Culture | संस्कृति
Date : June 17, 2026 | Author : डॉ. अचल पुलस्तेय
The geographical and architectural layout of the Kamakhya Mandala constitutes a living Tantric powerhouse (Mahapitha), where independent and distinct temples (Devalayas) dedicated to the ten Mahavidyas are situated across the Nilachal hill. The most unique feature of the Shakta philosophy here is the concept of 'Vari-Vigraha' (water manifestation), under which a perennially flowing natural spring—rather than any anthropomorphic or metallic idol—is worshiped inside the sanctum sanctorum as the direct and living embodiment of the primordial goddess (Adya Shakti). In this sequence, the Dasha Mahavidyas—ranging from Kali (the absolute void) to Tara (the pregnant potential), Bhubaneswari (full adulthood), Tripurasundari (vibrant youth), and Dhumavati (the old matriarch)—essentially express the gradual evolution of feminine consciousness and the diverse psychological states of the human mind. Believing Tantra to be merely an orthodox religious ritual is a flawed perspective; in reality, it is a well-structured science of inner consciousness, psychology, and metaphysics, based on the universal principle of "Yat Pinde Tat Brahmande" (as is the microcosm/body, so is the macrocosm/universe).
When analyzing the interconnectedness between this primordial wisdom and modern physical science, Albert Einstein's famous mass-energy equation ($E=mc^2$) confirms this very Tantric truth: that unlimited energy is inherent within all visible matter. Thousands of years ago, without any modern equipment, ancient humans deeply perceived this latent cosmic energy within the elements of nature—such as flowing water, unyielding mountains, and blazing fire—and accepted it in the form of revered 'Motherhood' (Matribhav). While this maternal perspective of ancient primordial consciousness emphasized maintaining an intimate harmony with nature, the blind race driven by the material discoveries of modern science has instead paved the way for the ruthless exploitation of nature. This Tantric discourse reminds us that until we view all of nature as conscious and establish a balanced, soulful dialogue with it, the ecological balance of this world, which currently stands on the brink of destruction, cannot be restored.
Keywords: Kamakhya Mandala, Dasha Mahavidya, Vari-Vigraha, Feminine Consciousness, Psychology, Metaphysics, Primordial Energy, Albert Einstein, Cosmos, Ecology.
असमिया संस्कृति की एक अद्वितीय विशेषता यह है कि यहाँ के देवी मंदिरों में कोई मानव निर्मित धातु या पत्थर की कोई मूर्ति स्थापित नहीं है; अपितु सभी मंदिरों में एक निरंतर प्रवाहित होने वाले प्राकृतिक जल-स्रोत को ही देवी-रूप में पूजा जाता है। कामाख्या के मूल ध्यान-मंत्र में भी यह स्पष्ट उद्घोषणा है कि जल ही आदि-शक्ति का प्रत्यक्ष और सजीव स्वरूप है—
