Culture | संस्कृति
Date : June 16, 2026 | Author : डॉ. अचल पुलस्तेय
This second and concluding part of the study (Goddess Kamakhya-9) examines the institutional governance, legal autonomy, and cosmic architectural layout of the Kamakhya Peeth. It traces the post-independence administrative shifts leading up to the landmark 2015 judgment of the Supreme Court of India, which restored the democratic autonomy of the traditional 'Baradeuri' trust via the unique 'Doloi' electoral system.
Furthermore, the article offers a structural analysis of the temple's spatial configuration—comprising the Natamandira, Pancharatna, Kalanta, and the Garbhagriha. It decodes the socio-religious significance of the maternal and menstruating sculptures carved onto the outer walls of the Natamandira. Finally, it provides a philosophical evaluation of the dual-polar deity Kameshvara-Kameshvari enshrined within the Kalanta zone, drawing cross-cultural parallels with the Yin-Yang of Chinese Taoism and the Tara-Bodhisattva of Buddhist Vajrayana, thereby establishing the shrine as a global symbol of the cosmic non-dual creative matrix.
Keywords: Baradeuri Trust, Doloi System, Legal Autonomy, Nilachal Architecture, Natamandira, Kameshvara-Kameshvari, Cosmic Non-Dualism, Garbhagriha.
बलियूप वाले मुख्य द्वार पर नक्काशीदार पत्थर के बड़े कलश और पद्म (कमल) उत्कीर्ण हैं। यहाँ यक्ष-यक्षिणी की मूर्तियाँ स्थापित हैं, जो अपनी शास्त्रीय वास्तुकला के आधार पर बारहवीं सदी की प्रतीत होती हैं।मंदिर के प्रवेश द्वार पर स्थित टिन-शेड के नीचे बना बलि-यूप आधुनिक काल की संरचना प्रतीत होती है, जिसके ठीक आगे मुख्य मंदिर अपनी स्थापत्य कला के चार सुस्पष्ट और भव्य खंडों में विभाजित दिखाई देता है। मुख्यद्वार से भीतर प्रवेश करते ही पहला खंड 'नटमंदिर' (नृत्य कक्ष) हमारे सामने आता है। यह आयताकार कक्ष विशुद्ध अहोम शैली का उत्कृष्ट नमूना है, जिसकी छत लम्बवत् गोलाकार रूप में कछुए की उभरी हुई पीठ (Tortoise Back) जैसी दिखाई देती है।
नटमंदिर की आंतरिक और बाहरी दीवारों पर विलक्षण भित्ति-मूर्तियां उत्कीर्ण हैं, जो इस पीठ के अंतर्निहित दर्शन और अगाध लोक-आस्था को पूरी प्रखरता से अभिव्यक्त करती हैं। विशेषकर इसकी दक्षिणी दीवार के बाहरी हिस्से में दो अत्यंत अद्भुत और विस्मयकारी मूर्तियाँ शिल्पगत रूप से दर्ज हैं। इनमें से एक मूर्ति में विवस्त्र माँ वात्सल्य भाव से अपने शिशु को स्तनपान कराती हुई दिखाई देती हैं, जो सृष्टि के पोषण और आदिम वात्सल्य का प्रतीक है; जबकि दूसरी मूर्ति एक रजस्रावित (रजस्वला) स्त्री की है। यह विशिष्ट मूर्ति तंत्र-विज्ञान के उस परम यथार्थ को उद्घाटित करती है जहाँ जनन-श्रम, स्त्रीत्व का जैविक चक्र और पृथ्वी की सृजनात्मक ऊर्जा को ही परम पवित्र मानकर पूजा जाता है।
स्थापत्य का संतुलन: पंचरत्न मंदिर
