देवी कामाख्या-11: कामाख्या के भैरव उमानन्द (कौल परंपरा और पारिस्थितिक संकट)

Culture | संस्कृति

Date : June 18, 2026   |   Author : डॉ. अचल पुलस्तेय

Goddess Kamakhya-11: Umananda, The Bhairava of Kamakhya and the Kaula Matrix

Completing the metaphysical synthesis of the Kamakhya pilgrimage, this tenth volume (Goddess Kamakhya-10) offers a critical exposition of 'Bhairava Umananda'—the protective masculine anchor located on the tiny riverine islet of Bhasmachal (Peacock Island) in the middle of the Brahmaputra. This study decodes the esoteric philosophy of the Kaula sect, detailing the non-dual concepts of Anandeshvara-Anandeshvari, the unorthodoxy of Shaiva Marriage as detailed in the Kularnava Tantra, and the psychological liberation from the Ashta-Pasha (eight fetters) through the ritual of Bhairavi Chakrarchan.

Historically, it evaluates the 1694 CE Ahom construction under King Gadadhar Singha, its subsequent destruction in the 1897 earthquake, and its reconstruction by a Vaishnava merchant. Crucially, the article addresses the contemporary ecological crisis threatening the island's endemic Golden Langurs due to modern interventions like ropeways, proving that while historical, Islamic (Aurangzeb's land grants recorded in 'Pavitra Asom'), and institutional structures shifted, the primitive tribal foundations of the shrine seamlessly evolved into the wider mosaic of the Sanatana continuum.

Keywords:Umananda Bhairava, Kaula Sect, Bhairavi Chakrarchan, Shaiva Marriage, Bhasmachal, Ahom Architecture, Golden Langur, Ecological Crisis, Historical Dynamics.

Umanando Temple

शक्तिपीठों की शास्त्रीय और तांत्रिक अवधारणा तब तक अधूरी रहती है, जब तक कि उस पीठ के रक्षक और अधिष्ठाता भैरव के स्वरूप को समाहित न किया जाए। कौल-मार्ग के अनुसार, जहाँ ऊर्जा का केंद्र (शाक्त पीठ) होगा, वहाँ उसे संतुलित और नियंत्रित करने वाली शिव-ऊर्जा (भैरव) अनिवार्य रूप से उपस्थित होगी। नीलांचल का कामरुप कामाख्या महापीठ विन्यास, ब्रह्मपुत्र नदी के ठीक मध्य, दुनिया के सबसे छोटे नदी द्वीप पर प्रतिष्ठित 'उमानंद भैरव' के बिना अपूर्ण है, जिन्हें स्थानीय असमिया संस्कृति में अगाध श्रद्धा के साथ 'उमानन्दो देवलोई' कहा जाता है। सनातन परंपरा में शिव का मात्र यही एक ऐसा मंदिर है, जहाँ शिव के नाम के साथ 'नाथ' या 'ईश्वर' के बजाय 'आनंद' लगा हुआ है। असल में यह तंत्र के कौल संप्रदाय का मुख्य केंद्र है। इस संप्रदाय में शिव-शक्ति को आनन्देश्वर-आनन्देश्वरी अथवा आनंद भैरव-आनंद भैरवी की संज्ञा दी गई है।

