Culture | संस्कृति
Date : June 12, 2026 | Author : डॉ.अचल पुलस्तेय
This paper extends the trans-regional anthropological inquiry into the vernacular traditions of Goddess Kamakhya, mapping her esoteric footprints onto the socio-cultural landscapes of Central and Southern India. Shifting focus from the Puranic Sanskritized core of the Nilachal hills, the study explores how the deity undergoes a structural metamorphosis into 'Kamru Mai' within the tribal and agrarian subaltern lore of Chhattisgarh and Madhya Pradesh, and subsequently into the ritualistic paradigm of 'Kamrupan Pattu' and Kamakshi in Kerala and Tamil Nadu. By deciphering oral epics, indigenous totems, and performance arts like Kamrupan Pattu (the ritual songs of Kerala), the author argues that Kamakhya operates as a historical continuum of the pre-Vedic Mother Goddess archetype. This pan-Indian diffusion demonstrates an unwritten subaltern integration, wherein regional sub-castes and non-canonical practitioners reconstruct the sacred female body as a symbol of cosmic protection, anti-colonial memory, and community preservation across ecological divides.
Keywords: Kamru Mai, Kamrupan Pattu, Kamakshi, Central-Southern Folklore, Subaltern Integration, Vernacularization, Anthropological Continuum.
असम के नीलांचल पर्वत से प्रस्फुटित हुई शक्ति और सृजन की धारा केवल उत्तर या पूर्वी भारत की धमनियों तक सीमित नहीं रही। जब हम भारतीय उपमहाद्वीप के भौगोलिक नक्शे को लांघकर मध्य भारत के घने जंगलों, पठारों और दक्षिण भारत के द्रविड़ भाषाई-सांस्कृतिक अंचल में उतरते हैं, तो देवी कामाख्या की उपस्थिति एक नए, विस्मयकारी और जीवंत रूप में दिखाई देती है। यहाँ देवी नीलांचल के भव्य तांत्रिक कर्मकांडों से विलग होकर ठेठ ग्रामीण कुलदेवी, आदिम जनजातीय शक्ति और लोक-मंत्रों की अधिष्ठात्री कामरू माई के रूप में रची-बसी हैं।
देवी कामाख्या, शास्त्र से अधिक लोक में व्याप्त हैं। इससे यह संकेत मिलता है कि देवी कामाख्या मूलतः आदिम लोक की हैं, जिन्हें बाद में शास्त्रों में समाहित कर लिया गया।
मध्य भारत का लोकजीवन: शाबर मंत्र और जनजातीय चेतना
मध्य भारत (विशेषकर मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, बुंदेलखंड और बघेलखंड के ग्रामीण व जनजातीय अंचल) में कामाख्या माई लोक-साधना के केंद्र में विराजमान हैं। यहाँ शास्त्र का प्रभाव भले ही परोक्ष हो, लेकिन लोक-चेतना में उनकी जड़ें अत्यंत गहरी हैं।
1. बुंदेली-बघेली शाबर मंत्रों में 'कामरू देस'
बुंदेलखंड और बघेलखंड के ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी 'गुनिया' (लोक-वैद्य या ओझा) और लोक-साधकों का एक अदृश्य संसार सक्रिय है। यहाँ सर्पदंश (साँप का काटना), बिच्छू का डंक, पशुओं की बीमारियाँ और फसलों को व्याधियों से बचाने के लिए जिन शाबर मंत्रों का प्रयोग होता है, उनमें 'कामरू देस' (कामरूप देश) और कामरू कामाख्या' का संदर्भ अनिवार्य रूप से आता है।
मंत्रों में दुहाई का स्वरूप: इन अंचलों के लोक-मंत्रों में यह पंक्ति अत्यंत आम है— "दुहाई कामरू कमिच्छा माई की..." या "उलटत वेद, पलटत काया, जा कहुँ आदेश कामरू कामाख्या..."। लोक-विश्वास है कि यदि मंत्र में कामाख्या माई या कामरूप देश की आण (कसम) न दी जाए, तो मंत्र का प्रभाव जाग्रत नहीं होता। इस साधना में लगे साधक प्रायः समाज के वंचित और अद्विज वर्गों से होते हैं।
2. छत्तीसगढ़ी लोक-दर्शन और बैगा-गोंड परंपरा
