Discrimination on the basis of gender, race and religion in higher educational institutions in India: An analytical study
सार (Abstract)
यह शोध-पत्र भारतीय उच्च शिक्षा संस्थानों (HEIs) के भीतर व्याप्त उन अदृश्य और वंचनात्मक संरचनाओं का गहन अन्वेषण करता है, जो आधुनिकता और तर्क के दावों के बावजूद छात्रों के अनुभवों को हाशिए पर धकेलती हैं। शोध का मुख्य उद्देश्य यह समझना है कि कैसे लिंग, नस्ल और धर्म जैसी पहचानें शैक्षणिक परिसरों में भेदभाव के बहुस्तरीय तंत्र का निर्माण करती हैं। ऐतिहासिक रूप से, भारतीय विश्वविद्यालय अभिजात वर्ग के वर्चस्व के केंद्र रहे हैं, जहाँ स्वतंत्रता के बाद संवैधानिक प्रावधानों (अनुच्छेद 15, 16) के बावजूद संस्थागत संस्कृति में पूर्ण परिवर्तन नहीं आ सका है। लिंग के संदर्भ में, यह अध्ययन छात्राओं पर थोपे गए पितृसत्तात्मक नियंत्रण, जैसे कि हॉस्टल के भेदभावपूर्ण नियम (Curfew Hours) और STEM क्षेत्रों में व्याप्त लैंगिक पूर्वाग्रहों का विश्लेषण करता है। नस्ल के आयाम पर, यह शोध पूर्वोत्तर भारत के छात्रों के प्रति व्याप्त 'नस्लीय नस्लवाद' और 'अन्यीकरण' (Othering) की प्रक्रिया को रेखांकित करता है, जहाँ शारीरिक बनावट और सांस्कृतिक भिन्नता को संस्थागत अलगाव का आधार बनाया जाता है। धार्मिक आधार पर, विशेष रूप से मुस्लिम छात्रों के संदर्भ में, शोध यह तर्क देता है कि बढ़ते राजनीतिक ध्रुवीकरण ने परिसरों में 'संदेह की संस्कृति' को जन्म दिया है, जो उनकी शैक्षणिक भागीदारी को बाधित करती है। इस अध्ययन की मौलिकता 'अंतर्संबंधात्मकता' (Intersectionality) के सिद्धांत के प्रयोग में निहित है, जो दर्शाता है कि एक छात्र जब एक साथ महिला, धार्मिक अल्पसंख्यक और विशिष्ट नस्लीय पहचान से जुड़ा होता है, तो उसके लिए वंचना का स्वरूप अधिक जटिल और दमनकारी हो जाता है। शोध-पत्र UGC Equity Regulations 2026 जैसी हालिया नीतियों का आलोचनात्मक मूल्यांकन करता है और यह निष्कर्ष निकालता है कि केवल कानूनी प्रावधान पर्याप्त नहीं हैं। वास्तविक समावेशन के लिए विश्वविद्यालयों को अपने प्रशासनिक ढांचे में प्रतिनिधित्व बढ़ाने, पाठ्यक्रम का वि-औपनिवेशीकरण (Decolonization) करने और एक स्वतंत्र निगरानी तंत्र स्थापित करने की आवश्यकता है। यह शोध अंततः परिसरों को 'लोकतांत्रिक सार्वजनिक क्षेत्र' के रूप में पुनर्परिभाषित करने का आह्वान करता है।
मुख्य शब्द: लिंग आधारित भेदभाव, नस्लीय नस्लवाद, धार्मिक अल्पसंख्यक, उच्च शिक्षा, अंतर्संबंधात्मकता (Intersectionality), UGC नीति 2026, संस्थागत वंचना
Abstract
Abstract This research paper presents a critical exploration of the invisible and deprivational structures within Indian Higher Education Institutions (HEIs) that marginalize student experiences despite claims of modernity and rationality. The primary objective of the study is to understand how identities such as gender, race, and religion construct multi-layered mechanisms of discrimination on academic campuses. Historically, Indian universities have remained centers of elite hegemony. Despite post-independence constitutional mandates (Articles 15, 16), the institutional culture has failed to undergo a complete democratic transformation. Regarding gender, the study analyzes the patriarchal controls imposed on female students, such as discriminatory hostel regulations (curfew hours) and the gender bias prevalent in STEM fields. On the dimension of race, the research highlights 'racial racism' and the process of 'Othering' directed toward students from Northeast India, where physical appearance and cultural differences become grounds for institutional alienation. In the context of religion, particularly concerning Muslim students, the paper argues that increasing political polarization has fostered a 'culture of suspicion' on campuses, hindering their academic engagement. The originality of this study lies in the application of the framework of 'Intersectionality,' demonstrating that when a student identifies simultaneously as a woman, a religious minority, and from a specific racial background, the nature of deprivation becomes more complex and oppressive. The paper critically evaluates recent policy interventions, such as the UGC Equity Regulations 2026, concluding that legal provisions alone are insufficient. For genuine inclusion, universities must increase representation in administrative structures, decolonize the curriculum, and establish an independent monitoring mechanism. Ultimately, the research calls for redefining campuses as 'democratic public spheres.
Keywords: Gender Discrimination, Racial Racism, Religious Minorities, Higher Education, Intersectionality, UGC Policy 2026, Institutional Deprivation..
