देवी कामाख्या-7: बलि परम्परा—लोक, शास्त्र और संस्कृति

Culture | संस्कृति

Date : June 14, 2026   |   Author : डॉ. अचल पुलस्तेय

Goddess Kamakhya and the Philosophy of Bali: A Subaltern Deconstruction of Sacrificial Traditions, Scriptural Hegemony, and Systemic Violence

Synthesizing field narratives from the author's travelogue 'Kuruna se Kamakhya' and philosophical dialogues from his ethnographic novel 'Research in Tappadomagarh', this paper presents a rigorous subaltern deconstruction of the blood-sacrifice (Bali) tradition at the Kamakhya Peeth. Moving beyond the moralistic binary of mainstream vegetarian purism, the study frames sacrificial rituals as an archaic mode of psychological catharsis and cosmic realignment. Tracing the historical trajectory of 'Bali' across Vedic and Puranic literatures, Valmiki Ramayana, and Manusmriti, the paper maps how vegetarianism emerged as a later socio-religious construct influenced by Jain, Buddhist, and Vaishnava transitions, while traditions like Vajrayana Buddhism retained sacrificial elements. Through textual corroboration from the 'Mahakala Samhita' and subaltern assertions of local informants, the author establishes that 'Bali' serves as an empirical site where the primeval hunting-gathering and agricultural consciousness intersects with contemporary institutionalized religions. The paper contrasts the open, visceral violence of the ritual with the covert, structural, and systemic violence of modern capitalism and state machinery. It concludes that the shifting iconographical representations of the Goddess reflect the historical transitions of human socio-economic structures.

Keywords: Sacrificial Economy, Subaltern Anthropology, Mahakala Samhita, Ritual Catharsis, Structural Violence, Shifting Iconography, Vedic and Puranic Literature.

यह आलेख मुख्यधारा के औपनिवेशिक व शुद्धतावादी दृष्टिकोण के समानांतर शक्ति-साधना के केंद्रों में व्याप्त 'बलि-परंपरा' का गहन, दार्शनिक और अस्तित्वपरक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। ऐतिहासिक साक्ष्यों, तंत्र ग्रंथों (महाकाल संहिता) और लोक-मानस के विरेचन (Catharsis) के आलोक में यह विमर्श शास्त्र के वर्चस्व के विरुद्ध लोक की जीवंत और स्वतंत्र अभिव्यक्ति को रेखांकित करता है।

शक्ति-साधना के केंद्रों में बलि-परंपरा सदैव जटिल, विवादास्पद और बौद्धिक विमर्श का विषय रही है। मुख्यधारा के शुद्धतावादी दृष्टिकोण ने जहाँ इसे 'हिंसा' या 'क्रूरता' के संकुचित चश्मे से देखा, वहीं लोक-चेतना, तंत्र शास्त्र और सांस्कृतिक नृविज्ञान के धरातल पर इसका एक गहन, दार्शनिक और अस्तित्वपरक यथार्थ है। अपनी यात्रा-कथा 'कुरुना से कामाख्या' और उपन्यास 'रिसर्च इन तप्पाडोमागढ़' के ज़मीनी शोध व अनुभवों के आलोक में जब मैं इस परंपरा का विश्लेषण प्रस्तुत करता हूँ, तो यह शास्त्र के वर्चस्ववादी विमर्शों के समानांतर लोक की सबसे प्राचीन, जीवंत और स्वतंत्र अभिव्यक्ति के रूप में उभरती है।

देवी मंदिरों में बलियूप

शक्ति-साधना के केंद्रों में बलि-परंपरा सदैव जटिल, विवादास्पद और बौद्धिक विमर्श का विषय रही है। मुख्यधारा के शुद्धतावादी दृष्टिकोण ने जहाँ इसे 'हिंसा' या 'क्रूरता' के संकुचित चश्मे से देखा, वहीं लोक-चेतना, तंत्र शास्त्र और सांस्कृतिक नृविज्ञान के धरातल पर इसका एक गहन, दार्शनिक और अस्तित्वपरक यथार्थ है। अपनी यात्रा-कथा 'कुरुना से कामाख्या' और उपन्यास 'रिसर्च इन तप्पाडोमागढ़' के ज़मीनी शोध व अनुभवों के आलोक में जब मैं इस परंपरा का विश्लेषण प्रस्तुत करता हूँ, तो यह शास्त्र के वर्चस्ववादी विमर्शों के समानांतर लोक की सबसे प्राचीन, जीवंत और स्वतंत्र अभिव्यक्ति के रूप में उभरती है।