कौल परंपरा, शैव विवाह और भैरवी चक्रार्चन

कौल संप्रदाय की मूल अवधारणा में स्त्री और पुरुष युग्म रूप में साधना करते हैं; यहाँ एकल साधना के लिए कोई स्थान नहीं है। तांत्रिक मान्यता है कि शक्ति के अभाव में शिव 'शव' मात्र रह जाते हैं, और शिव के बिना शक्ति 'चांडालिनी' का रूप ले लेती है। इसी परम अद्वैत को साधने के लिए इस संप्रदाय में साधक और साधिका साधना के परम उद्देश्य से विवाह करते हैं। कुलार्णव तंत्र में इसे 'शैव विवाह' कहा गया है, जो सनातन परंपरा के पारंपरिक आठ विवाह प्रकारों से सर्वथा भिन्न है। इस विवाह में गुरु और उपस्थित साधक-साधिकाएं उस युगल को साक्षात् आनन्देश्वर-आनन्देश्वरी स्वरूप मानकर उनका पूजन करते हैं। यहाँ किसी बाह्य आडंबर की आवश्यकता नहीं होती; केवल “अहं भैरव-त्वम् भैरवी, अहं भैरवी-त्वम् भैरव” (मैं भैरव हूँ-तुम भैरवी हो, मैं भैरवी हूँ-तुम भैरव हो) की मानसिक और वाचिक धारणा से विवाह संपन्न हो जाता है। साधना और पूजन की इस रहस्यमयी विधा को 'भैरवी चक्रार्चन' कहा जाता है। कौल मत के अनुसार, इस भैरवी चक्र में बैठते ही साधक जाति, वर्ण और धर्म के कृत्रिम बंधनों से तात्कालिक रूप से मुक्त हो जाता है। वह मानव चेतना को जकड़ने वाले 'अष्ट पाशों'—अर्थात: लज्जा, भय, घृणा, शंका, कुल, शील, मान और जुगुप्सा से मुक्त होकर इसी जीवन में मोक्ष को प्राप्त कर लेता है। जो इन अष्ट पाशों से बँधा है, वह 'जीव' (पशु) है, और जो इससे मुक्त हो जाता है, वही 'शिव' है। कौल परंपरा में आनंद के इसी स्थायी भाव को मोक्ष माना गया है। कौलों का स्पष्ट और तार्किक मत है कि मृत्यु के बाद मोक्ष की बात करना केवल एक छलावा या धोखा है। कुलार्णव तंत्र के अनुसार, मनुष्य के जन्म का मूल स्रोत ही चरम आनंद है; शिव-शक्ति अथवा स्त्री-पुरुष के चरम आनंद का परिणाम ही नए जीव का प्राकट्य है। परंतु संसार के प्रभाव में आकर मनुष्य इस आदिम आनंद को विस्मृत कर देता है और अष्ट पाशों में बँधकर जीवित रहते हुए ही नर्क भोगने लगता है। इस विस्मृत आनंद को भैरवी चक्रार्चन के माध्यम से पुनः प्राप्त किया जा सकता है। यही कारण है कि यहाँ शिव को 'नाथ' के स्थान पर 'उमा आनंद-उमानन्द' या 'आनन्देश्वर' कहा जाता है। इस संप्रदाय में दीक्षा के समय साधक के नाम के अंत में आनंद शब्द जोड़ा जाता है (जैसे अमृतानन्द, जयानन्द, अघोरानन्द) और साधिका के नाम के साथ 'आनन्देश्वरी' जुड़ जाता है।

भस्माचल का भूगोल और आधुनिक विकास का आघात

ब्रह्मपुत्र की प्रचंड और तेज धार से घिरे इस पहाड़ी द्वीप के शिखर पर उमानंद मंदिर अवस्थित है। जब हम छोटे जहाजों या स्टीमर से यहाँ उतरते हैं, तो ब्रह्मपुत्र की लहरों को स्पर्श करती विशाल शिलाएँ, प्राचीन वृक्ष, गुफाएँ और चारों ओर लहराती जलराशि का एक विहंगम दृश्य सम्मुख उपस्थित होता है। यहाँ से करीब 150 घुमावदार और खड़ी प्रस्तर सीढ़ियाँ चढ़कर पहाड़ी के शिखर पर पहुँचा जाता है। शिखर पर पहुँचने पर चट्टानी सतह का एक छोटा सा समतल हिस्सा दिखाई देता है, जिसे संभवतः पहाड़ को काटकर बनाया गया है। यहाँ श्रद्धालुओं की आवश्यकता के लिए टिन-शेड में कुछ दुकानें बनी हुई हैं। अभी 2022 तक इस पहाड़ी की झाड़ियों-पेड़ों पर काली बिल्लियों और सुनहरे बालों वाले लंगूर रहते थे। ये दुर्लभ प्रजाति के स्वर्ण लंगूर (Golden Langurs) और विशिष्ट काली बिल्लियाँ इसी द्वीप पर प्राकृतिक रूप से पाई जाती थी। परंतु अब विकास और सुन्दरीकरण की सनक में खत्म हो गयी है। मंदिर के विस्तार में उनका आश्रय पेड़ और झाड़ियाँ काट दी गयी। अत्यधिक मानवीय आवाजाही, पर्यटकों द्वारा फैलाए गए संक्रमण और हाल ही में बने रोपवे (Ropeway) की निरंतर गड़गड़ाहट व यांत्रिक शोर को यह संवेदनशील जीव बर्दाश्त नहीं कर पाये और विलुप्त हो गये। आधुनिक सभ्यता में 'विकास की अंधी हवस' किस प्रकार मूक जीवों और दुर्लभ वनस्पतियों के लिए काल बनती जा रही है, यह द्वीप इसका प्रत्यक्ष और कारुणिक उदाहरण है।