1. भूमिका (Introduction)
भारतीय उच्च शिक्षा संस्थान (HEIs) सैद्धांतिक रूप से आधुनिकता, वैज्ञानिक चेतना और लोकतांत्रिक मूल्यों के
प्रसव केंद्र माने जाते हैं। इन्हें समाज का वह 'लघु रूप' माना जाता है जहाँ सामाजिक न्याय और समानता
के आदर्शों को व्यावहारिक धरातल पर उतारा जाना चाहिए। हबरामस के 'पब्लिक स्फीयर' के सिद्धांत के आलोक में देखें तो
विश्वविद्यालयों को एक ऐसा मुक्त क्षेत्र होना चाहिए जहाँ तर्क, विवेक और मानवीय गरिमा सर्वोपरि हो, किंतु समकालीन यथार्थ इस आदर्शवादी छवि के
उलट एक जटिल और विभेदकारी धरातल प्रस्तुत करता है। वर्तमान शैक्षणिक परिवेश में
संस्थान अक्सर उन सामाजिक पूर्वाग्रहों और पदानुक्रमों को समाप्त करने के बजाय
उन्हें नए सिरे से पुनरुत्पादित करने का माध्यम बन जाते हैं। यह शोध-पत्र इस
केंद्रीय प्रश्न की पड़ताल करता है कि कैसे भारतीय कैंपस लिंग, नस्ल और धर्म जैसी पहचानों के आधार पर
निर्मित 'वंचनात्मक संरचनाओं' के माध्यम से कुछ विशिष्ट समूहों को हाशिये पर धकेल देते हैं।
उच्च शिक्षा में इस भेदभाव को समझने के लिए पियरे
बुर्दियू की 'सांस्कृतिक पूंजी' की अवधारणा अत्यंत प्रासंगिक है, जो स्पष्ट करती है कि विश्वविद्यालय अक्सर 'योग्यता' को एक तटस्थ शब्द के रूप में उपयोग करते हैं, जबकि व्यवहार में यह योग्यता उस वर्ग की
सांस्कृतिक आदतों और भाषा का प्रतिबिंब होती है जो ऐतिहासिक रूप से सत्ता के
केंद्र में रहा है। जब कोई छात्र अपनी विशिष्ट लैंगिक, नस्लीय या अल्पसंख्यक धार्मिक पहचान के साथ
इन संस्थानों में प्रवेश करता है, तो उसे न केवल अकादमिक चुनौतियों से, बल्कि उन अदृश्य संरचनाओं से भी जूझना पड़ता
है जो उसे 'अयोग्य' या 'बाहरी' सिद्ध करने का प्रयास करती हैं। यह वंचना तीन प्रमुख धुरियों पर टिकी है।
लिंग के संदर्भ में, परिसरों में महिलाओं की बढ़ती संख्या के बावजूद 'संस्थागत पितृसत्ता' और निर्णय लेने वाली प्रक्रियाओं में उनकी
सीमित भागीदारी एक 'कांच की छत' की तरह काम करती है। वहीं, पूर्वोत्तर भारत के छात्रों के प्रति व्याप्त
'नस्लीय
नस्लवाद' उनके शारीरिक और सांस्कृतिक अलगाव को गहरा करता है, जिसे अक्सर एक सीमित 'मुख्यधारा' के ढांचे में फिट न होने के कारण 'अन्यीकरण' का शिकार बनाया जाता है। साथ ही, राष्ट्रीय और वैश्विक राजनीतिक ध्रुवीकरण ने
धार्मिक अल्पसंख्यकों के प्रति परिसरों में 'निगरानी की संस्कृति' को जन्म दिया है, जिससे उनके लिए शैक्षणिक स्थान मनोवैज्ञानिक
रूप से असुरक्षित हो गया है।
इन वंचनात्मक संरचनाओं के परिणाम केवल सामाजिक अलगाव
तक सीमित नहीं हैं, बल्कि ये छात्र के अकादमिक प्रदर्शन और मानसिक स्वास्थ्य पर घातक प्रभाव
डालते हैं। जब किसी छात्र की पहचान को ही उसकी कमजोरी के रूप में प्रस्तुत किया
जाता है, तो उसकी संज्ञानात्मक क्षमता और आत्मविश्वास क्षीण होने लगता है। ग्रेडिंग
में पक्षपात, शोध निर्देशन में उपेक्षा और परिसरों में होने वाले 'सूक्ष्म-भेदभाव'
(Micro-aggressions) छात्रों में अवसाद और हीनभावना पैदा करते हैं। रोहित वेमुला, पायल तड़वी और निडो तानिया जैसे मामले इस बात
के दुखद प्रमाण हैं कि जब संस्थान छात्रों को भावनात्मक और सामाजिक सुरक्षा देने
में विफल होते हैं, तो यह 'संस्थागत उत्पीड़न' का रूप ले लेता है। यद्यपि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 और 15 समानता की गारंटी देते हैं और हालिया 'UGC Equity
Regulations 2026' जैसे
नीतिगत प्रयास समावेशन की दिशा में एक प्रशासनिक पहल हैं, किंतु यह शोध रेखांकित करता है कि केवल
कानूनी प्रावधान तब तक पर्याप्त नहीं हैं जब तक संस्थानों की आंतरिक नैतिकता और
सामाजिक दृष्टिकोण में संरचनात्मक परिवर्तन न आए। यह अध्ययन उन तंत्रों को अनावृत
करने का प्रयास है जो आधुनिक भारत के शिक्षा केंद्रों में 'लोकतंत्र' को एक अधूरी और खंडित परियोजना बनाकर रखते
हैं।
2. लिंग आधारित
भेदभाव: पितृसत्तात्मक परिसर और संरचनात्मक वंचना
2.1 स्थानिक
