देवी कामाख्या-4: शाबर तंत्र और उत्तर-पश्चिम भारतीय लोकमानस में 'कमरु कमिच्छा'

Culture | संस्कृति

Date : June 11, 2026   |   Author : डॉ. अचल पुलस्तेय

Goddess Kamakhya-4: Shabar Tantra and the Subaltern Consciousness of 'Kamru Kamichha' in North-Western Indian Folklore

This article explores the socio-cultural expansion and vernacular manifestation of Goddess Kamakhya, traditionally anchored at the Nilachal hills of Assam, across the diverse folklore of North-Western and Eastern India. Departing from classical Sanskritized, elite-centric Puranic discourses, the study employs an ethno-historical and anthropological approach to analyze how the deity transitions into 'Kamru Kamichha' within regional dialects including Bhojpuri, Maithili, Magahi, Bengali, Punjabi, and Himachali. The author critically examines Shabar Tantra—a subaltern esoteric system characterized by regional vocabulary, local totems, and an egalitarian ethos that dismantles structural hierarchies of caste, gender, and Vedic initiation. By focusing on non-canonical spiritual practitioners such as Rahasu Guru, Naina Jogin, and Hiriya-Jiriya, who remain absent from official state chronicles but are immortalized in collective memory, the paper highlights a parallel universe of faith.

The narrative of Rahasu Guru in the Bihar-Uttar Pradesh borderland serves as a poignant metaphor for the conflict between state arrogance and subaltern humility, where the deity acts not as a cosmic destroyer but as a nurturer during famines and epidemics. Ultimately, the paper argues that Kamakhya embodies a profound folk philosophy that reverses patriarchal and elite monopolies over the sacred, positioning the female body and cyclical creation as symbols of community resilience, sustenance, and unwritten subaltern history.

Keywords: Kamakhya, Shabar Tantra, Kamru Kamichha, Subaltern Consciousness, Rahasu Guru, Folklore, Vernacularization.

देवी कामाख्या, शास्त्र से अधिक लोक में व्याप्त हैं। इससे यह संकेत मिलता है कि देवी कामाख्या मूलतः आदिम लोक की हैं, जिन्हें बाद में शास्त्रों में समाहित कर लिया गया।

असम के नीलांचल पर्वत पर स्थित देवी कामाख्या, तंत्र और असम के बाहर देश की विविध लोक-संस्कृतियों में भी गहराई से स्थापित हैं। देवी की स्मृतियाँ शास्त्रों से कहीं अधिक लोकगीतों, कथाओं, शाबर मंत्रों, जनश्रुतियों और चमत्कारों में सुरक्षित हैं।

पुराणों, तंत्र-ग्रंथों और बौद्ध साहित्य में देवी कामाख्या का विस्तृत उल्लेख मिलता है, किन्तु उनका वास्तविक प्रभाव केवल इन पोथियों तक सीमित नहीं है। कामाख्या की एक दूसरी समानांतर दुनिया भी है—लोक-विश्वास की दुनिया। यहाँ देवी संस्कृत के श्लोकों में नहीं, बल्कि उत्तर, पूर्वी और पश्चिमोत्तर भारत की भोजपुरी, मैथिली, मगही, बंगाली, राजस्थानी, पंजाबी, सिंधी, नेपाली, कुमाउँनी और गढ़वाली बोलियों में रची-बसी हैं।

यहाँ उनका स्वरूप शास्त्रीय से अधिक लोक का है। उनका संबंध राजाओं और पुरोहितों से उतना नहीं, जितना किसानों, चरवाहों, कारीगरों, स्त्रियों, दलितों, आदिम और कथित पिछड़ी जातियों के उन साधकों से है, जो किसी दुःख, संकट, अकाल या महामारी के समय अपनी ठेठ बोली में देवी को पुकारते हैं। लोक-विश्वास है कि इस पुकार को सुनकर देवी कामाख्या सिंह पर नहीं, बल्कि घोड़ों से जुते रथ पर सवार होकर तुरंत पहुँच जाती हैं और अपनी कृपा बरसाने में जाति-धर्म का कोई भेद नहीं करतीं।