लोकाचार और लोक-विश्वास का जीवंत सत्य

शक्ति-पीठ कामाख्या मंदिर के मुख्यद्वार के सम्मुख स्थित बलि-यूप लोकाचार और लोक-विश्वास के जीवंत सत्य का प्रतीक है। काष्ठ (लकड़ी) से निर्मित इस विशेष पारंपरिक ढाँचे में बलि-पशुओं का शिरोभाग स्थिर करके अनुष्ठान संपन्न किया जाता है। यहाँ छाग (बकरे), महिष (भैंसे) और कपोत (कबूतर) की बलि-प्रक्रिया अनवरत चलती है, जिसके सात्विक या वैकल्पिक रूप में गन्ना, पेठा और नारियल की बलि भी अर्पित की जाती है। बलिदान से पूर्व पशु को सौभाग्यकुण्ड के पवित्र जल में स्नान कराया जाता है; तत्पश्चात् पुजारियों द्वारा वैदिक व तांत्रिक मंत्रों से संकल्प कराया जाता है। इस विहित प्रक्रिया के बाद वह जीव केवल एक पशु नहीं रह जाता, बल्कि आदिम प्रकृति को समर्पित एक पावन 'हवि' बन जाता है। यहाँ पूर्वोत्तर के अतिरिक्त उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखण्ड, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, पंजाब, उत्तराखंड और नेपाल तक के श्रद्धालु अपनी अटूट आस्था के साथ कतारबद्ध खड़े रहते हैं।

भौगोलिक एवं सांस्कृतिक व्याप्ति: यह परंपरा केवल कामाख्या तक सीमित नहीं है, वरन भारत के प्रत्येक प्राचीन देवी-स्थलों पर आदिकाल से विद्यमान रही है।

सर्वहारा की जीवंत परिपाटी: पूरे देश के सर्वहारा वर्ग में अपनी कुल-देवियों और लोक-देवियों को बलि अर्पित करने की लोक-परंपरा आज भी वैचारिक रूप से उतनी ही जीवंत है।

आदिम चेतना का पक्षधर: मैं लोक-चेतना की इन आदिम परंपराओं का पक्षधर हूँ; यह मनुष्य का वह आदिम भाव है, जो युगीन रूपांतरण के साथ सर्वत्र व्याप्त है।

औपनिवेशिक शुद्धतावाद पर प्रहार

"जो लोग इस पारंपरिक अनुष्ठान को 'हिंसा' की संकुचित संज्ञा देते हैं, वे वास्तव में राज्य-सत्ताओं, पूँजीवादी तंत्र और वैयक्तिक स्वार्थों के लिए प्रतिक्षण होने वाली सूक्ष्म एवं स्थूल हिंसा में लिप्त रहते हैं। आधुनिक युग के षड्यंत्र, युद्ध और मनुष्यों का निरंतर होता आर्थिक-सामाजिक शोषण इस अनुष्ठानिक बलि से कहीं अधिक भयावह और क्रूर हिंसा है। विकास की सनक में वनों को काट कर असंख्य जीवों का अस्तित्व खत्म कर रहे हैं। यहाँ प्रकृति को समर्पित यह आदिम समर्पण उस छद्म आधुनिक हिंसा से कहीं अधिक पारदर्शी, पवित्र और श्रेयस्कर है। विडंबना यह है कि इस प्राचीनतम लोक-आस्था का विरोध करने वाले बुद्धिजीवी कभी व्यावसायिक स्लॉटर हाउस (बूचड़खानों) या बाज़ार में बिकते मांस का विरोध नहीं करते। इससे स्पष्ट होता है कि उनका वास्तविक उद्देश्य पशु-हिंसा का विरोध करना नहीं, बल्कि लोक की आदिम आस्था पर अपना औपनिवेशिक विचार थोपना मात्र है।"