नटमंदिर से सटा हुआ दूसरा महत्वपूर्ण खंड 'पंचरत्न मंदिर' है। यह बिना किसी कृत्रिम जोड़ के, विशाल पत्थरों के भारी-भरकम खंभों पर टिका हुआ एक सममित वर्गाकार कक्ष है। स्थापत्य की दृष्टि से इसकी छत के मध्य में एक विशाल मुख्य गुंबद है तथा चारों कोनों पर चार छोटे-छोटे सहायक गुंबज निर्मित हैं। इस कक्ष की आंतरिक दीवारों पर इसके ऐतिहासिक निर्माताओं अहोम राजा राजेश्वर सिंहा (1759 ई.) और राजा गौरीनाथ सिंहा (1782 ई.) के नाम के प्राचीन शिलालेख उत्कीर्ण हैं, जबकि बाहरी दीवारों पर काले प्रस्तर खंडों को तराशकर बनाई गई मूर्तियां आकर्षण का केंद्र हैं।
इसके आगे बढ़ने पर तीसरा वर्गाकार खंड 'कलंता' आता है, जिसका शिखर अहोम स्थापत्य के प्रभावस्वरूप चौकोर आकृति का है। यह पूरा कक्ष लंबे और अत्यंत मोटे पत्थरों के स्तंभों पर आधारित है। समूचे पहाड़ को भीतर से काटकर बनाए जाने के कारण इस प्रस्तर खंड में कहीं कोई जोड़ दिखाई नहीं देता; इसकी दीवारें भी अभेद्य पत्थरों की मोटी परतों से निर्मित हैं। कलंता खंड में आवागमन के लिए दो पार्श्व दिशाओं (Sides) से छोटे-छोटे द्वार बने हैं, जिनमें से दाहिनी ओर का द्वार दर्शनार्थियों की मुख्य गैलरी से जुड़ता है।
इसी मार्ग से जब हम कलंता खंड के मध्य में पहुँचते हैं, तो वहाँ एक भव्य रत्नजड़ित आसन पर 'कामेश्वर-कामेश्वरी' की लालित्यपूर्ण विग्रह मूर्ति स्थापित दिखाई देती है। यह शिव और शक्ति का वह अद्वैत स्वरूप है जिसे कौल-मार्ग में 'आनन्द भैरव और आनन्द भैरवी' की संज्ञा दी गई है। वैश्विक दर्शन के धरातल पर सृष्टि की नियामक परम पुरुष और परम स्त्री ऊर्जा के इस मूर्त द्विध्रुवीय प्रतीक को हम निम्नलिखित वैचारिक तुलनात्मक परिप्रेक्ष्य में समझ सकते हैं।
कौल-तंत्र (शाक्त मार्ग): इस भारतीय तांत्रिक परंपरा में कामेश्वर और कामेश्वरी को मुख्य मूर्त द्विध्रुवीय प्रतीक माना गया है, जो मूल रूप से शिव और शक्ति के शाश्वत लालित्य (आनन्द भैरव और भैरवी) के दार्शनिक तत्व को प्रदर्शित करते हैं।
चीनी ताओवाद (Taoism): चीनी अध्यात्म की इस वैश्विक धारा में ब्रह्मांडीय संतुलन को दर्शाने के लिए यिन (Yin) और यांग (Yang) का द्विध्रुवीय प्रतीक उपयोग किया जाता है, जो वास्तव में परम पुरुष और परम स्त्री ऊर्जा के वैश्विक संतुलन के दार्शनिक सिद्धांत पर आधारित है।
बौद्ध तंत्र (Vajrayana): वज्रयान बौद्ध परंपरा के अंतर्गत देवी तारा और बोधिसत्व को मूर्त द्विध्रुवीय प्रतीक के रूप में पूजा जाता है, जिसका दार्शनिक मूल शून्य (Sunyata) और प्रज्ञा (Prajna) के वैश्विक अद्वैत (Non-duality) को समाहित करना है।
संक्षेप में कहें तो, चाहे भारत का कौल-तंत्र हो, चीन का ताओवाद हो या तिब्बत-भारत का बौद्ध तंत्र—ये सभी वैश्विक धाराएं संसार की उत्पत्ति और संतुलन को पुरुष और स्त्री (या दो पूरक ऊर्जाओं) के द्विध्रुवीय मिलन और दार्शनिक अद्वैत के रूप में ही देखती हैं।
| तांत्रिक / वैश्विक धारा | मूर्त द्विध्रुवीय प्रतीक | दार्शनिक मूल तत्व |
|---|---|---|
| कौल-तंत्र (शाक्त मार्ग) | कामेश्वर — कामेश्वरी | शिव और शक्ति का शाश्वत लालित्य (आनन्द भैरव-भैरवी) |
| चीनी ताओवाद (Taoism) | यिन (Yin) — यांग (Yang) | परम पुरुष और परम स्त्री ऊर्जा का वैश्विक संतुलन |