"योनिमात्र शरीराया अम्बुवासिनी कामदा..."
इसी विशिष्ट तांत्रिक यथार्थ के कारण मैंने अपने यात्रा-वृत्तांत 'कुरुना से कामाख्या' में देवी को 'वारिविग्रहा' (जल ही जिनका विग्रह/शरीर है) कहकर संबोधित किया है।
संपूर्ण कामाख्या मण्डल दस महाविद्याओं का परम महापीठ है। मुख्य मंदिर के गर्भगृह में स्थित त्रिकोणीय योनिमण्डल में त्रिपुरसुन्दरी, मातंगी और कमला अदृश्य रूप से वास करती हैं, जबकि शेष सात महाविद्याओं—काली, तारा, भुवनेश्वरी, त्रिपुरभैरवी, छिन्नमस्ता, बगलामुखी और धूमावती—के स्वतंत्र और पृथक पीठ इसी पर्वत पर स्थापित हैं, जो ऐतिहासिक कालक्रम में कामाख्या मंदिर के मूल विन्यास के बाद निर्मित कराए गए।
कामाख्या मण्डल का स्थापत्य और भौगोलिक विन्यास
नीलांचल पर्वत पर अवस्थित मुख्य मंदिर के बलियूप वाले प्रवेश द्वार पर नक्काशीदार पत्थर के बड़े कलश और पद्म (कमल) उत्कीर्ण हैं। यहाँ स्थापित यक्ष-यक्षिणी की मूर्तियाँ अपनी शास्त्रीय वास्तुकला के आधार पर स्पष्टतः बारहवीं सदी की प्रतीत होती हैं। इस केंद्रीय स्थल से जब हम दक्षिण की खाई की ओर उतरते हैं, तब महाविद्या धूमावती का देवालय स्थित है (उल्लेखनीय है कि असमिया भाषा में मंदिर को 'देवालय' कहा जाता है)।
धूмаवती देवालय से कुछ और नीचे उतरने पर एक प्राचीन भित्ति-मूर्ति दृष्टिगोचर होती है, जहाँ पुरातत्व विभाग द्वारा 'देवी त्रिपुर भैरवी' का सूचना-पट्ट लगाया गया है। इस स्थान की विशेषता यह है कि यहाँ पाषाण खंडों के मध्य से निरंतर जल की एक सूक्ष्म रेखा प्रवाहित होती रहती है। इससे तनिक और नीचे उतरने पर त्रिपुरसुन्दरी देवालय स्थित है, जहाँ की भौगोलिक और आध्यात्मिक स्थिति भी लगभग समान है।
मुख्य मंदिर परिसर से बाहर निकलने पर बाएँ हाथ की ओर अहोम स्थापत्य शैली में निर्मित महाविद्या तारा, काली और छिन्नमस्ता के देवालय स्थित हैं। यहाँ से आगे बढ़ने पर पहाड़ी की ओर ऊपर जाती सड़क के दाहिनी ओर महाविद्या बगलामुखी का मंदिर स्थित है।
महाविद्या बगलामुखी: बदलता परिवेश और अनुष्ठानिक स्वरूप
अभी अधिक समय नहीं बीता, महज़ पन्द्रह वर्ष पूर्व इस मार्ग पर सुरम्य पहाड़ और घने वृक्ष दर्शनार्थियों का शांत आलिंगन से स्वागत करते थे; किंतु आज वहाँ व्यावसायिक आधुनिकता के प्रतीक स्वरूप कंक्रीट की ऊँची इमारतें अहंकार से तनकर खड़ी हैं। मुख्य मार्ग से करीब डेढ़-दो सौ मीटर की दूरी पर दाहिनी ओर खाई में महाविद्या बगलामुखी का मंदिर स्थित है। डेढ़ दशक पहले यह संपूर्ण क्षेत्र नितांत एकांत और नीरवता से आच्छादित था, परंतु वर्तमान में यहाँ पीली चुनरी और पीली पूजन सामग्री की आठ-दस दुकानें सज चुकी हैं। ध्यातव्य है कि तंत्रशास्त्र के अनुसार बगलामुखी की साधना में अनिवार्यतः पीत वर्ण (पीले रंग) की सामग्रियों का ही प्रयोग किया जाता है।