शाबर तंत्र : लोकभाषाओं में शक्ति-साधना

कामाख्या साधना की जिन धाराओं ने व्यापक लोकमानस को प्रभावित किया, उनमें शाबर तंत्र विशेष रूप से उल्लेखनीय है। शाबर मंत्रों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे संस्कृत के स्थान पर लोकभाषाओं और क्षेत्रीय बोलियों में रचे गए हैं। इनमें ग्राम्य शब्दावली, स्थानीय प्रतीक, लोक-देवताओं के नाम और जनजीवन के व्यावहारिक अनुभव समाहित हैं।

  • व्यावहारिक उद्देश्य: इन मंत्रों का लक्ष्य केवल पारलौकिक आध्यात्मिक साधना या मोक्ष-कामना नहीं है, बल्कि ये रोग, भय, विष, अकाल, महामारी और दैनिक जीवन के कष्टों से मुक्ति के व्यावहारिक साधन हैं।
  • सामाजिक समरसता: इन मंत्रों की सबसे खास बात यह है कि ये जाति, धर्म, लिंग के भेदों और कठिन कर्मकांडों की वर्जनाओं से सर्वथा मुक्त हैं। जहाँ वैदिक या संस्कृत मंत्रों के प्रयोग से एक समय स्त्रियों और अद्विज जातियों को वंचित किया गया था, वहीं शाबर तंत्र ने जनसाधारण को अपनी साधना का अधिकार दिया। लोक-परंपरा में यह दृढ़ विश्वास है कि ये मंत्र अत्यंत सहज और शीघ्र जागृत होने वाले होते हैं।

नाथ परंपरा के प्रणेता मत्स्येन्द्रनाथ, गोरखनाथ तथा अनेक सिद्ध-साधकों ने कामरूप की इस शक्ति-साधना को देश के सुदूर क्षेत्रों तक पहुँचाने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई। परिणामस्वरूप, आदिम देवी कामाख्या का सांस्कृतिक प्रभाव असम की सीमाओं को लांघकर बंगाल, मिथिला, मगध, भोजपुरी अंचल, पंजाब, सिंध और停留हिमालयी क्षेत्रों तक फैल गया।


लोक-साधकों का अदृश्य संसार

शास्त्रीय इतिहास सामान्यतः राजाओं, युद्धों और साम्राज्यों को ही अपने पन्नों में स्थान देता है, किन्तु लोक-स्मृति अपने जन-नायकों और साधकों को कभी नहीं भूलती। राजकीय अभिलेखों में भले ही इनका नाम न मिले, लेकिन लोक-कथाओं और अनुष्ठानों में ये पात्र आज भी जीवित हैं:

क्षेत्र/अंचल लोक-स्मृति में सुरक्षित साधक और पात्र
बंगाल हिरिया और जिरिया
मिथिला नैना जोगिन और कुसुमा नाइन
मगध व अंग हिरिम मालिन और वीर सहलेस
भोजपुरी अंचल रहसु गुरु, गंगाराम, बाबूराम और सोमाराम औघड़
पंजाब और सिंध इस्माइल जोगी और लोना चमारिन
अखिल भारतीय नाथ परंपरा के मत्स्येन्द्रनाथ और गोरखनाथ

ये वे साधक हैं जिन्होंने लोकभाषाओं में देवी-साधना को लोक-कल्याण का माध्यम बनाया और कठिन समय में जनजीवन को जीने का संबल दिया।


कामरूप से भोजपुरी तक का सांस्कृतिक सेतु

भोजपुरी लोकजीवन में देवी कामाख्या अत्यंत अपनेपन के साथ “कँवरु कमिच्छा” या “कामरू कमिच्छा” के नाम से सुमिरन की जाती हैं। ग्रामीण अंचलों में ओझाओं और लोक-साधकों के 'पचरों' (लोक-भक्ति गीतों) में उनकी उपस्थिति आज भी किसी संस्कृत मंत्र से अधिक प्रभावी और जीवंत मानी जाती है। यह केवल एक धार्मिक प्रभाव नहीं, बल्कि सदियों पुराने सांस्कृतिक और व्यापारिक आदान-प्रदान का परिणाम है। व्यापार, तीर्थयात्रा, साधना और आजीविका की तलाश में पूर्वी भारत के लोग निरंतर कामरूप आते-जाते रहे और लौटते समय वे अपने साथ देवी की स्मृतियाँ व आशीष लेकर आए। धीरे-धीरे कामाख्या भोजपुरी क्षेत्र की अनेक कुलदेवियों—वामती माई, तरैनी, परमेसरी, समय माई, कुलकुला माई और थावे भवानी के रूप में स्थापित हो गईं।