साहित्यिक साक्ष्य और ऐतिहासिक विकासक्रम

यदि हम भारत के प्राचीन ग्रन्थों और इतिहास को देखें, तो हमारे वैदिक और पौराणिक साहित्य में शिकार और यज्ञ में बलि का स्पष्ट व विस्तृत उल्लेख मिलता है। यहाँ तक कि वाल्मीकि रामायण और मनुस्मृति जैसे सनातन संस्कृति के आधारभूत ग्रन्थों में भी शिकार तथा यज्ञीय अनुष्ठानों में बलि की सहज स्वीकार्यता दिखाई देती है। सनातन या हिन्दू परम्परा में आज जो शाकाहार का अत्यधिक प्रचलन या आग्रह दिखाई देता है, वह ऐतिहासिक रूप से बहुत बाद की घटना है। यह वैचारिक बदलाव मुख्य रूप से जैन और बौद्ध धर्म के उभार, और आगे चलकर मध्यकाल में वैष्णव सम्प्रदाय के राष्ट्रव्यापी विकास के बाद आता है। दिलचस्प बात यह है कि स्वयं बौद्ध धर्म की 'वज्रयान' जैसी तांत्रिक शाखा ने भी अपने अनुष्ठानों में बलि व मांसाहार का पुरजोर समर्थन किया है, जो इस बात का प्रमाण है कि अध्यात्म का लोक-पक्ष कभी भी इस सहज प्राकृतिक आहार से पूरी तरह विमुख नहीं रहा है।

सभ्य सिस्टम की विधिक हिंसा बनाम लोक का दार्शनिक विरेचन

मेरे उपन्यास 'रिसर्च इन तप्पाडोमागढ़' के पात्र काली प्रसाद के माध्यम से लोक-मानस की जो सहज बुद्धि प्रकट होती है, यह बदले नाम का वास्तविक पात्र है। जिसका कथन आधुनिक समाजशास्त्रियों के लिए एक नया द्वार खोलती है। काली प्रसाद कहते हैं कि “जीव, जीव को ही खाकर जीवित रहता है। हम अपने देवता को बलि देकर उसे प्रसाद रूप में ग्रहण करते हैं, परन्तु दुनिया अपने स्वाद व स्वार्थ के लिए हत्या करती है। हम जंगलों में हिंसक पशुओं के बीच किसी धर्म-शास्त्र के कारण नहीं, बल्कि अपने देवी-देवताओं के आदिम बल पर जीवित रहे हैं, इसलिए जो खाते है वह देवी को समर्पित करते हैं।’’

मनोविज्ञान के अनुसार, हिंसा मानव मन का एक स्वाभाविक घटक है। जो लोग 'अहिंसक' दिखने की कोशिश में इस आदिम हिंसा को मन में दबाए घूमते हैं, वे सूक्ष्म रूप से व्यापक और अराजक हिंसा करते हैं। इसके विपरीत, प्रत्यक्ष पशु बलि में जो हिंसा दिख रही है, वह वास्तव में मनुष्य के अंतस की हिंसा का 'विरेचन' (Catharsis) कर देती है। बलि के बाद लोक-परिवार का चेहरा करुणा, प्रेम और आत्मबल से भरा हुआ होता है, क्योंकि उनके भीतर की हिंसा बाहर निकल चुकी होती है।

दक्ष का प्रतीक और पौराणिक-चेतना का मिथक

पौराणिक मिथकों में दक्ष प्रजापति का यज्ञ वास्तव में 'वर्चस्ववादी अहंकार' का प्रतीक था। जब शिव ने अहंकारी दक्ष का सिरच्छेद किया और बाद में उसके धड़ पर 'छाग' (बकरे) का सिर जोड़कर उसे जीवित किया, तो यह वर्चस्ववादी अहंकार के शमन का महान रूपक बन गया। इसलिए यहाँ कहा गया है कि छाग का सिर जितनी बार कटेगा उतनी बार देवी प्रसन्न होगी।