पौराणिक मान्यतायें

मंदिर के बारे में बहुत सी किंवदंतियाँ है,कालिका पुराण के अनुसार भगवान शिव ने कामदेव को यहीं भस्म करने के बाद पुनर्जीवन दिया था। इसलिए इसे भस्मकूट पर्वत तथा शिव को भस्मानन्द भी कहा जाता है। एक कथानक के अनुसार आनन्देश्वरी शक्ति उमा और आनन्देश्वर शिव का पहला मिलन यहीं हुआ था। इसलिए हिन्दी में उमानन्द,असमी में उमानन्दो कहा जाता है,उमानन्द कामाख्या के भैरव है। कालिका पुराण में शिवलिंग के गह्वर को उर्वशी कुण्ड कहा गया है,जिसमें उर्वशी अप्सरा का वास है,जो देवी कामाख्या और उमानन्द को अमृत सोम पान कराती हैं। इसलिए इस पहाड़ी को उर्वशी द्वीप भी कहते हैं। बरसात में दर्शनार्थियों के लिए मंदिर बन्द हो जाता है। यहाँ रहने वाले बरसात भर के लिए खाने-पीने का जरूरी सामान रख लेते हैं।

स्थापत्य कला और इतिहास के थपेड़े

कामाख्या महापीठ की ही भाँति उमानंद में भी मंदिर का सबसे प्राचीन और मूल भाग एक गहरी प्राकृतिक गुफा के भीतर स्थित 'स्वयंभू शिवलिंग' है। गुफा के इस आदिम विग्रह के अतिरिक्त शेष बाह्य मंदिर संरचनाएं बाद के कालखंडों की हैं। पत्थरों को काटकर बनाई गई मूर्तियाँ और बारीक नक्काशी प्रारंभिक मध्यकाल (7वीं-8वीं सदी) की शिल्प शैली की याद दिलाती हैं।

ऐतिहासिक प्रलेखों के अनुसार, इसके मुख्य मंदिर का निर्माण अहोम राजा गदाधर सिंघा ने कराया था, जिसे सन् 1694 ईस्वी में उनके कुशल शिल्पी 'फुकनगढ़गन्या हांडिक' नामक कलाकार ने मूर्त रूप दिया था। परंतु, सन् 1897 के विनाशकारी भूकंप में वह ऐतिहासिक अहोम ढांचा पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया। वर्तमान में जो मंदिर हमें दिखाई देता है, वह बाद में एक संपन्न वैष्णव व्यापारी द्वारा पुनर्निमित कराया गया है। उसी कालखंड में यहाँ चौकोर हॉल (मंडप) तथा भगवान विष्णु, गणेश आदि की मूर्तियाँ और सहायक मंदिर बनाए गए, जो इस तांत्रिक पीठ में शैव-वैष्णव समन्वय की एक नई बयार को दर्शाता है।

ऐतिहासिक/पौराणिक कालखंड घटना / संदर्भ दार्शनिक व व्यावहारिक स्वरूप
पौराणिक काल (कालिका पुराण) कामदेव का दहन और पुनर्जीवन भस्मकूट पर्वत / भस्मानंद शिव
तांत्रिक आख्यान उमा और शिव का प्रथम मिलन उमानंद (असमिया: उमानन्दो)
उर्वशी कुंड का मिथक अप्सरा उर्वशी का गह्वर में वास उर्वशी द्वीप (अमृत सोम-पान का स्थल)
अहोम काल (1694 ई.) राजा गदाधर सिंह द्वारा निर्माण अहोम स्थापत्य और प्रचुर विधिक भूमि-दान
आधुनिक काल (1897 ई. के बाद) भूकंप के बाद वैष्णव व्यापारी द्वारा जीर्णोद्धार वर्तमान चौकोर हॉल और वैष्णव देवमंडल का समावेश