रहसु गुरु और लोकशक्ति का संघर्ष

भोजपुरी लोक-विश्वास में रहसु गुरु की कथा विशेष महत्व रखती है। यह कथा किसी साम्राज्य-विस्तार की नहीं, बल्कि भूख, अकाल और लोक-जीवन के संघर्ष की गाथा है।

अकाल और आस्था की कथा: बिहार-उत्तर प्रदेश की सीमा पर स्थित मदनपुर राज्य में जब भीषण अकाल पड़ा, तब राजा मदन सिंह अपनी राजसत्ता के मद में डूबा रहा। भूख से तड़पती प्रजा के कल्याण के लिए देवी कामाख्या के अनन्य साधक रहसु गुरु ने देवी से गुहार लगाई। लोककथा के अनुसार, देवी ने रहसु को घास काटने को कहा। रहसु ने घास का ढेर इकट्ठा किया और देवी कामाख्या ने साक्षात् प्रकट होकर अपने सिंहों से उस घास की मड़ाई की, जिससे चमत्कारी रूप से प्रचुर मात्रा में चावल निकला। रहसु ने वह अनाज भूखी जनता में बाँट दिया।

जब राजा मदन सिंह को इस चमत्कार का पता चला, तो उसने अहंकारवश रहसु से देवी कामाख्या को साक्षात् दिखाने की जिद की। रहसु ने राजा को चेताया कि देवी का साक्षात् स्वरूप विनाशकारी हो सकता है, लेकिन राजा नहीं माना। अंततः देवी नीलांचल से चलकर मदनपुर की ओर बढ़ीं। लोक-मान्यता है कि कामाख्या से मदनपुर के मार्ग में देवी जहाँ-जहाँ रुकीं, वहाँ-वहाँ कामाख्या पीठ स्थापित हो गए (जैसे थावे भवानी)। अंत में राजा का अहंकार नष्ट हुआ और राजसत्ता ध्वस्त हो गई।

यही कारण है कि इतिहास की धूल में विलीन हो चुके राजाओं के विपरीत, लोक-साधक रहसु गुरु आज भी लोक-चेतना में आदर के साथ जीवित हैं।


लोक-देवियाँ बनाम शास्त्रीय देवियाँ: एक संरचनात्मक दर्शन

भारतीय धार्मिक परंपरा में 'लोक' और 'शास्त्र' समानांतर चलते रहे हैं, जहाँ 'लोक' आदिम और प्राचीन है, जो कालान्तर में शास्त्र का रूप ले लेता है। शास्त्रों में वर्णित दुर्गा, पार्वती, लक्ष्मी, सरस्वती और काली जैसे भव्य रूपों के साथ-साथ असंख्य स्थानीय कुलदेवियाँ ग्रामीण जीवन को संचालित करती हैं। लोक-विश्वास में इन सभी देवियों को देवी कामाख्या का ही विग्रह (रूप) माना जाता है, जो विशेषकर अद्विज जातियों की कुलदेवियाँ हैं।

कामाख्या की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे इन दोनों संसारों के बीच एक सेतु हैं:

  • शास्त्रीय स्वरूप: वे तंत्र-ग्रंथों की सर्वोच्च महाशक्ति और आद्याशक्ति हैं। नीलांचल पर्वत पर वे निराकार 'योनि-पीठ' के रूप में पूजित हैं।
  • लोक स्वरूप: गाँवों में वे किसी भव्य मूर्ति में नहीं, बल्कि पिंडी, पवित्र वृक्ष, शिला (पत्थर) या मिट्टी के टीले के रूप में पूजी जाती हैं। यद्यपि आधुनिक दौर में सांस्कृतिक समावेशन (Cultural Inclusion) के कारण अब इन स्थानों पर भी मूर्तियाँ स्थापित होने लगी हैं, फिर भी इनका मूल पिंडी रूप आज भी अक्षउन है।

स्त्री-शरीर और सृजन का लोक-दर्शन

कामाख्या परंपरा का सबसे क्रांतिकारी पक्ष स्त्री-शरीर और उसकी जैविक प्रक्रियाओं के प्रति अत्यंत प्रगतिशील दृष्टिकोण है। यहाँ ऋतुस्राव (Menstruation) और योनि को लज्जा या अशुद्धता की वस्तु न मानकर, सृष्टि, सृजन और निरंतरता का पावन प्रतीक माना गया है। लोक-परंपराओं में यही पिंडी या स्तन-भाव मातृत्व और पोषण के प्रतीक रूप में पूजे जाते हैं।