| बौद्ध तंत्र (Vajrayana) | देवी तारा — बोधिसत्व | शून्य (Sunyata) और प्रज्ञा (Prajna) का वैश्विक अद्वैत |
इस कक्ष के ठीक आगे, नीचे की ओर उतरती हुई अनगढ़ पत्थरों की संकरी सीढ़ियाँ हैं, जहाँ प्रकाश की मद्धम व्यवस्था के कारण एक रहस्यमयी, आदिम शून्यता या अँधेरा व्याप्त रहता है। श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए इन सीढ़ियों को एक पत्थर के विभाजन द्वारा दो भागों में बाँटा गया है। बाईं ओर से क्रमशः नीचे उतरते हुए हम उस 'शून्यागार' (गर्भगृह) में पहुँचते हैं, जहाँ फूल-मालाओं से आच्छादित प्राकृतिक गह्वर (Cavitas) मिलता है, जिसमें प्राकृतिक रूप से जल का मंद प्रवाह बना रहता है; जो पत्थरों से निकल कर पत्थरों में विलीन होता रहता है और हमेशा स्वच्छ बना रहता है।
यही वह 'महायोनि' पीठ है, जो बिना किसी मानव-निर्मित मूर्ति के, निराकार रूप में साक्षात् प्रकृति और ब्रह्मांडीय सृजन-शक्ति के शाश्वत वारि विग्रह के रूप में आदिकाल से पूजित है। जल का यह स्वप्रवाह प्रकृति में जीवन के प्रवाह का प्रतीक लगता है। जल का स्वतः आश्रुत होना और स्वतः विलीन होना, सृजन-संहार का वर्तुल बना देता है। आश्चर्यजनक रूप में आदिम लोग सृजन-संहार के रहस्य जाने न जाने परन्तु इतना अनुभव तो अवश्य रहा होगा कि स्व आश्रुत जल ही जीवन का आदि स्रोत है।
इस अलौकिक गर्भगृह से पुनः बाहर निकलकर जब हम मंदिर के बाह्य स्थापत्य का अवलोकन करते हैं, तो इसके विशाल प्रस्तर स्तंभों पर उकेरी गई गणेश, काल-भैरव, क्षेत्रपाल और चौरासी योगिनियों की अति सुंदर मूर्तियाँ कला की उत्कृष्टता को रेखांकित करती हैं।
गर्भगृह के ऊपर लगभग दस मीटर ऊँचा यह मुख्य शिखर, जो देखने में मधुमक्खी के छत्ते (Beehive-like Shikhara) जैसी संरचना में उल्टे कटोरे की स्थापत्य कला के रूप में अद्भुत और मनोहारी दिखता है। समकालीन वैभव के नवीन पड़ाव में इसे पूरी तरह सोने के पत्तरों (Golden Plates) से आवृत कर दिया गया है, परन्तु इस स्वर्णिम चमक के बावजूद सुपारी, नारियल, महानीम्ब और अरलु के मनोहारी वृक्षों का कटना खटता है। आधुनिकीकरण होना चाहिए, लेकिन आदिम मानव की प्राचीनता का बोध भी बना रहना चाहिए।
देवी कामाख्या-10: कामाख्या और दस महाविद्याएँ: आदिम प्रज्ञा से आइंस्टीन तक का तांत्रिक विमर्श
डॉ. अचल पुलस्तेय एक समकालीन बहुविषयक विद्वान, सशक्त लेखक, चिंतक, लोक अध्येता, संपादक एवं कवि हैं। उनका लेखन सामाजिक यथार्थ, सांस्कृतिक परिवर्तन, लोक जीवन और मानवीय चेतना के गहन विश्लेषण के लिए जाना जाता है। वे ‘Eastern Scientist’ सहित विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं से जुड़े होकर समसामयिक विषयों पर वैचारिक लेख प्रस्तुत करते हैं। उनकी प्रमुख कृतियों में महान गणराज्य गढ़मण्डला-इतिहास, रिसर्च इन तप्पाडोमागढ़, कोरोना काल कथा-स्वर्ग में सेमीनार-उपन्यास, कुरुना से कामाख्या-यात्रिकी तथा लोकतंत्र और नदी, लोकतंत्र और रेलगाड़ी, जरा सोच के बताना, लटें उड़ने से बसंत नहीं आता, नंगी कविता : अंधा कवि – काव्य संग्रह आदि शोध एवं साहित्यिक कृतियाँ शामिल हैं।
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