पितृसत्ता और हॉस्टल नियमों का विभेदकारी स्वरूप
भारतीय उच्च शिक्षा संस्थानों में लिंग आधारित भेदभाव
केवल प्रवेश के आंकड़ों या स्त्री-पुरुष अनुपात तक सीमित नहीं है, बल्कि यह संस्थानों की वैचारिक और प्रशासनिक
संरचना में गहराई से व्याप्त है। परिसरों को अक्सर प्रगतिशील माना जाता है, किंतु व्यवहार में वे पितृसत्तात्मक समाज के
ही विस्तारित रूप सिद्ध होते हैं। यह नियंत्रण 'सुरक्षा' के छद्म आवरण में छात्राओं पर थोपे गए
भेदभावपूर्ण नियमों के माध्यम से प्रकट होता है। अधिकांश विश्वविद्यालयों में
छात्राओं के लिए हॉस्टल के 'कर्फ्यू टाइम' (Curfew Hours) लड़कों की तुलना में कहीं अधिक सख्त हैं। यह
संरचनात्मक वंचना सीधे तौर पर छात्राओं की शैक्षणिक स्वतंत्रता को बाधित करती है, क्योंकि वे देर रात तक पुस्तकालयों, प्रयोगशालाओं या सामूहिक चर्चाओं का हिस्सा
नहीं बन पातीं। इसे समाजशास्त्रीय शब्दावली में 'स्थानिक पितृसत्ता' (Spatial
Patriarchy) कहा जा
सकता है, जो महिलाओं के लिए सार्वजनिक और शैक्षणिक स्थानों को समयबद्ध और सीमित कर
देती है। 'पिंजरा तोड़' जैसे आंदोलनों ने इसी संरचनात्मक वंचना को चुनौती दी है।
2.2 अकादमिक
संस्कृति और योग्यता का लैंगिक पूर्वाग्रह
भेदभाव का दूसरा महत्वपूर्ण आयाम अकादमिक संस्कृति और
विशेष रूप से 'STEM' (विज्ञान, तकनीक, इंजीनियरिंग और गणित) जैसे क्षेत्रों में व्याप्त लैंगिक रूढ़िवादिता है।
शोध और उच्च स्तर की अकादमिक चर्चाओं में महिलाओं को अक्सर सूक्ष्म-पूर्वाग्रहों (Micro-aggressions)
का सामना करना पड़ता है, जहाँ उनकी बौद्धिक क्षमताओं को उनके लिंग के
आधार पर कमतर आंका जाता है। इसे 'ग्लास सीलिंग' (Glass
Ceiling) कहा जाता
है, जो महिला
शोधकर्ताओं और प्रोफेसरों को शीर्ष प्रशासनिक और निर्णय लेने वाले पदों तक पहुँचने
से रोकती है। अखिल भारतीय उच्च शिक्षा सर्वेक्षण (AISHE 2023-24) के आंकड़े बताते हैं कि उच्च शिक्षा में
छात्राओं का नामांकन तो बढ़ा है, लेकिन शोध और उच्च वेतन वाले तकनीकी पदों पर उनका प्रतिनिधित्व अभी भी
असंतुलित है। यह असंतुलन केवल व्यक्तिगत पसंद का परिणाम नहीं, बल्कि उन वंचनात्मक संरचनाओं की देन है जो
विश्वविद्यालय स्तर तक महिलाओं को विशिष्ट विषयों और भूमिकाओं तक सीमित रखती हैं।
2.3 संस्थागत
सुरक्षा तंत्र की विफलता और 'साइलेंसिंग'
परिसरों में लिंग आधारित भेदभाव का सबसे गंभीर रूप यौन
उत्पीड़न और सुरक्षा तंत्र की विफलता है। यद्यपि सर्वोच्च न्यायालय के विशाखा
दिशा-निर्देशों के बाद आंतरिक शिकायत समितियों (ICC) का गठन अनिवार्य किया गया है, लेकिन कई संस्थानों में ये समितियां या तो
निष्क्रिय हैं या प्रशासन के प्रभाव में काम करती हैं। जब कोई छात्रा उत्पीड़न की
शिकायत करती है, तो अक्सर उसे ही 'संस्थागत गैसलाइटिंग' (Institutional Gaslighting) का सामना करना पड़ता है, जहाँ उसकी चरित्र-हानि की जाती है या उसे
कैरियर खराब होने का डर दिखाकर चुप रहने की सलाह दी जाती है। यह 'चुप कराने की संस्कृति' परिसरों को महिलाओं के लिए एक शत्रुतापूर्ण
स्थान (Hostile Environment) बना देती है।
2.4 अंतर्संबंधात्मकता
(Intersectionality) और बहुस्तरीय वंचना
इस भेदभाव का एक और गहरा पहलू 'अंतर्संबंधात्मकता' (Intersectionality) है। एक सवर्ण महिला की तुलना में एक दलित, आदिवासी या अल्पसंख्यक महिला के लिए यह संघर्ष कहीं अधिक कठिन होता है। उन्हें लिंग के साथ-साथ जातिगत और धार्मिक पूर्वाग्रहों की दोहरी या तिहरी मार झेलनी पड़ती है। उदाहरण के लिए, एक मुस्लिम छात्रा को हिजाब जैसे मुद्दों पर न केवल पितृसत्ता बल्कि धार्मिक कट्टरता और बहुसंख्यकवादी पूर्वाग्रहों से भी एक साथ लड़ना पड़ता है। अंततः, जब तक विश्वविद्यालय अपने बुनियादी ढांचे और व्यवहार में 'संवैधानिक नैतिकता' को पितृसत्तात्मक आदतों से ऊपर नहीं रखेंगे, तब तक उच्च शिक्षा संस्थानों में वास्तविक लैंगिक समावेशन एक अधूरी परियोजना ही बना रहेगा।
