Culture
Date : 30 March 2026
Author : Dr. R. Achal Pulastey
Relationship between climate, culture, and human health
This article examines the relationship between climate, culture, and human health in the context of globalization-driven displacement and resettlement. It argues that culture is essentially a product of long-term adaptation to local environmental conditions such as temperature and humidity. A study conducted on 60 individuals from different ecological regions of India (forest, wetland, and general zones) reveals that those who adapted their lifestyle to the new environment after resettlement were generally healthier. In contrast, individuals who continued to follow the lifestyle of their original habitat in a different ecological setting were more prone to environment-related diseases. The findings highlight that health is not only determined by biological or genetic factors but is deeply influenced by environmental adaptation. The editorial concludes that adopting a lifestyle aligned with the local natural environment is essential for maintaining good health, especially in an increasingly mobile and globalized world.
पृथ्वी पर विविध प्रकार की जलवायु पाई जाती है और प्रत्येक जलवायु अपने अनुरूप जीवन के विकास की दिशा निर्धारित करती है। इसी अनुकूलन की दीर्घकालिक प्रक्रिया से जीवनशैली का निर्माण होता है, जिसे हम संस्कृति के रूप में समझते हैं। किसी भी समाज का रहन-सहन, खान-पान, वस्त्र, कार्य-पद्धति और सामाजिक व्यवहार उस क्षेत्र की भौगोलिक एवं जलवायुगत परिस्थितियों के साथ गहरे सामंजस्य का परिणाम होता है। इस अर्थ में संस्कृति कोई स्थिर या निरपेक्ष तत्व नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ सतत संवाद का जीवंत रूप है।
किन्तु वर्तमान वैश्वीकरण के दौर में यह संतुलन तेजी से बदल रहा है। रोजगार, शिक्षा, व्यापार और अन्य कारणों से बड़े पैमाने पर हो रहे विस्थापन और पुनर्स्थापन ने प्राकृतिक तथा सांस्कृतिक सीमाओं को धुंधला कर दिया है। मनुष्य अब अपने मूल पर्यावरण से हटकर बिल्कुल भिन्न जलवायु और पारिस्थितिकी वाले क्षेत्रों में बस रहा है। इस परिवर्तन ने जहां सामाजिक विविधता को बढ़ाया है, वहीं यह प्रश्न भी खड़ा किया है कि क्या मनुष्य अपनी मूल जीवनशैली को हर परिस्थिति में बनाए रख सकता है, और यदि नहीं, तो इसका उसके स्वास्थ्य पर क्या प्रभाव पड़ता है।
इसी संदर्भ में किया गया एक अध्ययन उल्लेखनीय निष्कर्ष प्रस्तुत करता है। इस अध्ययन में स्थायी रूप से विस्थापित और पुनर्स्थापित व्यक्तियों के जीवन के विभिन्न पहलुओं—जैसे उनकी जीवनशैली, स्वास्थ्य अभिलेख, खान-पान की आदतें, आयु, आनुवंशिक वासस्थान, वर्तमान निवास और विस्थापन की अवधि—को आधार बनाकर आंकड़े एकत्र किए गए। यह अध्ययन भारत के जंगल, आनूप (जल-प्रधान) और सामान्य प्राकृतिक क्षेत्रों से चुने गए 60 व्यक्तियों पर केंद्रित था। अध्ययन का उद्देश्य यह समझना था कि परिवर्तित पर्यावरण में जीवनशैली के अनुकूलन या अननुकूलन का स्वास्थ्य पर क्या प्रभाव पड़ता है।
अध्ययन के विश्लेषण से यह स्पष्ट रूप से सामने आया कि वे लोग, जिन्होंने अपने पुनर्स्थापित स्थान की जीवनशैली को अपनाया, सामान्यतः अधिक स्वस्थ पाए गए। उन्होंने स्थानीय जलवायु, उपलब्ध भोजन और सामाजिक व्यवहार के अनुरूप अपने दैनिक जीवन में परिवर्तन किए, जिससे उनका शरीर और मन नए परिवेश के साथ सामंजस्य स्थापित कर सका। इसके विपरीत, वे व्यक्ति जो अपने मूल स्थान की जीवनशैली को नए परिवेश में भी यथावत बनाए रखने का प्रयास करते रहे, वे अपेक्षाकृत अधिक बीमार पाए गए। इनमें विशेष रूप से प्रकृति-वैषम्यता से जुड़े रोग—जैसे पाचन संबंधी समस्याएँ, त्वचा रोग, श्वसन संबंधी विकार और सामान्य प्रतिरक्षा में कमी—अधिक देखी गई।