इस प्रकार, लोक-देवी का स्वरूप युद्ध और संहार की अपेक्षा सृजन, संरक्षण और जीवन-संवर्धन से जुड़ा है। वे केवल दैत्यों का वध करने वाली संहारक नहीं हैं; वे भूख, रोग, महामारी और अकाल के समय लोक-जीवन की रक्षा करने वाली करुणामयी माँ हैं। लोकगीतों में तो वे दो हाथों वाली एक सामान्य ग्रामीण स्त्री की तरह चित्रित की जाती हैं—जो झूला झूलती हैं, खेलती हैं, जिन्हें प्यास लगती है और जो किसी घर की स्त्री से पानी माँगकर बदले में उसे सुख-समृद्धि का आशीष दे जाती हैं।


निष्कर्ष: लोक-स्मृति की अमरता

मानव सभ्यताएँ बदलती हैं, राजवंश नष्ट हो जाते हैं, भव्य मंदिर समय के साथ खंडहरों में बदल जाते हैं और भाषाएँ भी रूपांतरित हो जाती हैं; किन्तु लोक-स्मृतियाँ कभी नहीं मरतीं। यही कारण है कि कामाख्या की गाथा केवल नीलांचल पर्वत तक सीमित नहीं रही। वह पचरों, शाबर मंत्रों और कुलदेवी परंपराओं के माध्यम से पूरे उत्तर और पूर्वी भारत की धमनियों में बह रही है।

आज भी जब कोई ग्रामीण स्त्री अपनी कुलदेवी के समक्ष मिट्टी का दीप प्रज्वलित करती है, जब कोई लोक-गायक ढोलक की थाप पर पचरा गाता है, या जब कोई ग्रामीण साधक लोक-मंत्रों का उच्चारण करता है, तब कामरूप की वही आदिम महाशक्ति उसके भीतर जीवित हो उठती है।

देवी कामाख्या को केवल एक भौगोलिक शक्तिपीठ या तांत्रिक केंद्र के रूप में देखना उनके वास्तविक सांस्कृतिक स्वरूप को बेहद सीमित कर देना होगा। वे वास्तव में 'लोकमानस की देवी' हैं—उन उपेक्षित और हाशिए के लोगों की देवी, जिनका इतिहास मुख्यधारा की लिखित किताबों में दर्ज नहीं हो सका। शाबर तंत्र, लोक-साधक और इन कथाओं का यह ताना-बाना प्रमाणित करता है कि कामाख्या भारतीय लोक-चेतना की वह अदृश्य और गहरी जड़ हैं, जिसने सदियों से भारत के जनजीवन को आंतरिक शक्ति, आशा और अटूट आत्मबल प्रदान किया है।

इस शृंखला का अगला भाग पढ़ें

देवी कामाख्या-5 : मध्य और दक्षिण भारत के लोकजीवन में 'कामरू माई'

इस अंक में यह जानेंगे कि इतिहास, पुराण, तंत्र से अलग देश के मध्य और दक्षिण भारत के लोक जीवन में देवी कामाख्या कितनी गहराई से रची-बसी हैं।

Dr. Achal Pulastey
About the Author

डॉ. अचल पुलस्तेय एक समकालीन बहुविषयक विद्वान, सशक्त लेखक, चिंतक, लोक अध्येता, संपादक और कवि हैं। उनका लेखन सामाजिक यथार्थ, सांस्कृतिक परिवर्तन, लोक जीवन और मानवीय चेतना के गहन विश्लेषण के लिए जाना जाता है। वे ‘Eastern Scientist’ सहित विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं से जुड़े होकर समसामयिक विषयों पर वैचारिक लेख प्रस्तुत करते हैं। उनकी प्रमुख कृतियों में महान गणराज्य गढ़मण्डला-इतिहास, रिसर्च इन तप्पाडोमागढ़, कोरोना काल कथा-स्वर्ग में सेमीनार-उपन्यास, कुरुना से कामाख्या-यात्रिकी तथा लोकतंत्र और नदी, लोकतंत्र और रेलगाड़ी, जरा सोच के बताना, लटें उड़ने से बसंत नहीं आता, नंगी कविता : अंधा कवि – काव्य संग्रह आदि शोध एवं साहित्यिक कृतियाँ शामिल हैं।

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