तालिका 1: उच्च शिक्षा के विभिन्न स्तरों पर लैंगिक भागीदारी (GER)
|
शिक्षा का स्तर |
पुरुष नामांकन (प्रति 100) |
महिला नामांकन (प्रति 100) |
जेंडर पैरिटी इंडेक्स (GPI) |
|
स्नातक (UG) |
100 |
105 |
1.05 (बेहतर स्थिति) |
|
परातस्नातक (PG) |
100 |
102 |
1.02 |
|
पीएचडी (PhD) |
100 |
82 |
0.82 (गंभीर गिरावट) |
|
शिक्षक (Faculty) |
100 |
75 |
0.75 (नेतृत्व में कमी) |
3. नस्लीय
भेदभाव: 'अन्यीकरण' की प्रक्रिया और
आंतरिक उपनिवेशवाद
3.1 दृश्य
भिन्नता और 'विदेशी' होने का ठप्पा
भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों से आने वाले छात्रों के
लिए कैंपस का अनुभव अक्सर एक 'सांस्कृतिक आघात' की तरह होता है। उनकी शारीरिक बनावट और मंगोलॉयड (Mongoloid) विशेषताओं के कारण उन्हें अक्सर 'भारतीय' मानने से इनकार कर दिया जाता है। परिसरों में
उन्हें 'चाइनीज', 'मोमो', या 'कोरोना' जैसे अपमानजनक शब्दों से संबोधित किया जाना एक सामान्य प्रक्रिया बन गई
है। समाजशास्त्र में इसे 'अन्यीकरण' (Othering) कहा जाता है, जहाँ एक समूह खुद को 'सामान्य' मानता है और दूसरों को उनकी भिन्नता के आधार
पर 'असामान्य' या 'बाहरी' घोषित कर देता है। यह स्थिति छात्रों में
गहरे अलगाव और असुरक्षा की भावना पैदा करती है, जिससे उनकी शैक्षणिक एकाग्रता बाधित होती है।
3.2 सांस्कृतिक
अलगाव और खान-पान पर हमला
परिसरों के छात्रावासों (Hostels) में पूर्वोत्तर के छात्रों को उनके खान-पान
और जीवनशैली के कारण भी भेदभाव का सामना करना पड़ता है। उनके पारंपरिक भोजन की गंध
या उसे बनाने के तरीकों को अक्सर 'अस्वास्थ्यकर' या 'अजीब' मानकर मज़ाक उड़ाया जाता है। विश्वविद्यालय
के मेस और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में पूर्वोत्तर की विविधता को स्थान न मिलना इस
बात का प्रमाण है कि संस्थान केवल एक विशिष्ट 'हिंदी-हृदय प्रदेश' की संस्कृति को ही राष्ट्रीय संस्कृति के रूप
में थोपना चाहते हैं। इसे 'आंतरिक उपनिवेशवाद' (Internal Colonialism) के रूप में देखा जा सकता है, जहाँ देश के भीतर ही कुछ क्षेत्रों की
संस्कृति को 'मुख्यधारा' के अधीन रखने का प्रयास किया जाता है।
3.3 शैक्षणिक
उपेक्षा और ज्ञान-उत्पादन की राजनीति
नस्लीय भेदभाव केवल सामाजिक व्यवहार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पाठ्यक्रम और ज्ञान-उत्पादन की
प्रक्रियाओं में भी अंतर्निहित है। भारतीय विश्वविद्यालयों के इतिहास, राजनीति विज्ञान और समाजशास्त्र के
पाठ्यक्रमों में पूर्वोत्तर के योगदान और वहां के आंदोलनों को लगभग नगण्य स्थान
दिया जाता है। जब छात्र अपनी पहचान से जुड़े विषयों पर शोध करना चाहते हैं, तो उन्हें अक्सर 'डेटा की कमी' या 'विषय की अप्रासंगिकता' का हवाला देकर हतोत्साहित किया जाता है। यह
शैक्षणिक वंचना उन्हें यह महसूस कराती है कि उनका इतिहास और उनकी पहचान शैक्षणिक
परिसरों के लिए 'बौद्धिक रूप से महत्वहीन' है।
3.4 निडो तानिया
केस और संस्थागत सुरक्षा की विफलता
नस्लीय भेदभाव का सबसे हिंसक चेहरा निडो तानिया (2014) जैसे प्रकरणों में दिखाई देता है। दिल्ली
जैसे महानगरों में उत्तर-पूर्वी छात्रों पर होने वाले हमले यह सिद्ध करते हैं कि
विश्वविद्यालय और राज्य सुरक्षा तंत्र उन्हें सुरक्षा प्रदान करने में विफल रहे
हैं। बेजबरुआ समिति (Bezbaruah Committee) की सिफारिशों के बावजूद, परिसरों में नस्लवाद-विरोधी (Anti-Racism)
समितियों का अभाव है। अधिकांश
संस्थानों में नस्लीय शिकायतों को 'लड़कों की आपसी लड़ाई' मानकर रफा-दफा कर दिया जाता है, जिससे अपराधी तत्वों को बल मिलता है और
पीड़ित छात्र स्वयं को कानूनी और प्रशासनिक रूप से अनाथ महसूस करते हैं।
तालिका 2: पूर्वोत्तर छात्रों के विरुद्ध भेदभाव
के प्रकार (सर्वेक्षण डेटा)'बेजबरुआ समिति' के संदर्भ में
|
भेदभाव का प्रकार |
रिपोर्ट की गई आवृत्ति (%) |
मुख्य स्थान |
|
अपमानजनक टिप्पणी (Slurs) |
78% |
कैंपस और सार्वजनिक स्थान |
|
