Culture
Date : 27 मार्च 2026
Author :डॉ.दुष्यंत कुमार शाह
Culture reflects the collective memory, traditions and creative expressions of society. It includes literature, art, folklore, knowledge systems and everyday practices that shape human identity and social values. संस्कृति समाज की सामूहिक स्मृति, परम्पराओं और सृजनात्मक अभिव्यक्तियों का प्रतिबिम्ब होती है। इसमें साहित्य, कला, लोक परम्पराएँ, ज्ञान प्रणालियाँ तथा दैनिक जीवन की वे सभी प्रथाएँ शामिल होती हैं, जो मानव की पहचान और सामाजिक मूल्यों को आकार देती हैं।
आज सोसल मीडिया पर रामनवमी की बधाईयों की भरमार है, लेकिन लोक में बासंतिक नवरात्रि के बलिदान मेलो का उत्साह है।
इस भीड़ में एक स्वस्फूर्त अनुशासन है—अव्यवस्था में भी एक व्यवस्था। यह वह लोक-तंत्र है, जो किसी नियम-पुस्तिका से नहीं, बल्कि सामूहिक अनुभव और परंपरा से संचालित होता है। देवी माई के थान पर पहुँचते ही आस्था का चरम रूप सामने आता है। भीड़ चींटियों की तरह सरकती है, हर कोई एक झलक पाने को आतुर। पिंडियों पर चढ़ावे का अंबार, नारियल का जल, धूप-कपूर का धुआँ—यह सब मिलकर एक ऐसा वातावरण रचते हैं, जहाँ भक्ति और भौतिकता एक-दूसरे में घुल जाती हैं। पर इसी आस्था का एक दूसरा, उग्र और भयावह पक्ष भी है—बलि। अगेथू, नीम के पेड़ के नीचे बकरों की बलि, खौलते घी में खप्पर, तांत्रिक अनुष्ठान, पचरा गीत, देवी का अवतरण—यह सब आधुनिक संवेदनाओं को विचलित करता है, पर लोकविश्वास के भीतर यह उपचार, मुक्ति और संतुलन का माध्यम है। यहाँ “पागलपन” भी है—पर वह असंगठित नहीं। यह मनोवैज्ञानिक उफान है, जिसे सोखा, तांत्रिक, गुनी अपने ढंग से दिशा देते हैं। वे न केवल अनुष्ठान कर रहे होते हैं, बल्कि सामाजिक-मानसिक उपचार भी कर रहे होते हैं. भूत प्रेत का बाँधते-मारते है।—भले ही वह आधुनिक विज्ञान की कसौटी पर न खरा उतरे। लोक और तथाकथित ‘सभ्य’ समाज का द्वंद्व
यहीं रिसर्च इन तप्पा डोममागढ़ के लेखक अचल पुलस्तेय कथा के एक पात्र लाला बाबा का दृष्टिकोण महत्वपूर्ण हो जाता है। उनके लिए “अनगढ़” का अर्थ है—प्राकृतिक, असंपादित, यथार्थ। जिसे हम कुरीति कहते हैं, वह किसी और की रीति हो सकती है। और जिसे हम अंधविश्वास मानते हैं, वह शायद उन लोगों के लिए जीवन से जूझने का एकमात्र साधन है। वे एक असहज प्रश्न उठाते हैं—क्या सचमुच लोक आस्था अधिक खतरनाक है, या वह संगठित धर्म, जो इतिहास में युद्धों और नरसंहारों का कारण बना है?
मनोविज्ञान, उपचार और लोक-विश्वास
लालबाबा की व्याख्या इस पूरे अनुभव को एक नए आयाम में ले जाती है। उनके अनुसार, अभाव, हीनता, असुरक्षा और उपेक्षा—ये भाव मनुष्य को भीतर से तोड़ते हैं। लोक अनुष्ठान इन भावनाओं को अभिव्यक्त करने का मंच देते हैं, जिससे व्यक्ति मानसिक रूप से हल्का होता है। इसके विपरीत, तथाकथित आधुनिक समाज इन भावनाओं को दबाता है, जो बाद में मानसिक और शारीरिक बीमारियों, अपराधों और हिंसा के रूप में प्रकट होती हैं। इस दृष्टि से देखा जाए तो इस बलिदान मेले का “पागलपन” शायद अधिक ईमानदार है—क्योंकि वह छिपा हुआ नहीं, बल्कि खुलकर सामने आता है।
प्रकृति, आस्था और स्वतंत्रताएक बेचैन प्रश्न
रात के सन्नाटे में, जब मेला समाप्त हो चुका होता है और सिर्फ एक दीपक जल रहा होता है, यहाँ इन मेलों पर आधारति उपन्यास रिसर्च इन तप्पा डोमागढ़ की मिजो रिसर्चर नायिका लल्लमी पुई के भीतर एक गहरा प्रश्न जन्म लेता है। संगम की जलकुंभी से ढँकी नदी उसे आज की धर्म-संस्कृति की प्रतीक लगती है—जिसे राजनीति और कर्मकाण्डों ने ढँक लिया है। प्रश्न यह नहीं कि ये मेले अंधविश्वास में डूबे है या नहीं—प्रश्न यह है कि क्या पूरा समाज ही किसी बड़े, अदृश्य अंधकार में नहीं डूब रहा है ? बरसात में नदी तो स्वयं को साफ कर लेती है, पर मनुष्य की संस्कृति, धर्म और चेतना को कौन शुद्ध करेगा?
अंततः भोजपुरिया इलाके के बलिदान मेले एक दर्पण हैं—जिसमें हम न केवल लोकजीवन को, बल्कि अपने समय की जटिलताओं को भी देख सकते हैं। यह हमें मजबूर करता है कि हम आस्था, तर्क, परंपरा और आधुनिकता के बीच खड़े होकर खुद से सवाल करें। शायद उत्तर किसी एक पक्ष में नहीं, बल्कि उस संवाद में छिपा है, जिसे हम अक्सर टाल देते हैं।
"रिसर्च इन तप्पाडोमा गढ़" डॉ. आर. अचल पुलस्तेय का भोजपुरी-मिजो लोक संस्कृतियों पर शोधपरक प्रसिद्ध उपन्यास है। एक बहुआयामी विद्वान, लेखक और शोधकर्ता हैं, जिनका कार्यक्षेत्र संस्कृति, इतिहास, साहित्. लोक संस्कृति और आदिवासी ज्ञान परंपराओं तक विस्तृत है। उनके लेखन में परंपरा, समाज और वैज्ञानिक चिंतन के अंतर्संबंधों का गहन विश्लेषण देखने को मिलता है।
Culture Archive
Related Articles
.डॉ.दुष्यंत कुमार शाह, किरोड़ीमल कालेज दिल्ली विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग में वरिष्ठ असिस्टेंट प्रोफेसर है। एक लोक संस्कृति,इतिहास के शोधकर्ता हैं, जिनका कार्यक्षेत्र संस्कृति, इतिहास, साहित्य और आदिवासी ज्ञान परंपराओं तक विस्तृत है। उनके लेखन में परंपरा, समाज और वैज्ञानिक चिंतन के अंतर्संबंधों का गहन विश्लेषण देखने को मिलता है।





0 Comments