—ताकि प्रवासी भारतीय केवल संकट के समय याद न किए जाएं, बल्कि उनकी सुरक्षा और सम्मान को स्थायी नीति का हिस्सा बनाया जा सके।

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