देवी कामाख्या- 12: ब्रह्मपुत्र-कामाख्या: काल-चक्र, मिथक और मातृसत्ता का अजस्र प्रवाह

Culture | संस्कृति

Date : June 19, 2026   |   Author : डॉ. अचल पुलस्तेय

The Brahmaputra and Kamakhya: The Eternal Flow of Time, Myth, and Matriarchy

The River’s Soliloquy and Civilizational Critique
Set against a vivid April dawn in Guwahati, the narrative unfolds as a profound dialogue between the author and the Brahmaputra River. Looking out at the vast expanse surrounding the Nilachal Hills and the Umanand islet, the river metaphorically speaks, challenging mainstream history that is often viewed through the narrow prism of royal palaces rather than the fluid perspective of nature. The author critiques modern human intelligence, which has replaced primitive co-existence with borders and xenophobia—claiming the river’s water as its own while rejecting the migrating humans who travel alongside it.
The Contradiction of Gender and Myth
A central theme is humanity's obsession with assigning a gender to the river. Geologically born from the collision of tectonic plates, the river is envisioned as feminine along its upper course. In Tibet, it is Tsangpo ("Mother Amrita"); in China, it is the "Swift Mare"; and in Arunachal Pradesh, it is Siang or Dihang. However, upon entering the plains of Assam, a patriarchal mindset rebranded this aggressive, mighty expanse as the male Brahmaputra (Son of Brahma). To legitimize this, Puranic myths fabricated an unethical tale involving Brahma's desire for Sage Shantanu’s wife, Amoga. The narrative argues that a river is neither male nor female; it is simply dynamic, life-sustaining energy. The Blood-Red Convergence and Political Rewriting The river's identity merges deeply with Goddess Kamakhya during the monsoon. When the mineral-rich, red-silt waters of its tributary, the Lohit River (associated with the myth of Parshuram washing away his sins), swell the Brahmaputra, the river turns red. While patriarchal orthodoxy might view this with taboo, local tribal consciousness celebrates it as the Ambubachi festival—the sacred menstruation of Mother Earth.
Historically, indigenous tribes like the Mishing, Bodo, and Kachari called the river Tai or Tilao, meaning "Mother." The shift to a male identity occurred around the 10th century. To legitimize the Sanskritization of the local Koch (Kirat) King Ratnasen into the Hindu caste hierarchy, court poets composed the Kalika Purana. This text recast the river as male and branded the unconquered indigenous tribes as Mlecchas (barbarians) or Asuras (demons) because Vedic expansionists could never truly conquer this fiercely independent, egalitarian, and matriarchal valley. Ultimately, the Brahmaputra flows as an unyielding witness to a casteless, tribal democracy blessed by the creative power of Mother Kamakhya. Keywords:Brahmpura,Goddess Kamakhya,Kalika Purana,Umanand,kirat.

गुवाहाटी में नीलांचल पर्वत के पास बहती ब्रह्मपुत्र नदी

पूरे दक्षिण एशिया के लोक मानस में पूज्य और रची-बसी देवी कामाख्या की चर्चा बिना ब्रह्मपुत्र नदी अधूरी है, क्योंकि ब्रह्मपुत्र का तीव्र प्रवाह नीलांचल पर्वत को तीन ओर से घेरे बहता है। प्रस्तुत आलेख मेरी यात्रा कथा ‘कुरुना से कामाख्या” का एक अंश है। जिसके लालित्य को देखते हुआ लेख न बदलकर यथावत प्रस्तुत कर रहा हूँ।

14 अप्रैल 2023 की वह भोर असम की धरती पर एक नई चेतना लेकर उदित हो रही थी। पानबाजार-फैंसीबाजार चौक के कोलाहल को पीछे छोड़ते हुए जब हम फूल बाजार के रास्ते महात्मा गांधी मार्ग पर पहुँचे, तो सामने प्रकृति का एक विराट विग्रह अंगड़ाई ले रहा था। यह अप्रैल का महीना था; ब्रह्मपुत्र ने शीतकाल के बीतने पर अपने विशाल पाट को कुछ समेट अवश्य लिया था, किंतु उसका वैभव अब भी कोसों चौड़ाई में लहरा रहा था। बीच धारा में उमानंद की पहाड़ी किसी अचल, अविचल शिवलिंग की भांति खड़ी थी, जिसके लैम्प पोस्ट की बत्तियाँ नदी के कंपित जल पर इन्द्रधनुषी छटा बिखेर रही थीं। किनारे बंधी नौकाओं और स्टीमरों पर नाविकों का दैनिक जीवन शुरू हो चुका था, जहाँ भोर के सन्नाटे को चीरती हुई जीवन की सहज गतिविधियाँ आकार ले रही थीं।