सनातन की बहुलता और 'महाकाल संहिता' का साक्ष्य

सनातन परंपरा को पश्चिमी रिलिजन की भाँति एकरैखिक (Linear) चश्मे से देखना इसकी मूल आत्मा के साथ अन्याय है, क्योंकि यह कोई संकीर्ण संप्रदाय नहीं बल्कि विविध धाराओं, मान्यताओं और अनुष्ठानों का एक अनंत महासागर है। इस विविधता और बहुलता का सबसे प्रामाणिक और अकाट्य साक्ष्य हमें 'महाकाल संहिता' जैसे उच्च कोटि के तांत्रिक व शाक्त ग्रंथों में मिलता है। इस अद्भुत ग्रंथ के गुह्यकाली और कामकला खंडों में साधना के विशेष स्तरों पर हवन और भोग द्रव्यों के रूप में मद्य (मदिरा), मांस (विशेषकर छाग, मृग, महिष, वाराह) और विभिन्न पक्षियों (कबूतर, मुर्गा) के अर्पण का विशद और शास्त्रीय विवरण है। यह साक्ष्य उन आधुनिक शुद्धतावादियों (Puritans) के दावों को पूरी तरह खारिज करता है जो औपनिवेशिक मानसिकता से प्रभावित होकर सनातन की पहचान को केवल और केवल शाकाहार तक सीमित करने का प्रयास करते हैं। ऐसा एकांगी दृष्टिकोण असल में सनातन की उन असंख्य लोक-परंपराओं और कुलाचारों पर एक प्रकार का सांस्कृतिक वर्चस्व कायम करने की कोशिश है, जिसने धर्म के अत्यंत जीवंत, सहज और विविधता भरे प्राकृतिक स्वरूप को अपूर्णीय क्षति पहुँचाई है।

धर्म का यह प्राकृतिक और बहुलतावादी स्वरूप भारत के किसी एक कोने में नहीं, बल्कि इसके हर अंचल और सामाजिक ताने-बाने में गहराई से रचा-बसा है। जहाँ भोजपुरी इलाके की गैर-ब्राह्मण जातियों में कुलदेवियों और ग्राम देवताओं (डीहवार) को प्रसन्न करने के लिए बलि को एक आवश्यक परंपरा माना गया है—यहाँ तक कि रामनवमी के अवसर पर विशाल 'बलिदान मेले' लगते हैं जहाँ बड़े पैमाने पर बकरे और सुअर की बलि दी जाती है—वहीं दूसरी ओर मिथिला, असम, बंगाल, ओडिशा, कश्मीर और गढ़वाल जैसे क्षेत्रों में तो ब्राह्मणों सहित सभी जातियों में बलि और मांसाहार का निर्बाध प्रचलन है। इन क्षेत्रों में शक्ति की आराधना प्रधान है, जहाँ कामाख्या, तारापीठ और कालीघाट जैसे सिद्ध पीठों पर दिया जाने वाला बलिदान सात्विक और तामसिक ऊर्जा के संतुलन का दार्शनिक प्रतीक है। लोकाचार की यह विविधता इतनी सघन है कि कहीं विवाह के उपरांत नई दुल्हन के गृह-प्रवेश पर वंश वृद्धि और सौभाग्य के प्रतीक रूप में बलि के रक्त में पैर रखने की अनिवार्य परंपरा है, तो कहीं शारदीय नवरात्रि की नवमी के दिन अपने कुल देवता को बकरे का बलिदान देना पूरी कुल-परंपरा का अटूट हिस्सा माना जाता है। महाकाल संहिता के उच्च दार्शनिक विधानों से लेकर सुदूर गांवों के लोक-अनुष्ठानों तक फैला यह ताना-बाना प्रमाणित करता है कि सनातन धर्म किसी एक सांचे में ढला हुआ जड़ तंत्र नहीं, बल्कि हर प्रकार के मानव स्वभाव, भूगोल और संस्कृति को अपने भीतर समेट लेने वाली एक परम उदार और बहुआयामी जीवन-पद्धति है।