ऐतिहासिक किंवदंतियाँ और औरंगज़ेब का दान

इस मंदिर के इतिहास के पन्नों में कुछ अत्यंत विस्मयकारी विरोधाभासी आख्यान भी मिलते हैं। असम साहित्य सभा द्वारा प्रकाशित अनीमुल इस्लाम की सुप्रसिद्ध पुस्तक ‘पवित्र असोम’ के अनुसार, मुगल शासक औरंगज़ेब की कामरूप यात्रा में, ब्रह्मपुत्र की तेज धार और भँवर में उसकी नाव डूबने लगी। संकट की उस घड़ी में, साथ में बैठे एक हिंदू राजा की मन्नत और प्रार्थना से नाव चमत्कारिक रूप से बचकर सुरक्षित किनारे लग गई। इस घटना से कृतज्ञ होकर औरंगज़ेब ने दिल्ली लौटने के बाद शाही खजाने से कामाख्या और उमानंद दोनों मंदिरों के लिए बहुमूल्य दान भिजवाया, तथा बंगाल के तत्कालीन मनसबदार को आदेश देकर यहाँ के पुजारी परिवारों को विधिक रूप से विस्तृत भूमि (जागीर) दिलवाई। इसके विपरीत, कुछ स्थानीय लोक-श्रुतियाँ यह भी कहती हैं कि मुगल सैनिकों ने अपने सैन्य अभियानों के दौरान इस मंदिर की पवित्रता को खंडित करने का प्रयास किया था।

इस द्वीप का उतार-चढ़ाव भरा इतिहास सुनने के बाद, एक लोक-अध्येता के रूप में मेरे मन में यह विचार कौंधा कि कामाख्या की ही तरह उमानंदो पीठ पर भी पूजा की शुरुआत प्रागैतिहासिक काल में यहाँ के आदिम कुलों द्वारा प्रकृति-पूजा के रूप में शुरू की गई होगी। कालान्तर में, विचारों के समावेशन और ऐतिहासिक संक्रमणों से गुजरते हुए, यह पीठ आज हमारे इस बहुआयामी और विविधता से भरे सनातन विमर्श का एक अटूट - अभिन्न हिस्सा बन चुका है।

विषय की गहराई को समझने हेतु लेखक के जमीनी शोध और वास्तविक अनुभवों पर आधारित इन दो चर्चित पुस्तकों का अध्ययन करें— यात्रा-वृत्तांत 'कुरुना से कामाख्या' तथा शोध-आधारित उपन्यास 'रिसर्च इन तप्पाडोमागढ़'
Dr. Achal Pulastey
About the Author

डॉ. अचल पुलस्तेय एक समकालीन बहुविषयक विद्वान, सशक्त लेखक, चिंतक, लोक अध्येता, संपादक एवं कवि हैं। उनका लेखन सामाजिक यथार्थ, सांस्कृतिक परिवर्तन, लोक जीवन और मानवीय चेतना के गहन विश्लेषण के लिए जाना जाता है। वे ‘Eastern Scientist’ सहित विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं से जुड़े होकर समसामयिक विषयों पर वैचारिक लेख प्रस्तुत करते हैं। उनकी प्रमुख कृतियों में महान गणराज्य गढ़मण्डला-इतिहास, रिसर्च इन तप्पाडोमागढ़, कोरोना काल कथा-स्वर्ग में सेमीनार-उपन्यास, कुरुना से कामाख्या-यात्रिकी तथा लोकतंत्र और नदी, लोकतंत्र और रेलगाड़ी, जरा सोच के बताना, लटें उड़ने से बसंत नहीं आता, नंगी कविता : अंधा कवि – काव्य संग्रह आदि शोध एवं साहित्यिक कृतियाँ शामिल हैं।

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