उसी तीव्र, शीतल प्रवाह को स्पर्श कर जब मैं अपलक उस अनंत जलराशि को निहार रहा था, तभी मेरे भीतर सदियों से बहती उस नदी का कल्पित स्वर गूंज उठा। ब्रह्मपुत्र मानो साक्षात संवाद करते हुए बोल पड़ा—"आ गये पुलस्तेय! मैं सदियों से तुम्हारे जैसे किसी अन्वेषक की प्रतीक्षा में था, जो इतिहास को राजाओं के महलों से नहीं, बल्कि मेरे प्रवाह के पक्ष से देखने का साहस कर सके।"

नदी का यह संवाद मानव सभ्यता के कथित 'बुद्धि-विकास' पर एक तीखा प्रहार था। जैसे-जैसे मनुष्य की बुद्धि विकसित हुई, वह सह-अस्तित्व की आदिम भावना को भूलकर स्वार्थी और शातिर होता गया। उसने असीम प्रकृति को ससीम सीमाओं में बांधने का निष्फल प्रयास किया। तिब्बत और चीन के पर्वतों से बहकर आने वाला जल तो उसे अपना लगा, किंतु उसी जल के साथ आने वाले मनुष्यों को उसने 'परदेशी' मान लिया। वर्चस्व की इसी भूख ने एक ही कोख से जन्मे मनुष्यों को एक-दूसरे के रक्त का प्यासा बना दिया, तो भला ये साम्राज्यवादी सोच इन नदी-पहाड़ों के मूल चरित्र को कैसे समझ पाती?

इस ऐतिहासिक अविश्वास का सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि मानव सभ्यता आज तक यह निश्चित नहीं कर पाई कि ब्रह्मपुत्र स्त्री है या पुरुष। आज से करोड़ों वर्ष पूर्व जब टेथिस सागर के उदर से हिमालय का प्राकट्य हुआ, तो धरती कई टुकड़ों में बंट गई। हिमालय के उस पार की भूमि तिब्बत और चीन कहलाई, और इस पार की धरती जम्बूद्वीप, आर्यावर्त या भारत बनी। उसी हिम-शिखर की झीलों से जब मधुर जल की धाराएं फूटीं, तो कृतज्ञ मानव कुलों ने इसे अपनी-अपनी अनुभूतियों से नाम दिए। तिब्बत के चेतन मनुष्यों ने इसे 'त्सांग्पो' या 'यारलुंग तषांग्पो' कहा, जिसका मूल अर्थ ही 'माँ अमृता' होता है। चीन के मैदानों में यह 'पिंयिंग' (रुमानी नदी) हुई, और पूर्व की ओर बढ़ते ही इसका नाम 'या सू त्सांग चियांग' अर्थात 'सरपट भागती घोड़ी' पड़ गया। लगभग 1100 किलोमीटर की दुर्गम यात्रा कर जब यह धारा 17 हजार फीट की ऊँचाई से इस पार उतरी, तो सूर्योदय की भूमि अरुणाचल के वासियों ने अपनी भाषा में 'सियांग' या 'दिहांग' (अरुणा) कहकर पुकारा। यहाँ तक यह प्रवाह पूरी तरह स्त्रैण था, किंतु जैसे ही यह असम के समतलों पर उतरा, पितृसत्तात्मक इतिहास-बोध ने इसके उग्र और व्यापक रूप को देखकर इसे पुरुष मान लिया और 'ब्रह्मपुत्र' नाम दे दिया। विडंबना देखिए कि यही नदी जब बांग्लादेश की सीमा में प्रवेश करती है, तो पुनः 'यमुना' बनकर अंततः पद्मा (गंगा) के साथ सागर में विलीन हो जाती है।