सड़क से सैकड़ों टेढ़ी-मेढ़ी सीढ़ियाँ उतरकर जब हम भगवती बगलामुखी के 'वारिविग्रह' (जल-स्वरूप) तक पहुँचे, तब वह मंदिर पूर्णतः जनशून्य था। न कोई पुजारी, न कोई अन्य दर्शनार्थी—केवल हमारी ही उपस्थिति उस नीरवता को साक्षी दे रही थी। कुछ दूरी पर स्थित एक वृहद् मंडप (हॉल) में तांत्रिक हवन संपन्न हो रहा था। तंत्रशास्त्र में महाविद्या बगलामुखी को शत्रुनाशिनी, स्तम्भिणी, विजयदायिनी और समूह-सम्मोहिनी शक्ति माना गया है; यही कारण है कि इस सिद्धपीठ पर प्रायः प्रशासनिक अधिकारियों, राजनेताओं और बड़े व्यावसायिक घरानों के विशेष सुरक्षात्मक व आक्रामक अनुष्ठान चलते रहते हैं।
भुवनेश्वरी: शिखर की शांति और विहंगम दृश्य
बगलामुखी पीठ से क्रमशः ऊपर की ओर चढ़ते हुए हम नीलांचल के सर्वोच्च शिखर पर स्थित महाविद्या भुवनेश्वरी के मंदिर पहुँचे। इस ऊंचाई तक पहुँचने में मैदानी क्षेत्रों से आए सामान्य पर्यटकों की साँसें फूलने लगती हैं। वर्तमान में इस आध्यात्मिक केंद्र को राज्य द्वारा एक 'टूरिज्म पॉइंट' के रूप में विकसित किया जा रहा है, जबकि अतीत में यह स्थान उच्च कोटि के साधकों और ध्यानियों की एकांत साधना-स्थली था। पूर्व में मैंने स्वयं यहाँ कई विदेशी नागरिकों को गिटार की मंद संगति में ध्यानमग्न देखा है, साथ ही विभिन्न तांत्रिकों और वज्रयानी बौद्ध भिक्षुओं को गंभीर जप-तप में लीन पाया है।
इस सर्वोच्च शिखर से नीचे फैली हरी-भरी नीलांचल पहाड़ी और वेगवती ब्रह्मपुत्र नदी का अत्यंत विहंगम, अलौकिक और दार्शनिक दृश्य दिखाई देता है। ऐतिहासिक संदर्भों के अनुसार, इसी पवित्र स्थान पर दरभंगा नरेश महाराज रामेश्वर सिंह को तंत्र की उच्च सिद्धि प्राप्त हुई थी, और उन्होंने ही सर्वप्रथम इस स्थल को एक भव्य मंदिर का स्वरूप प्रदान किया था। तंत्र शास्त्रों के अनुसार दस महाविद्याओं के क्रम में देवी भुवनेश्वरी को तृतीय महाविद्या माना गया है, जो संपूर्ण जगत का पोषण और संवर्धन करती हैं। उनकी साधना से उत्पन्न अनुभूति साधक को परम शांति और समृद्धि की ओर ले जाती है। यहाँ का वातावरण आज भी अपनी मूल सहजता में अत्यंत शांत और सुखद है।
महाविद्याओं का दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक और वैज्ञानिक विमर्श
दश महाविद्याओं के ये दस स्वरूप मूलतः स्त्री-चेतना और उसके क्रमिक विकास के विभिन्न सोपानों को दार्शनिक अभिव्यक्ति प्रदान करते हैं। यहाँ 'काली' वह परम शून्य है, जिसका विकास आगे चलकर स्त्री चेतना के दस विशिष्ट गुणों या रूपांतरणों के रूप में होता है। इस तात्विक क्रम में 'तारा' गर्भिणी की प्रसुप्त क्षमता का प्रतीक हैं, 'भुवनेश्वरी'पूर्ण वयस्कता और मातृत्व की सूचक हैं, 'त्रिपुरसुन्दरी' षोडशी (सोलह वर्ष की नवयौवना) के जीवंत सौंदर्य को दर्शाती हैं, और'धूमावती' काल के थपेड़ों से निर्मित वृद्धा एवं विधवा स्वरूप की परिचायक हैं।
समकालीन बौद्धिक विमर्श में तंत्र को लेकर सबसे बड़ा भ्रम यह है कि इसे मात्र एक रूढ़िवादी, अंधविश्वासी या चमत्कारिक कर्मकांड मान लिया जाता है। इसके विपरीत, तंत्र एक सार्वभौमिक चेतना का विज्ञान है; क्योंकि विश्व की लगभग सभी प्राचीन सभ्यताओं, संस्कृतियों और धर्मों में किसी न किसी रूप में तांत्रिक क्रियाएँ और गूढ़ साधनाएँ प्रचलित रही हैं। चाहे भारत के विविध सनातन और शाक्त सम्प्रदाय हों, चीन-जापान की प्राचीन ताओवादी पद्धतियाँ हों, अथवा ईसाई और इस्लाम के सूफ़ी/रहस्यवादी संप्रदाय—कोई भी चेतना के इस रहस्यमयी व्यावहारिक आयाम से अछूता नहीं रहा है। सबसे विस्मयकारी तथ्य यह है कि इन सभी संस्कृतियों की केंद्रीय ऊर्जा 'स्त्री-सत्ता' (Feminine Principle) ही रही है।