छत्तीसगढ़ की समृद्ध जनजातीय संस्कृति में तंत्र और लोक-चिकित्सा का एक प्राचीन अंतर्संबंध है। छत्तीसगढ़ी लोक-कथाओं और 'जस गीतों' (भक्ति गीतों) में कामाख्या देवी को अत्यंत आदर से 'कामरू माई' के नाम से पुकारा जाता है।
- बैगा जनजातीय साधना: बैगा समाज को मध्य भारत का सबसे बड़ा 'भूमका' (आदिम लोक-साधक) माना जाता है। बैगा लोक-आख्यानों में उल्लेख मिलता है कि उनके आदि-पुरखों ने अपनी तांत्रिक सिद्धियों को पूर्ण करने के लिए सुदूर 'कामरू देस' की यात्रा की थी और वहाँ से कामाख्या माई के आशीष रूप में मिट्टी लेकर लौटे थे।
- लोना चमारिन और इस्माइल जोगी की स्मृतियाँ: छत्तीसगढ़ी और गोंडवाना के लोक-आख्यानों में लोना चमारिन और इस्माइल जोगी के किस्से बहुत चाव से गाए जाते हैं। इन पात्रों को देवी कामाख्या का परम सिद्ध शिष्य माना जाता है, जिन्होंने राजसी महलों को छोड़कर जंगलों और आदिवासियों के बीच देवी की 'सहज साधना' को स्थापित किया।
3. कुलदेवी परंपरा और पिंडी रूप में स्थापना
मध्य भारत के अनेक ग्रामीण परिवारों और विशिष्ट जातियों (विशेषकर शिल्पकार, कारीगर और कृषक समुदायों) में देवी कामाख्या कुलदेवी के रूप में पूजित हैं। यहाँ गाँवों में देवी का कोई भव्य मंदिर या मूर्ति नहीं होती। वे अक्सर गाँव की सीमा पर किसी महुआ या नीम के वृक्ष के नीचे, मिट्टी के ओटले (चबूतरे) पर 'सात पिंडियों' (सप्तमातृकाओं का प्रतीक) के रूप में या एक साधारण लाल पत्थर (शिला) के रूप में विराजमान होती हैं। यह परम्परा उत्तर भारत के गाँवों मे भी है।
दक्षिण भारत का लोकजीवन: 'मंत्रवादम' और आदिम संरचनात्मक दर्शन
दक्षिण भारत के द्रविड़ सांस्कृतिक अंचल में कामाख्या शब्द लोकबोलियों में सीधे तौर पर शायद उतना सुनाई न दे, लेकिन जब हम इसकी गहराई में उतरते हैं, तो 'कामरूप पीठ', 'शाबर तंत्र' (केरल का 'मंत्रवादम') और 'ग्राम देवते' की परंपरा के माध्यम से देवी कामाख्या दक्षिण के जनजीवन में बहुत गहरे से समाहित मिलती हैं।
1. केरल का 'मंत्रवादम' और कामरूप विद्या
केरल की लोक-साधना और पारंपरिक चिकित्सा पद्धति में 'मंत्रवादम' (लोक-तंत्र और आध्यात्मिक चिकित्सा) का एक बहुत बड़ा प्रभाव है। केरल के ग्रामीण अंचलों में बुरी शक्तियों से रक्षा, विष-निवारण और मानसिक व्याधियों के इलाज के लिए जो तांत्रिक विद्याएँ प्रचलित हैं, उनमें 'कामरूप' को तंत्र की गंगोत्री माना गया है।
कामरूपन पाट्टू (Kamrupan Pattu): केरल के कुछ लोक-अनुष्ठानों में 'कामरूपन' या 'कामरूपी' विद्या का विशेष गायन होता है। यहाँ लोक-विश्वास है कि तंत्र की जो सबसे तीव्र और अचूक व्यावहारिक धाराएँ हैं, वे सुदूर उत्तर-पूर्व के कामरूप देश से ही दक्षिण में आईं। केरल के प्रसिद्ध लोक-ग्रंथ 'ऐतीह्यमाला' (केरल की लोक-कथाओं का संग्रह) में कई ऐसे सिद्धों का वर्णन मिलता है, जिन्होंने कामरूप जाकर कामाख्या पीठ से आशीर्वाद प्राप्त किया था।
2. 'रेणुका-यल्लम्मा' परंपरा और कामाख्या का दार्शनिक सेतु
कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के ग्रामीण अंचलों में हाशिए के समाज और बहुजन लोक-संस्कृति की सबसे प्रभावशाली देवी 'रेणुका यल्लम्मा' हैं। कामाख्या परंपरा और यल्लम्मा परंपरा में जो संरचनात्मक समानता है, वह भारतीय लोक-दर्शन की अंतर्निहित एकता को दर्शाती है:
| कामाख्या परंपरा (उत्तर-पूर्व/नीलांचल) | यल्लम्मा परंपरा (दक्षिण भारत/कर्नाटक-आंध्र) |
|---|---|
| अंग-पूजा (योनि-पीठ): कोई पूर्ण मूर्ति नहीं, केवल सृजन के मूल अंग की प्रधानता। | मुखमंडल पूजा: केवल कटे हुए सिर (मुख) की पूजा, धड़ अदृश्य। |