अपनी इस 2900 किलोमीटर की प्राकृतिक यात्रा में ब्रह्मपुत्र केवल जल लेकर नहीं चलता, बल्कि मिथकों और इतिहास के अंतर्विरोधों को भी साथ बहाता है। आधुनिक चीनी वैज्ञानिकों ने भले ही अब इसके उद्गम को खोजकर इसे एशिया की सबसे लंबी नदी घोषित कर दिया हो, परंतु लोक-मानस ने इसके चारों ओर कथाओं का एक अनूठा संजाल बुना है। जहाँ चीनी मिथकों में इसे अवलोकितेश्वर बोधिसत्व के आदेश पर लोक-कल्याण के लिए उतरी अमृत-धारा माना गया, वहीं भारतीय आख्यानों ने इसके जन्म के पीछे एक अत्यंत अनैतिक और पुरुषवादी कथा गढ़ दी। ऋषि शांतनु की अति सुन्दरी पत्नी अमोघा पर ब्रह्मा के आसक्ति से उत्पन्न पुत्र हुआ। ऋषि शांतनु ने लोकलाज के भय से उस पुत्र को कैलाश और गंधमादन के पर्वतों के बीच छुपा कर पालन-पोषण किया । युवा होने पर बर्फ की दीवारों को तोड़कर बह निकला । यह कथा वास्तव में इस नदी के 'नद' (पुरुष) होने के झूठे पौरुष को सिद्ध करने के लिए रची गई थी। यह कथा हमारी सभ्यता के उस अंतर्विरोध को उजागर करती है जहाँ स्त्री की इच्छा और शुचिता को पुरुष के अहं की वेदी पर बलि चढ़ा दिया जाता है। सच तो यह है कि नदी न स्त्री है न पुरुष; वह तो मात्र गतिमान, प्रवाहमान जल है—ठीक वैसे ही जैसे मानव देह की धमनियों में बहने वाला रक्त, जो धरती की धमनियों को जीवंत रखता है।

ब्रह्मपुत्र के प्रवाह के साथ ही हमारे मिथक भी बदलते रहे हैं। कर्ता और द्रष्टा बनने की इस मानवीय कशमकश में इस नदी के साथ परशुराम की कथा भी जुड़ती है। मातृ-वध के पाप से मुक्ति के लिए व्याकुल परशुराम का परशु जब हिमालय के बर्फीले कछार में गिरा, तो हिम-सरोवर का बांध टूट गया और लोहित नदी बह निकली। अरुणाचल के तेजू से 48 किलोमीटर दूर स्थित 'परशुराम कुंड' आज भी उसी रक्ताभ बलुआ मिट्टी के कारण प्रसिद्ध है, जहाँ हर मकर संक्रमांति को लोग अपने पाप धोने आते हैं। वैज्ञानिक सत्य यही है कि लोहित, ब्रह्मपुत्र की ही एक सहायक नदी है, जिसके पानी का लाल रंग पहाड़ों के खनिजों से निर्मित है।कभी-कभी अधिक वर्षा से लोहित में इतना पानी आ जाता है मेरी जल भी लाल हो जाता है।

यहीं पर यह महाप्रवाह सीधे नीलाचल पर्वत और देवी कामाख्या के आदिम-रहस्य से जुड़ जाता है। वर्षा ऋतु के आगमन पर जब लोहित नदी का यह रक्ताभ जल पहाड़ों की मिट्टी को समेटकर मेरी मुख्य धारा में मिलता है, तो पूरा ब्रह्मपुत्र रक्ताभ हो उठता है। लोक-मानस और यहाँ की आदिम चेतना इस प्राकृतिक घटना को किसी भय या अशुद्धता के रूप में नहीं देखती, बल्कि इसे साक्षात माँ कामाख्या और प्रकृति के 'रजस्वला' (अम्बुबाची) होने के पावन उत्सव के रूप में स्वीकार करती है। यह इस बात का जीवंत प्रमाण है कि कामाख्या कोई कटी-छँटी मूर्ति नहीं, बल्कि ब्रह्मपुत्र की गोद में धड़कती इस धरती की प्रसव पीड़ा और सृजन-शक्ति का ही दूसरा नाम है। नदी का रक्ताभ होना और कामाख्या की गुफा से सृजन की धारा फूटना—दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, जो प्रकृति की उत्पादक क्षमता (Productive Power of Nature) को पूजते हैं।

