Current Affairs
Date : 29 January 2026
Author : Dr. R. Achal Pulastey
भारत में सोने की कीमतों की तेज़ बढ़ोतरी को अक्सर वैश्विक बाज़ार की
मजबूरी कहा जाता है, लेकिन यह भारतीय अर्थव्यवस्था में गहराते भरोसे के संकट का संकेत है। जब
रोज़गार अस्थिर हों और भविष्य अनिश्चित दिखे, तब लोग उत्पादन नहीं, भंडारण चुनते हैं—और
भारत में इसका सबसे सुरक्षित रूप सोना माना जाता है।इसका सीधा असर आम आदमी पर
पड़ता है। बढ़ती कीमतों ने मध्यम और निम्न वर्ग को या तो कर्ज़ में धकेल दिया है
या सामाजिक ज़रूरतों से पीछे हटने को मजबूर किया है। बचत शिक्षा, स्वास्थ्य और छोटे
व्यवसायों की बजाय निष्क्रिय संपत्ति में फँस रही है।आर्थिक स्तर पर महँगा सोना
आयात बिल बढ़ाता है, चालू खाता घाटा गहराता है और महँगाई को हवा देता है। इसका एक अनदेखा
प्रभाव आयुर्वेद पर पड़ता है—स्वर्ण भस्म जैसी औषधियाँ महँगी होकर आम मरीज की
पहुँच से बाहर हो रही हैं। सोने की चमक दरअसल उस नीति-संकट को उजागर करती है,
जिसमें आम आदमी,
आयुर्वेद और
अर्थव्यवस्था एक साथ पिस रहे हैं।
भारत में सोने की कीमतों की आसमानी उड़ान को अक्सर वैश्विक हालात की
अनिवार्य देन बताकर टाल दिया जाता है, लेकिन यह सच्चाई का अधूरा हिस्सा है। सोने का
लगातार महँगा होना दरअसल भारतीय अर्थव्यवस्था में गहराते भरोसे के संकट, असमान विकास और
नीतिगत विफलताओं का संकेत है। इसका असर सिर्फ़ निवेश या आभूषण बाज़ार तक सीमित
नहीं, बल्कि
आम आदमी की ज़िंदगी, जन-स्वास्थ्य और आयुर्वेद जैसी पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों तक गहराई से
फैला हुआ है।
आम नागरिक के लिए सोना केवल शौक़ या विलास नहीं, बल्कि सामाजिक सुरक्षा का
पारंपरिक साधन रहा है। शादी-विवाह, बीमारी या आपात स्थितियों में यही आख़िरी सहारा माना
जाता रहा है। लेकिन बढ़ती कीमतों ने मध्यम और निम्न वर्ग को या तो कर्ज़ लेने पर
मजबूर कर दिया है या सामाजिक ज़रूरतों से पीछे हटने को। इससे घरेलू अर्थव्यवस्था
कमजोर हो रही है, जहाँ बचत शिक्षा, स्वास्थ्य और छोटे व्यवसायों की बजाय डर के कारण
निष्क्रिय संपत्ति में फँस रही है।
अर्थव्यवस्था के स्तर पर यह प्रवृत्ति और भी ख़तरनाक है। भारत अपनी
अधिकांश सोने की ज़रूरत आयात से पूरी करता है। जैसे-जैसे कीमतें बढ़ती हैं,
आयात बिल बढ़ता
है, चालू
खाता घाटा गहराता है और रुपये पर दबाव बढ़ता है। इसका सीधा असर महँगाई पर पड़ता
है—खाद्य पदार्थ, ईंधन और दवाइयाँ महँगी होती जाती हैं। सरकार महँगाई नियंत्रण के दावे तो
करती है, लेकिन
उस नीतिगत ढाँचे को छूने से बचती है, जो लोगों को सोने की ओर धकेल रहा है।
इस आर्थिक संकट का एक गंभीर लेकिन उपेक्षित पहलू आयुर्वेदिक चिकित्सा पर
पड़ने वाला प्रभाव है। आयुर्वेद में स्वर्ण भस्म और स्वर्ण योगों का उपयोग
प्रतिरोधक क्षमता, बाल-स्वास्थ्य और दीर्घकालिक रोगों में होता आया है। सोने के दाम बढ़ने से
इन औषधियों की लागत इतनी बढ़ गई है कि वे आम रोगियों की पहुँच से बाहर होती जा रही
हैं। छोटे वैद्य, पारंपरिक औषधि निर्माता और ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्र या तो इन दवाओं का
निर्माण कम कर रहे हैं या पूरी तरह बंद कर रहे हैं। इसका सीधा असर जन-स्वास्थ्य पर
पड़ रहा है।
यह स्थिति आयुष को बढ़ावा देने के सरकारी दावों की वास्तविकता उजागर करती
है। मंचों पर आयुर्वेद को राष्ट्रीय विरासत बताया जाता है, लेकिन ज़मीनी स्तर पर उसकी
औषधीय ज़रूरतों को पूरी तरह बाज़ार के हवाले छोड़ दिया गया है। न स्वर्ण आधारित
आयुर्वेदिक दवाओं के लिए कोई मूल्य-संरक्षण नीति है, न सार्वजनिक आपूर्ति की
व्यवस्था। नतीजतन, पारंपरिक चिकित्सा भी धीरे-धीरे अमीरों की सुविधा बनती जा रही है।
सोने की महँगाई आर्थिक असमानता को और तीखा करती है। जिनके पास पहले से
सोना है, उनकी
संपत्ति बढ़ती जाती है, जबकि आम आदमी महँगाई, कर्ज़ और असुरक्षा के चक्र में फँसता जाता है। असल
सवाल यह नहीं है कि सोना क्यों महँगा हो रहा है, बल्कि यह है कि लोग
अर्थव्यवस्था, स्वास्थ्य व्यवस्था और राज्य पर भरोसा क्यों नहीं कर पा रहे हैं। जब
भविष्य असुरक्षित हो, तो सोना चमकता है—और उसी चमक में आम आदमी, आयुर्वेद और पूरी
अर्थव्यवस्था दबती चली जाती है।
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