हॉस्टल/आवास में भेदभाव |
54% |
निजी पीजी और हॉस्टल आवंटन |
|
अकादमिक उपेक्षा |
32% |
क्लासरूम और लैब चर्चाएँ |
|
शारीरिक हिंसा/हमले |
12% |
कैंपस के बाहर के क्षेत्र |
4. धार्मिक
भेदभाव: अल्पसंख्यक पहचान, राजनीति और असुरक्षा
4.1 परिसरों में
'संदेह की संस्कृति' और निगरानी
धार्मिक भेदभाव का सबसे प्रत्यक्ष रूप अल्पसंख्यक
छात्रों, विशेषकर
मुस्लिम छात्रों को 'संदेह' की दृष्टि से देखने की प्रवृत्ति में दिखाई देता है। शैक्षणिक संस्थानों
के भीतर एक ऐसी 'निगरानी की संस्कृति' (Culture of Surveillance) विकसित हुई है, जहाँ अल्पसंख्यक छात्रों की राजनीतिक
सक्रियता, उनकी धार्मिक मान्यताओं और यहाँ तक कि उनके व्यक्तिगत विमर्श को 'राष्ट्र-विरोधी' या 'कट्टरपंथी' होने के चश्मे से देखा जाता है। दाढ़ी, हिजाब या नमाज़ जैसे धार्मिक प्रतीकों को
अक्सर शैक्षणिक परिसरों की तटस्थता के विरुद्ध मानकर छात्रों को हतोत्साहित किया
जाता है। यह प्रक्रिया छात्रों में एक प्रकार का 'मनोवैज्ञानिक अलगाव' (Psychological
Isolation) पैदा करती
है, जिससे वे
कैंपस की मुख्यधारा की गतिविधियों से कटने लगते हैं।
4.2 ध्रुवीकरण
और 'अन्यीकरण' की राजनीति
समकालीन भारतीय परिसरों में वैचारिक ध्रुवीकरण ने
अल्पसंख्यक छात्रों के लिए सामाजिक स्थान को संकुचित कर दिया है। सोशल मीडिया और
राजनीतिक विमर्श का प्रभाव क्लासरूम के भीतर भी महसूस किया जाता है। अक्सर
संवेदनशील विषयों पर चर्चा के दौरान अल्पसंख्यक छात्रों की राय को पूर्वाग्रहों के
आधार पर खारिज कर दिया जाता है। सच्चर कमेटी (Sachar Committee) की रिपोर्ट के बाद के वर्षों में भी उच्च
शिक्षा में मुस्लिम छात्रों की भागीदारी का ग्राफ अन्य समुदायों की तुलना में
चिंताजनक रहा है। इसका एक प्रमुख कारण परिसरों में व्याप्त वह असुरक्षा का भाव है, जो उन्हें निरंतर यह एहसास कराता है कि वे
यहाँ 'समान नागरिक' नहीं बल्कि 'संदिग्ध अतिथि' हैं।
4.3 संस्थागत
दमन और न्याय की चयनात्मकता
धार्मिक भेदभाव का संस्थागत स्वरूप तब स्पष्ट होता है
जब विश्वविद्यालयों में अनुशासनात्मक कार्रवाई (Disciplinary Action) की बारी आती है। कई हालिया उदाहरणों (जैसे
जामिया और जेएनयू प्रकरण) में देखा गया है कि विरोध प्रदर्शनों या वैचारिक मतभेदों
के दौरान अल्पसंख्यक छात्रों को चयनात्मक तरीके से निशाना बनाया गया। उन पर कठोर
कानूनी धाराएं लगाना या उन्हें प्रशासनिक रूप से निष्कासित करना एक डराने वाली
रणनीति (Chilling Effect) के रूप में कार्य करता है। यह भेदभाव न केवल
उनकी वर्तमान शिक्षा को बाधित करता है, बल्कि उनके भविष्य के करियर और पेशेवर
संभावनाओं पर भी स्थाई काला धब्बा लगा देता है।
4.4 अल्पसंख्यक
अनुभव की विविधता और आंतरिक वंचना
यह शोध यह भी रेखांकित करता है कि अल्पसंख्यक अनुभव
एकरूप (Monolithic) नहीं हैं। जहाँ मुस्लिम छात्रों को राजनीतिक और पहचान संबंधी असुरक्षा का
सामना करना पड़ता है, वहीं सिख, ईसाई और बौद्ध छात्रों के अनुभव अलग होते हैं। कभी-कभी उन्हें 'सांस्कृतिक बहुसंख्यकवाद' का सामना करना पड़ता है जहाँ कैंपस के सभी
सार्वजनिक कार्यक्रम और त्योहार केवल एक विशिष्ट धर्म की परंपराओं के इर्द-गिर्द
केंद्रित होते हैं। यह 'सांस्कृतिक वर्चस्व' अल्पसंख्यकों को यह महसूस कराता है कि उनकी परंपराएं और उनकी पहचान
संस्थान की सामूहिक चेतना का हिस्सा नहीं हैं। इसके अतिरिक्त, एक मुस्लिम छात्रा को हिजाब प्रतिबंध जैसे
मुद्दों के माध्यम से लिंग और धर्म—दोनों आधारों पर दोहरी वंचना झेलनी पड़ती है।
तालिका 3: सामाजिक समूहों के आधार पर उच्च शिक्षा
में नामांकन (प्रतिशत में)
खंड 3 और 4 के जनसंख्या के अनुपात में
अल्पसंख्यक और हाशिए के समूहों की भागीदारी
|
सामाजिक समूह |
कुल नामांकन (%) |
टिप्पणियाँ |
|
अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) |
37.8% |
सबसे बड़ा समूह, लेकिन पेशेवर कोर्सेज में कमी। |
|
अनुसूचित जाति (SC) |
15.3% |