यदि हम इस घाटी के आदिम मूल निवासियों—मिशिंग, बोडो और कचारियों—के इतिहास को देखें, तो वे ब्रह्मपुत्र को आज भी 'ताई', 'तिलाओ' या 'तालुका' कहते हैं, जिसका सीधा अर्थ 'माँ' होता है। हमारे प्राचीन ग्रंथों में भी इसे मंदाकिनी, हिरण्या, हृदिनी और ब्राह्मी जैसे स्त्रैण नाम ही दिए गए थे। यहाँ तक कि ऋषि मार्कण्डेय ने भी इसे 'लौहित्या' कहा था। किंतु समय के चक्र के साथ जब राज्यों और साम्राज्यों का दौर आया, तो महागाथाओं के पुनर्लेखन का खेल शुरू हुआ। दसवीं शताब्दी के आस-पास कूचबिहार के आदिम किरात (कोच वंशी) राजा रत्नसेन ने जब स्वयं को स्थापित करने के लिए वर्ण-व्यवस्था में क्षत्रिय सिद्ध करना चाहा, तो उनके दरबारियों द्वारा 'कालिका पुराण' की रचना की गई। इसी पुराण में पहली बार इस नदी को ब्रह्मा से जोड़कर पुरुष नद 'ब्रह्मपुत्र' सिद्ध किया गया, ताकि राजा के क्षत्रियत्व को एक दैवीय शुचिता मिल सके। आश्चर्य की बात यह है कि इसी पुराण ने जहाँ कामाख्या पीठ की आदिम कबीलाई बलि-परंपराओं को तो यथावत अपना लिया, वहीं यहाँ के मूल भूमि-पुत्रों को 'म्लेच्छ' और 'असुर' कह दिया।

इतिहास का यह संघर्ष वास्तव में विदेहों-वैदिक आर्यों के उस प्राचीन काल से शुरू होता है, जब वे कोशी नदी को पार कर इस समतावादी घाटी पर अधिकार करना चाहते थे। इंद्र के नेतृत्व में बढ़े उन अभियानों को यहाँ के पराक्रमी कोच, मेच, खासी और बोडो योद्धाओं ने कोशी के उस पार ही रोक दिया। सैन्य स्तर पर मिली इसी असफलता और कुंठा के कारण पुरुषवादी मुख्यधारा के पुराणों ने इस घाटी के स्वतंत्र मानुष कुलों को 'म्लेच्छ' या 'दानव' कहकर तिरस्कृत किया, क्योंकि वे यहाँ व्याप्त मातृसत्ता की उस अदम्य शक्ति को परास्त नहीं कर सके जिसका केंद्र कामाख्या की पहाड़ी थी।

अंततः, ब्रह्मपुत्र का यह संवाद हमें यह सोचने पर विवश करता है कि मानव मन भले ही अपनी धारणाएं बदलता रहे—जो कल अनैतिक था उसे आज नैतिक ठहराता रहे—किंतु प्रकृति का यह महाप्रवाह अपने मूल स्वरूप में अडिग है। यह नदी आज भी अपनी घाटी में जाति-वर्ण- वर्गहीन समाज, कबीलाई जनतंत्र और कामाख्या के मातृ-आशीष की साक्षी बनकर बह रही है, जिसकी करुणा और गहराई को समझे बिना पूर्वोत्तर के इतिहास और संस्कृति को कभी पूर्णता में नहीं समझा जा सकता।

इस शृंखला का अगला भाग पढ़ें

देवी कामाख्या-13:कामरूप का इतिहास-मिथक

विषय की गहराई को समझने हेतु लेखक के जमीनी शोध और वास्तविक अनुभवों पर आधारित इन दो चर्चित पुस्तकों का अध्ययन करें— यात्रा-वृत्तांत 'कुरुना से कामाख्या' तथा शोध-आधारित उपन्यास 'रिसर्च इन तप्पाडोमागढ़'
Dr. Achal Pulastey
About the Author

डॉ. अचल पुलस्तेय एक समकालीन बहुविषयक विद्वान, सशक्त लेखक, चिंतक, लोक अध्येता, संपादक एवं कवि हैं। उनका लेखन सामाजिक यथार्थ, सांस्कृतिक परिवर्तन, लोक जीवन और मानवीय चेतना के गहन विश्लेषण के लिए जाना जाता है। वे ‘Eastern Scientist’ सहित विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं से जुड़े होकर समसामयिक विषयों पर वैचारिक लेख प्रस्तुत करते हैं। उनकी प्रमुख कृतियों में महान गणराज्य गढ़मण्डला-इतिहास, रिसर्च इन तप्पाडोमागढ़, कोरोना काल कथा-स्वर्ग में सेमीनार-उपन्यास, कुरुना से कामाख्या-यात्रिकी तथा लोकतंत्र और नदी, लोकतंत्र और रेलगाड़ी, जरा सोच के बताना, लटें उड़ने से बसंत नहीं आता, नंगी कविता : अंधा कवि – काव्य संग्रह आदि शोध एवं साहित्यिक कृतियाँ शामिल हैं।

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