आहार का सर्वश्रेष्ठ समर्पण: शिकारी संस्कृति से जैव विविधता के नियमन तक

मानव सभ्यता का विकासक्रम शिकारी (Hunting) संस्कृति से आरंभ होकर कृषि और फिर आधुनिक व्यापारिक संस्कृति तक पहुँचा है। इस ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखें तो बलि या मांसाहार का प्रचलन मूलतः भौगोलिक परिस्थितियों की देन भी रहा है। जिन भू-भागों में कृषि योग्य भूमि का अभाव था, वहाँ आदिम मनुष्य के आहार का एकमात्र और मुख्य स्रोत मांसाहार ही था। यह मानव का सहज मनोविज्ञान है कि वह अपने आराध्य को अपने आहार का सर्वश्रेष्ठ भाग ही अर्पित करता है; और बलि-प्रथा की आदिम शुरुआत वास्तव में इसी भावभूमि से होती है। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि यह परंपरा मुख्य रूप से समाज के उत्पादक (श्रमजीवी) वर्ग में देखी जाती है, जिसे कठिन भौतिक श्रम के लिए अत्यधिक शारीरिक बल की आवश्यकता होती है, और इस बल के लिए मांसाहार एक स्वाभाविक ऊर्जा-स्रोत रहा है। इस दार्शनिक पक्ष को एक अत्यंत आधुनिक और तार्किक धरातल प्रदान कर यह सिद्ध करता है कि कामाख्या परंपरा में दी जाने वाली 'बलि' या 'आहार समर्पण' कोई अंधविश्वास नहीं, बल्कि आदिम आखेट युग की भौगोलिक विवशता और पारिस्थितिक विज्ञान (Ecological Science) का एक व्यावहारिक नियमन था।

नीलांचल की कबीलाई चेतना ने प्रकृति के जैव-विविधता संतुलन (Biodiversity Regulation) को धार्मिक अनुशासन से जोड़कर जनसांख्यिकीय संतुलन बनाए रखने का एक अद्भुत तंत्र विकसित किया था। सामान्यतः उन्हीं पशुओं की बलि की परम्परा है जिनका प्रजनन अधिक होता है। बलि परंपरा केवल एक बाह्य अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह शास्त्र के एकाधिकार के विरुद्ध लोक की वह मूक और सशक्त अभिव्यक्ति है, जो सदियों से भारत के जनजीवन को आंतरिक शक्ति और समरसता प्रदान कर रही है। यह आदिम सृजन-शक्ति का वह अनवरत प्रवाह है जो हमें देह की सीमाओं से ऊपर उठाकर विशुद्ध भाव की ओर ले जाता है।

इस शृंखला का अगला भाग पढ़ें

देवी कामाख्या-8: मंदिर का इतिहास और प्रबंधन

विषय की गहराई को समझने हेतु लेखक के जमीनी शोध और वास्तविक अनुभवों पर आधारित इन दो चर्चित पुस्तकों का अध्ययन करें— यात्रा-वृत्तांत 'कुरुना से कामाख्या' तथा शोध-आधारित उपन्यास 'रिसर्च इन तप्पाडोमागढ़'
Dr. Achal Pulastey
About the Author

डॉ. अचल पुलस्तेय एक समकालीन बहुविषयक विद्वान, सशक्त लेखक, चिंतक, लोक अध्येता, संपादक एवं कवि हैं। उनका लेखन सामाजिक यथार्थ, सांस्कृतिक परिवर्तन, लोक जीवन और मानवीय चेतना के गहन विश्लेषण के लिए जाना जाता है। वे ‘Eastern Scientist’ सहित विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं से जुड़े होकर समसामयिक विषयों पर वैचारिक लेख प्रस्तुत करते हैं। उनकी प्रमुख कृतियों में महान गणराज्य गढ़मण्डला-इतिहास, रिसर्च इन तप्पाडोमागढ़, कोरोना काल कथा-स्वर्ग में सेमीनार-उपन्यास, कुरुना से कामाख्या-यात्रिकी तथा लोकतंत्र और नदी, लोकतंत्र और रेलगाड़ी, जरा सोच के बताना, लटें उड़ने से बसंत नहीं आता, नंगी कविता : अंधा कवि – काव्य संग्रह आदि शोध एवं साहित्यिक कृतियाँ शामिल हैं।

संबंधित पिछले आलेख

Post a Comment

0 Comments