आरक्षण के बावजूद उच्च शोध स्तर पर भागीदारी कम। |
|
अनुसूचित जनजाति (ST) |
6.3% |
मुख्य रूप से क्षेत्रीय विश्वविद्यालयों तक सीमित। |
|
मुस्लिम अल्पसंख्यक |
4.6% |
जनसंख्या के अनुपात में (14.2%) सबसे कम भागीदारी। |
|
अन्य अल्पसंख्यक |
2.3% |
मुख्य रूप से ईसाई और सिख समुदाय। |
5. भेदभाव की
अंतर्संरचना: पहचानों का संगम और बहुस्तरीय वंचना
5.1 अंतर्संबंधात्मकता
(Intersectionality) का सैद्धांतिक ढांचा
उच्च शिक्षा में भेदभाव को केवल एक आयाम (जैसे केवल
लिंग या केवल जाति) से देखना समस्या की वास्तविकता को सीमित कर देता है। किम्बरली
क्रेंशॉ (Kimberlé Crenshaw) द्वारा प्रतिपादित 'अंतर्संबंधात्मकता' (Intersectionality) का सिद्धांत यह स्पष्ट करता है कि जब एक
छात्र कई हाशिए की पहचानों को एक साथ धारण करता है, तो उसके उत्पीड़न का स्वरूप केवल 'जोड़' नहीं होता, बल्कि वह गुणात्मक रूप से अधिक दमनकारी हो
जाता है। उदाहरण के लिए, एक सवर्ण महिला और एक दलित महिला के अनुभव समान नहीं हो सकते। दलित महिला
को पितृसत्ता के साथ-साथ जातिगत पदानुक्रम की मार भी झेलनी पड़ती है, जिसे 'दोहरी वंचना' कहा जाता है।
5.2 पहचानों का संगम: जाति, लिंग और धर्म
भारतीय परिसरों में अंतर्संबंधात्मकता के कई रूप देखे
जा सकते हैं। एक मुस्लिम छात्रा को न केवल लिंग के आधार पर पितृसत्तात्मक
प्रतिबंधों का सामना करना पड़ता है, बल्कि उसे अपनी धार्मिक पहचान के कारण 'राष्ट्र-विरोधी' या 'रूढ़िवादी' होने के रूढ़िबद्ध आरोपों (Stereotypes)
से भी लड़ना पड़ता है। इसी
प्रकार, यदि वह छात्रा पूर्वोत्तर भारत की है, तो उसमें 'नस्ल' का एक तीसरा आयाम भी जुड़ जाता है। यह 'Matrix of
Domination' (वर्चस्व का
जाल) छात्र के लिए कैंपस को एक चक्रव्यूह बना देता है, जहाँ उसे हर कदम पर अपनी नागरिकता, अपनी योग्यता और अपनी नैतिकता को सिद्ध करना
पड़ता है।
5.3 वंचना का
संचयी प्रभाव और 'ड्रॉप-आउट' की
प्रवृत्ति
अंतर्संबंधात्मक भेदभाव का सबसे गंभीर प्रभाव छात्रों
के शैक्षणिक जीवन की निरंतरता पर पड़ता है। शोध के आंकड़े दर्शाते हैं कि उच्च
शिक्षा में 'ड्रॉप-आउट' (पढ़ाई छोड़ने) की दर उन छात्रों में सबसे अधिक है जो एक साथ
कई वंचित श्रेणियों (जैसे ग्रामीण पृष्ठभूमि, दलित जाति और महिला लिंग) से आते हैं।
संस्थानों का सामान्य ढांचा अक्सर एक 'औसत छात्र' (जो प्रायः शहरी, सवर्ण और पुरुष होता है) को ध्यान में रखकर
बनाया जाता है। जब कोई छात्र इस 'मानक' से जितनी दूर होता जाता है, संस्थान की संरचनाएं उसके लिए उतनी ही अधिक
दुर्गम होती जाती हैं। यह संचयी वंचना (Cumulative Deprivation) अंततः छात्र को व्यवस्था से बाहर धकेल देती
है।
5.4 नीतिगत
अंधेरा और 'सिंगल-एक्सिस' दृष्टिकोण
वर्तमान में हमारी अधिकांश नीतियां 'सिंगल-एक्सिस' (एकल-धुरी) दृष्टिकोण पर आधारित हैं। उदाहरण
के तौर पर, अनुसूचित जाति (SC) के लिए बने सेल केवल जातिगत मुद्दों को देखते हैं और महिला प्रकोष्ठ केवल
लैंगिक मुद्दों को। समस्या तब उत्पन्न होती है जब एक दलित महिला को यौन उत्पीड़न
का सामना करना पड़ता है—अक्सर प्रशासन उसे केवल एक 'सामान्य उत्पीड़न' का मामला मानकर उसके 'जातिगत' आयाम को नज़रअंदाज़ कर देता है। यह शोध तर्क
देता है कि जब तक UGC Equity Regulations और आंतरिक समितियां अपनी जांच में 'अंतर्संबंधात्मक दृष्टिकोण' को शामिल नहीं करेंगी, तब तक हाशिए के सबसे निचले पायदान पर खड़े
छात्रों को न्याय मिलना असंभव है।
तालिका 4: अंतर्संबंधात्मक (Intersectional)
वंचना का प्रभाव
|
छात्र की श्रेणी |
संभावित ड्रॉप-आउट दर (सांकेतिक) |
मुख्य कारण |
|
सामान्य (पुरुष) |
निम्न (5-8%) |
आर्थिक कारण |
|
दलित महिला |
उच्च (22-25%) |
जाति + पितृसत्ता + आर्थिक तंगी |
|
मुस्लिम महिला |
उच्च (28-30%) |
असुरक्षा + सामाजिक रूढ़िवादिता |
|
ST महिला (पूर्वोत्तर) |
मध्यम-उच्च (18-20%) |
सांस्कृतिक अलगाव + भाषाई बाधा |
6. नीतिगत
हस्तक्षेप और चुनौतियां: UGC Regulations 2026