| शास्त्र को चुनौती: पोथियों और पुरोहितों से दूर, लोक-साधकों का आधिपत्य। | समरसता की साधना: 'जोगती' (लोक-साधिकाएं) चौंडक बजाकर जाति-वर्ग के भेद तोड़ती हैं। |
अखंड शरीर के स्थान पर 'अंग-विशेष' या 'कटे सिर' की यह पूजा शास्त्र के अहंकार को चुनौती देती है और आदिम सृजन-शक्ति व पोषण भाव को रेखांकित करती है।
3. आंध्र-तेलंगाना में 'ग्राम देवते' और आदिम कामाख्या स्वरूप
आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के गाँवों में 'ग्राम देवते' (गाँवों की संरक्षिका देवियाँ) जैसे पोलेरम्मा, पोचम्मा और कट्टमैय्या का शासन चलता है। ये देवियाँ मूलतः गैर-ब्राह्मणवादी या अद्विज जातियों की कुलदेवियाँ हैं। कामाख्या की ही तरह, इन्हें प्रसन्न करने के लिए किसी संस्कृत श्लोक की आवश्यकता नहीं होती; इन्हें लोक-भाषा के गीतों, कडुवे नीम के पत्तों, मिट्टी के बर्तनों में पकाए गए 'बोनम' (चावल का भोग) और लोक-वाद्यों की थाप से रिझाया जाता है। खेतों की मेड़ पर बैठी ये शिलाएँ रूप और स्वभाव में नीलांचल की आदिम कामाख्या का ही विस्तार हैं।
4. श्रीविद्या और लोक का समन्वय
दक्षिण भारत में 'श्रीविद्या' (आदि शंकराचार्य द्वारा तांत्रिक साधना की परिष्कृत धारा) का बहुत गहरा प्रभाव है। यद्यपि श्रीविद्या को बहुत शास्त्रीय माना जाता है, लेकिन इसके मूल में जो 'काम कला' और 'कामरूप पीठ' का सिद्धांत है, वह सीधे देवी कामाख्या से जुड़ता है। कांचीपुरम की 'कामाक्षी' के लोक-स्वरूप में यह विश्वास घुला हुआ है कि उनके भीतर जो 'काम' (इच्छा और सृजन का बीज) है, उसकी मूल ऊर्जा कामरूप (कामाख्या) से ही दक्षिण की ओर प्रवाहित होती है।
उत्तर से दक्षिण तक एक ही आध्यात्मिक सूत्र
'देवी कामाख्या' की इस शोध-शृंखला के समेकित अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि कामाख्या भारतीय लोक-चेतना की वह अदृश्य और गहरी जड़ हैं, जिसने पूरे उपमहाद्वीप को एक ही सांस्कृतिक धागे में पिरोया है। असम के नीलांचल पर्वत से निकली सृजन और लोक-कल्याण की जो धारा उत्तर भारत में 'कँवरु कमिच्छा' बनती है, वही मध्य भारत के आदिवासी भजनों और दक्षिण के 'मंत्रवादम' व 'ग्राम देवियों' के आदिम स्वरूप में धड़कती है।
वे केवल एक भौगोलिक शक्तिपीठ नहीं हैं, बल्कि वे शास्त्र के एकाधिकार के विरुद्ध लोक की वह मूक और सशक्त अभिव्यक्ति हैं, जो सदियों से भारत के जनजीवन को आंतरिक शक्ति, समरसता और अटूट आत्मबल प्रदान करती आ रही हैं।
देवी कामाख्या-6:अम्बुवाची पर्व का लोक दर्शन व रहस्य
इस अंक में यह जानेंगे कि अम्बुवाची पर्व का लोक दर्शन और रहस्य क्या हैं? अम्बु जल का पर्यायवाची है,असमी या बोडो भाषा में रजःस्राव का अम्बुवाची कहते है।इस संस्कृति में कन्या के प्रथम रजःस्राव हो उत्सव की तरह देखा जाता है...इसके विपरीत देश के अन्य संस्कृतियों अवपवित्र माना जाता है.....
डॉ. अचल पुलस्तेय एक समकालीन बहुविषयक विद्वान, सशक्त लेखक, चिंतक, लोक अध्येता, संपादक और कवि हैं। उनका लेखन सामाजिक यथार्थ, सांस्कृतिक परिवर्तन, लोक जीवन और मानवीय चेतना के गहन विश्लेषण के लिए जाना जाता है। वे ‘Eastern Scientist’ सहित विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं से जुड़े होकर समसामयिक विषयों पर वैचारिक लेख प्रस्तुत करते हैं। उनकी प्रमुख कृतियों में महान गणराज्य गढ़मण्डला-इतिहास, रिसर्च इन तप्पाडोमागढ़, कोरोना काल कथा-स्वर्ग में सेमीनार-उपन्यास, कुरुना से कामाख्या-यात्रिकी तथा लोकतंत्र और नदी, लोकतंत्र और रेलगाड़ी, जरा सोच के बताना, लटें उड़ने से बसंत नहीं आता, नंगी कविता : अंधा कवि – काव्य संग्रह आदि शोध एवं साहित्यिक कृतियाँ शामिल हैं।

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