यह निष्कर्ष इस बात की ओर संकेत करता है कि स्वास्थ्य केवल आनुवंशिक या चिकित्सकीय कारकों का परिणाम नहीं है, बल्कि यह पर्यावरणीय अनुकूलन से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। जब मनुष्य अपने परिवेश के अनुरूप जीवनशैली अपनाता है, तो उसका शरीर उस वातावरण के तापमान, आर्द्रता, आहार और जैविक परिस्थितियों के साथ संतुलन बना लेता है। लेकिन जब यह संतुलन टूटता है, तो शरीर पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है, जिससे विभिन्न प्रकार की बीमारियाँ जन्म लेती हैं।
वास्तव में, पृथ्वी की प्राकृतिक विविधता का मूल कारण सूर्य के प्रकाश और जल की उपलब्धता है। तापमान और नमी की भिन्न-भिन्न स्थितियाँ ही पृथ्वी के विभिन्न हिस्सों का प्राकृतिक सीमांकन करती हैं और इन्हीं के आधार पर विभिन्न पारिस्थितिक तंत्र विकसित होते हैं। इन्हीं पारिस्थितिक तंत्रों के अनुरूप वहाँ की जैव विविधता और मानव जीवनशैली विकसित होती है। इस प्रकार, संस्कृति को प्रकृति से अलग करके नहीं समझा जा सकता; यह प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व का परिणाम है।
जब विस्थापन होता है, तो यह प्राकृतिक-सांस्कृतिक समायोजन भंग हो जाता है। पुनर्स्थापन के बाद एक नई अनुकूलन प्रक्रिया शुरू होती है, जिसे पुनर्समायोजन कहा जा सकता है। यह प्रक्रिया सहज नहीं होती; इसमें समय, अनुभव और परिस्थितियों की समझ की आवश्यकता होती है। जो व्यक्ति इस प्रक्रिया में सफल होते हैं, वे अपने नए परिवेश के साथ सामंजस्य स्थापित कर लेते हैं और सामान्यतः स्वस्थ रहते हैं। इसके विपरीत, जो इस अनुकूलन में असफल रहते हैं, वे लगातार शारीरिक और मानसिक असंतुलन का सामना करते हैं।
आज के वैश्विक समाज में, जहाँ गतिशीलता जीवन का सामान्य हिस्सा बन चुकी है, यह प्रश्न और भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या हम अपनी संस्कृति को स्थिर मानकर हर जगह लागू कर सकते हैं, या हमें उसे अपने परिवेश के अनुसार परिवर्तित करना होगा। यह अध्ययन स्पष्ट संकेत देता है कि स्वास्थ्य की दृष्टि से लचीलापन और अनुकूलन ही अधिक व्यवहारिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण है।
अतः यह आवश्यक है कि विस्थापन और पुनर्स्थापन की नीतियों में केवल आर्थिक और सामाजिक पहलुओं पर ही नहीं, बल्कि स्वास्थ्य और सांस्कृतिक अनुकूलन के आयामों पर भी गंभीरता से विचार किया जाए। लोगों को नए परिवेश के अनुरूप जीवनशैली अपनाने के लिए जागरूक करना और आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराना एक महत्वपूर्ण सार्वजनिक स्वास्थ्य रणनीति हो सकती है। अंततः, सामान्य स्वास्थ्य के लिए यह समझना अनिवार्य है कि मनुष्य प्रकृति से अलग नहीं है। स्थानीय प्राकृतिक वातावरण के अनुरूप जीवनशैली अपनाना ही स्वस्थ जीवन का आधार है। संस्कृति का वास्तविक अर्थ भी यही है—प्रकृति के साथ संतुलित और सामंजस्यपूर्ण जीवन।
Through this section, Eastern Scientist aims to highlight diverse cultural perspectives and encourage interdisciplinary dialogue between science, Health, society and cultural knowledge traditions.
Dr. R. Achal Pulastey is a Ayurveda Phisician, multidisciplinary scholar, author, and researcher whose work spans cultural studies, history, literature, and indigenous knowledge systems. His writings explore the intersections of tradition, society, and scientific thought, contributing significantly to contemporary academic and cultural discourse.
डॉ. आर. अचल पुलस्तेय एक आयुर्वेद चिकित्सक, बहुआयामी विद्वान, लेखक और शोधकर्ता हैं, जिनका कार्यक्षेत्र संस्कृति, इतिहास, साहित्य और आदिवासी ज्ञान परंपराओं तक विस्तृत है। उनके लेखन में परंपरा, समाज और वैज्ञानिक चिंतन के अंतर्संबंधों का गहन विश्लेषण देखने को मिलता है।
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