उच्च शिक्षण संस्थानों में व्याप्त भेदभाव को समाप्त
करने के लिए हाल ही में अधिसूचित UGC (Promotion of Equity in Higher Education
Institutions) Regulations, 2026 एक महत्वपूर्ण नीतिगत मोड़ है। यह नीति 2012 के पुराने दिशा-निर्देशों का स्थान लेती है
और दंडात्मक प्रावधानों के माध्यम से संस्थानों को जवाबदेह बनाने का प्रयास करती
है।
6.1 प्रमुख
प्रावधान और संरचनात्मक सुधार
UGC की नई नीति केवल नैतिक अपील तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक प्रवर्तनीय (Enforceable)
ढांचा प्रदान करती है:
- समान अवसर केंद्र (EOC): प्रत्येक विश्वविद्यालय और कॉलेज के लिए
'Equal Opportunity Centre' की स्थापना अनिवार्य की गई
है, जो कैंपस में समावेशन की नीतियों को लागू करेगा।
- इक्विटी कमेटी और प्रतिनिधित्व: इन केंद्रों के तहत एक 'इक्विटी कमेटी' का गठन होगा, जिसकी अध्यक्षता संस्थान का
प्रमुख करेगा। इसमें अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST), अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC), महिलाओं और दिव्यांगों का
प्रतिनिधित्व अनिवार्य है।
- शिकायत निवारण तंत्र: भेदभाव की शिकायतों के लिए 24x7 हेल्पलाइन, ऑनलाइन पोर्टल और सख्त
समय-सीमा (शिकायत के 24 घंटे के भीतर बैठक और 15 दिनों में रिपोर्ट) तय की
गई है।
- इक्विटी स्क्वाड (Equity Squads): कैंपस के संवेदनशील इलाकों में निगरानी
के लिए मोबाइल टीमों का प्रावधान किया गया है ताकि भेदभाव की घटनाओं को रोका
जा सके।
6.2 दंडात्मक
कार्यवाही और जवाबदेही
नीति में पहली बार संस्थानों के लिए कठोर परिणामों का
उल्लेख है। यदि कोई संस्थान इन नियमों का उल्लंघन करता है, तो UGC निम्नलिखित कदम उठा सकता है:
- विश्वविद्यालय अनुदान (Grants) पर रोक।
- डिग्री प्रदान करने के विशेषाधिकार का निलंबन।
- UGC की मान्यता प्राप्त सूची (Section
2(f) and 12B) से
निष्कासन।
6.3 चुनौतियां
और आलोचनात्मक मूल्यांकन
नीति के प्रभावी होने के बावजूद, इसके क्रियान्वयन को लेकर गंभीर चुनौतियां और
विवाद सामने आए हैं:
- न्यायिक हस्तक्षेप: जनवरी 2026 में, भारत के सर्वोच्च न्यायालय
ने इन नियमों के क्रियान्वयन पर यह कहते हुए रोक (Stay) लगा दी कि इनके प्रावधान 'अस्पष्ट'
(Vague) हैं
और इनके दुरुपयोग की संभावना है। न्यायालय की चिंता इस बात को लेकर थी कि
सामान्य श्रेणी (General Category) के छात्रों को इस सुरक्षा तंत्र से बाहर
रखा गया है।
- प्रतिनिधित्व बनाम स्वायत्तता: कई शिक्षक संगठनों का तर्क है कि
समितियों का गठन लोकतांत्रिक तरीके से चुने गए प्रतिनिधियों के बजाय संस्थान
प्रमुख की 'मर्जी' पर निर्भर है, जिससे पारदर्शिता का संकट पैदा हो सकता है।
- निगरानी बनाम भय का वातावरण: आलोचकों का मानना है कि 'इक्विटी स्क्वाड' जैसी निरंतर निगरानी
व्यवस्था परिसरों में भरोसे के बजाय भय और अविश्वास का माहौल पैदा कर सकती
है।
- संसाधनों का अभाव: छोटे कॉलेजों के लिए 24x7 हेल्पलाइन और समर्पित
केंद्र चलाना प्रशासनिक और वित्तीय दृष्टि से एक बड़ी चुनौती है।
अंततः, UGC Regulations 2026 संस्थागत न्याय की दिशा में एक साहसिक प्रयास
है, लेकिन इसकी
सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि यह 'योग्यता बनाम समावेशन' के विवाद को सुलझाते हुए एक निष्पक्ष और
पारदर्शी तंत्र कैसे विकसित करता है।
7. निष्कर्ष और
भविष्य की राह (Conclusion & Suggestions)
7.1 निष्कर्ष:
एक अधूरी लोकतांत्रिक परियोजना
इस शोध का विस्तृत विश्लेषण यह स्पष्ट करता है कि
भारतीय उच्च शिक्षा संस्थान केवल ज्ञान के निष्क्रिय प्रसारक नहीं हैं, बल्कि वे उन सामाजिक विषमताओं के सक्रिय
पुनरुत्पादक भी हैं जो हमारे समाज की जड़ों में व्याप्त हैं। लिंग, नस्ल और धर्म के आधार पर निर्मित वंचनात्मक
संरचनाएं कोई आकस्मिक त्रुटियां नहीं हैं, बल्कि वे संस्थानों के ऐतिहासिक और प्रशासनिक