यदि इसका गहराई से विश्लेषण किया जाए, तो तंत्र मूलतः मनोविज्ञान (Psychology) और तत्वमीमांसा (Metaphysics) का व्यावहारिक व्यावहारिक रूप है। वास्तव में दुख-सुख, आनंद-विषाद और कुछ नहीं, बल्कि मानव मन की अनुकूल और प्रतिकूल स्थितियाँ मात्र हैं। मानव सभ्यता के विकास क्रम में जैसे-जैसे मनुष्य की चेतना का विस्तार हुआ, वैसे-वैसे वह प्रकृति की इस विराट और अदृश्य ऊर्जा से स्वयं को जोड़ने की वैज्ञानिक पद्धतियाँ खोजता रहा। इसी अन्वेषण की प्रक्रिया में संसार के सबसे पहले रसायन 'मद्य' (Alcohol) का निर्माण हुआ और विविध दिव्य वनस्पतियां व औषधियां खोजी गईं।
मनुष्य ने अपनी कामनाओं की सघनता के प्रभाव को समझा; सम्मोहन, आकर्षण और स्तम्भन की प्राकृतिक घटनाओं को अनुभूत किया। इन अनुभूतियों से जो विधियाँ विकसित हुईं, उनका प्राथमिक प्रयोग पहले मानसिक संताप और अवसाद से मुक्ति के लिए किया गया, तत्पश्चात शत्रु-शमन, राज्य-विस्तार और कालांतर में यह एक जटिल व्यावसायिक तंत्र में परिवर्तित हो गया। प्राचीन मानव ने बिना किसी आधुनिक वेधशाला के भी सूर्य, चंद्रमा आदि ग्रह-नक्षत्रों के गमन और उनके कारण पृथ्वी पर होने वाले भू-भौतिकीय परिवर्तनों के प्रभाव को सूक्ष्मता से अनुभव कर लिया था। इसी अनवरत प्रयोग-प्रक्रिया से तंत्र, मंत्र और विभिन्न अनुष्ठानिक टोटके अस्तित्व में आए, जिन्हें बाद में परिष्कृत मनीषियों ने सूत्रों तथा ग्रंथों में ढालकर एक व्यवस्थित 'शास्त्र' का स्वरूप प्रदान किया।
देह से ब्रह्मांड की ओर: आदिम अनुभूति बनाम वैज्ञानिक क्रांति
इस दार्शनिक यात्रा में जब मनुष्य को यह परम सत्य ज्ञात हुआ कि जो कुछ हमारी इस सूक्ष्म भौतिक देह (Microcosm) में घटित हो रहा है, वही इस अनंत ब्रह्मांड (Macrocosm) में भी संचालित है—"यत् पिण्डे तत् ब्रह्माण्डे"—तो तंत्र अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँच गया। यह बोध भी आदिम मनुष्य की आंतरिक संवेदी अनुभूति से ही उपजा था; क्योंकि वह प्रकृति से विलग नहीं था। वह नदी, पहाड़, वृक्ष और पाषाण सभी को सचेतन मानकर पूजता था और उनके साथ आत्मीय संबंध स्थापित करता था। उसके लिए संपूर्ण प्रकृति जीवंत थी, वह उनसे संवाद करता था, अपनी कामनाएँ प्रकट करता था और वे कामनाएँ संयोगवश फलित भी होती थीं।
इस आदिम विनिमय और अनुभूति के मूल में निश्चित ही कोई महान कॉस्मिक ऊर्जा कार्य कर रही थी, जिसे आगे चलकर प्रबुद्ध चेतनाओं ने 'आद्या शक्ति' (Primordial Energy) के नाम से अभिहित किया। मानव देह में जो 'प्रजा स्थान' (सृजन का केंद्र) है, वही समस्त लौकिक कामनाओं का मूल है, और उसकी अधिष्ठात्री महाशक्ति ही 'काली' या 'कामाख्या' हैं। यहीं से मानव शरीर के भीतर 'कुंडलिनी शक्ति' की वैज्ञानिक परिकल्पना की गई। मूल कामना-भाव की देवी कामाख्या ही दस अलग-अलग मानसिक और आत्मिक भावों में विभक्त होकर 'दस महाविद्या' कहलाईं।
महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि इन महाविद्याओं की पारंपरिक 'पूजा' (Worship) नहीं की जाती, बल्कि इनकी 'साधना' (Realization) की जाती है; इनके विशिष्ट प्रभाव तरंगों (Vibrational Frequencies) का प्रयोग किया जाता है। इसीलिए इन्हें 'महाविद्या' अर्थात 'विशिष्ट ज्ञान' (Super-consciousness) कहा गया है। इन मानसिक व आत्मिक भाव-केंद्रों की पूर्ण जागृति ही 'महाविद्या सिद्धि' है। चूँकि चेतना के विकास का मूलाधार काम-स्थान (मूलाधार चक्र) है, इसीलिए इस सिद्धपीठ को काली या कामाख्या स्थान कहा गया।
इन दस दिव्य केंद्रों को जाग्रत करने के लिए प्राचीन काल में अनेक जटिल ज्यामितीय यंत्रों का निर्माण हुआ; श्रीयंत्र और भैरवी-चक्र जैसी गूढ़ गणितीय अवधारणाएँ सामने आईं। इस साधना प्रक्रिया में बाह्य जगत के कोलाहल से पूर्ण संबंध-विच्छेद (Sensory Deprivation) के लिए 'मद्य' का उपयोग किया गया, और आत्मिक व शारीरिक बल के अर्जन हेतु 'बलि' की सांकेतिक या प्रत्यक्ष पद्धति अपनाई गई। इस प्रकार एक सहज आदिम आस्था धीरे-धीरे एक सुदृढ़ तंत्र-विज्ञान में रूपांतरित हो गई।
सत्य तो यही है कि आधुनिक युग के संसार के जितने भी वैज्ञानिक आविष्कार हैं, उन सभी के बीज मनुष्य की इन्हीं आदिम अनुभूतियों में छिपे हुए हैं। आधुनिक युग की प्रथम महान वैज्ञानिक क्रांति अल्बर्ट आइंस्टीन के प्रसिद्ध द्रव्यमान-ऊर्जा समीकरण (E=MC2) से होती है—जिसका मूल सार यही है कि 'द्रव्य (Matter) के भीतर असीमित ऊर्जा (Energy) निहित है, जिसका भौतिक उपयोग किया जा सकता है।'
देखा जाए तो आदिम मनुष्य की मूल आस्था भी यही थी कि इस दृश्यमान द्रव्य में, प्रकृति में, नदी में, बहते जल में, धधकती अग्नि में और अडिग पहाड़ों में एक प्रसुप्त ऊर्जा है, एक जीवंत शक्ति है। किसी न किसी संवेदी बिंदु पर आदिम मनुष्य ने इस कॉस्मिक ऊर्जा को गहराई से महसूस किया होगा और उसे पूजनीय 'मातृभाव' (Motherhood) के रूप में स्वीकार किया होगा। चेतना के इसी मातृपरक और प्रकृति-अनुकूल दृष्टिकोण के कारण आज तक इस सृष्टि की निरंतरता और इसका प्राकृतिक संतुलन बना हुआ है; जबकि इसके विपरीत, आइंस्टीन की भौतिक खोज ने मनुष्य को तात्कालिक सुख-सुविधाएँ तो अवश्य प्रदान कीं, परंतु प्रकृति के निर्मम दोहन (Exploitation) की जो अंधी दौड़ शुरू हुई, उसने आज संपूर्ण जगत को महाविनाश के कगार पर ला खड़ा किया है।
देवी कामाख्या-11: कामाख्या के भैरव उमानन्द (कौल परंपरा और पारिस्थितिक संकट)
डॉ. अचल पुलस्तेय एक समकालीन बहुविषयक विद्वान, सशक्त लेखक, चिंतक, लोक अध्येता, संपादक एवं कवि हैं। उनका लेखन सामाजिक यथार्थ, सांस्कृतिक परिवर्तन, लोक जीवन और मानवीय चेतना के गहन विश्लेषण के लिए जाना जाता है। वे ईस्टर्न साइंटिस्ट सहित विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं से जुड़े होकर समसामयिक विषयों पर वैचारिक लेख प्रस्तुत करते हैं। उनकी प्रमुख कृतियों में महान गणराज्य गढ़मण्डला-इतिहास, रिसर्च इन तप्पाडोमागढ़, कोरोना काल कथा-स्वर्ग में सेमीनार-उपन्यास, कुरुना से कामाख्या-यात्रिकी तथा लोकतंत्र और नदी, लोकतंत्र और रेलगाड़ी, जरा सोच के बताना, लटें उड़ने से बसंत नहीं आता, नंगी कविता : अंधा कवि – काव्य संग्रह आदि शोध एवं साहित्यिक कृतियाँ शामिल हैं।

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