ढांचे में गहराई से अंतर्निहित हैं। 'मेरिट' या 'योग्यता' के नाम पर हाशिए के छात्रों को मुख्यधारा से
बाहर रखने की प्रक्रिया अंततः हमारे विश्वविद्यालयों की लोकतांत्रिक साख पर
प्रश्नचिह्न लगाती है। यह अध्ययन सिद्ध करता है कि जब तक कैंपस एक समावेशी और
सुरक्षित वातावरण प्रदान नहीं करेंगे, तब तक उच्च शिक्षा केवल एक 'विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग' का क्लब बनी रहेगी और सामाजिक न्याय का
संवैधानिक वादा अधूरा रहेगा।
7.2 भविष्य की
राह: सुधार हेतु रणनीतिक सुझाव
विश्वविद्यालयों को वास्तव में 'लोकतांत्रिक सार्वजनिक क्षेत्र' के रूप में रूपांतरित करने के लिए निम्नलिखित
संरचनात्मक और सांस्कृतिक सुधार अनिवार्य हैं:
1. प्रतिनिधित्व
और सत्ता का विकेंद्रीकरण: संस्थानों के निर्णय लेने वाले सर्वोच्च निकायों (जैसे एग्जीक्यूटिव
काउंसिल और एकेडेमिक काउंसिल) में केवल पद के आधार पर नहीं,
बल्कि सामाजिक पृष्ठभूमि के आधार पर भी
प्रतिनिधित्व सुनिश्चित होना चाहिए। जब तक नीतियों के निर्माण में उन वर्गों की
भागीदारी नहीं होगी जो स्वयं वंचना झेल रहे हैं, तब तक नीतियां केवल कागजी औपचारिकता बनी रहेंगी।
2. विविधता ऑडिट
(Diversity Audit) की अनिवार्यता: प्रत्येक संस्थान के लिए वार्षिक
'विविधता रिपोर्ट'
सार्वजनिक करना अनिवार्य किया जाना चाहिए।
इसमें छात्र नामांकन के साथ-साथ शिक्षकों की नियुक्ति,
शोध अनुदान का आवंटन और प्रशासनिक पदों पर
विभिन्न समुदायों की स्थिति का डेटा होना चाहिए। पारदर्शिता ही जवाबदेही का पहला
कदम है।
3. अंतर्संबंधात्मक
शिकायत निवारण तंत्र: UGC Equity
Regulations 2026 के कार्यान्वयन में
'अंतर्संबंधात्मकता'
(Intersectionality) को आधार
बनाया जाना चाहिए। शिकायतों की जांच के दौरान यह देखा जाना चाहिए कि क्या छात्र को
एक साथ कई आधारों (जैसे लिंग + धर्म) पर निशाना बनाया गया है। इसके लिए समितियों
को समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से प्रशिक्षित करना आवश्यक है।
4. पाठ्यक्रम का
वि-औपनिवेशीकरण (Decolonization): पाठ्यक्रम में पूर्वोत्तर भारत के इतिहास को अल्पसंख्यक विमर्श और लैंगिक अध्ययनों को
हाशिए से उठाकर केंद्र में लाना होगा। शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो छात्रों को केवल 'कुशल श्रमिक'
न बनाए, बल्कि उनमें दूसरे की पहचान के प्रति संवेदनशीलता और सम्मान का भाव विकसित
करे।
5. स्वतंत्र
निगरानी और पीड़ित संरक्षण: परिसरों में भेदभाव की जांच करने वाली समितियां विश्वविद्यालय प्रशासन से
स्वतंत्र होनी चाहिए ताकि कुलपति या प्रबंधन का दबाव न्याय में बाधा न बने। साथ ही,
शिकायत करने वाले छात्रों के लिए एक सुदृढ़ 'पीड़ित संरक्षण कार्यक्रम'
(Victim Protection Program) होना चाहिए
ताकि उनका शैक्षणिक करियर असुरक्षित न हो।
6. मानसिक
स्वास्थ्य और सामाजिक समर्थन: भेदभाव के शिकार छात्रों के लिए केवल कानूनी कार्यवाही पर्याप्त नहीं है।
संस्थानों में ऐसे काउंसलर्स की नियुक्ति होनी चाहिए जो छात्रों की
सामाजिक-सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को समझते हों और उन्हें उस 'संस्थागत अकेलेपन'
से बाहर निकाल सकें जो अक्सर आत्महत्याओं का
कारण बनता है।
अंततः, शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य मनुष्य को बंधनों से मुक्त करना है। यदि
हमारे विश्वविद्यालय ही पूर्वाग्रहों की बेड़ियों में जकड़े रहेंगे, तो वे एक मुक्त समाज का निर्माण कैसे कर
पाएंगे? उच्च शिक्षा में सुधार की यह लड़ाई केवल नीतियों की नहीं, बल्कि एक नई 'संस्थागत नैतिकता'
(Institutional Ethics) के सृजन की है।
Ojha.C.Choudhari.V (2026).Discrimination on the basis of gender, race and religion in higher educational institutions in India: An analytical study. Eastern Scientist. https://www.easternscientist.in/2026/01/blog-post_633.html
संदर्भ (References)
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