भोजपुरी गाँव: बदलती अर्थव्यवस्था, जमी हुई जाति✒️

Public Discourse

Date : 01 February 2026

Author : Achal Pulastey


आज यूजीसी एक्ट-2026 को लेकर बहस का बाजार गर्म है। कथित उच्च जातियाँ विरोध में हैं तो पिछड़ी,दलित आदिम जातियाँ समर्थन में। मीडिया व कथित प्रबुद्ध भी बिना जमीनी हकीकत जाने हवाबाजी कर इधर या उधर खड़े हैं। ऐसे समय जमीनी हकीकत जानना जरूरी हैं। इसके एक भोजपुरी गाँव के देख सकते हैं।

भोजपुरी अंचल के गाँवों को आज ‘तेजी से बदलता ग्रामीण भारत’ कहकर प्रस्तुत किया जाता है। कंक्रीट के मकान, मोटरसाइकिलें, स्मार्टफोन, डीटीएच, ऑनलाइन पेमेंट और शहरों से आने वाली रेमिटेंस को ग्रामीण विकास के प्रमाण के रूप में गिनाया जाता है। नीति-निर्माताओं और मीडिया के लिए यह एक सुखद तस्वीर है—कि गाँव आधुनिक हो रहे हैं। लेकिन यह तस्वीर जितनी चमकदार दिखती है, भीतर से उतनी ही खोखली भी है। आर्थिक बदलाव के इस शोर में एक सच्चाई लगातार दबाई जा रही है—भोजपुरी गाँवों की जातिगत संरचना अब भी लगभग जमी हुई है।

पहली नज़र में लगता है कि पेशे बदले हैं। आज हर जाति का व्यक्ति दुकान चला रहा है, ट्रैक्टर चला रहा है, ठेकेदारी कर रहा है या शहरों में काम कर रहा है। लेकिन यदि सवाल किया जाए कि भूमि किसके पास है, निर्णय कौन लेता है और संकट का बोझ कौन उठाता है, तो जवाब अब भी जाति के खांचे में फिट बैठता है। भूमि का स्वामित्व आज भी सवर्ण और प्रभुत्वशाली पिछड़ी जातियों के पास केंद्रित है। दलित और आदिवासी समुदाय—राजभर, गोंड, खरवार, नोनिया-चौहान—अब भी बटाई, दिहाड़ी और प्रवासन पर निर्भर हैं। यह महज़ ऐतिहासिक अवशेष नहीं, बल्कि आज की ग्रामीण राजनीतिक अर्थव्यवस्था का सच है।
भोजपुरी गाँवों की जीवनरेखा श्रम प्रवासन बन चुकी है। मुंबई, पुणे, सूरत, गोवा, बंगलूरु और खाड़ी देशों से आने वाला पैसा ही स्थानीय बाज़ार को चलाता है। इसी से दुकानों में सामान बिकता है, शादियाँ होती हैं और घर बनते हैं। लेकिन यह व्यवस्था आत्मनिर्भरता नहीं, बल्कि एक अस्थिर निर्भरता पैदा करती है। कोविड-19 के लॉकडाउन ने यह सच्चाई बेरहमी से उजागर की—जैसे ही शहर बंद हुए, गाँव की अर्थव्यवस्था भी चरमरा गई। इस संकट की सबसे गहरी चोट हमेशा वंचित जातियों पर ही पड़ी, क्योंकि उनके पास न ज़मीन थी, न बचत और न सामाजिक सुरक्षा।
शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन का सबसे बड़ा औज़ार माना जाता है, लेकिन भोजपुरी गाँवों में यह औज़ार कुंद साबित हो रहा है। प्राथमिक शिक्षा तक पहुँच बढ़ी है, पर उच्च शिक्षा अब भी अपवाद है। स्नातक या उससे ऊपर की पढ़ाई करने वालों की संख्या नगण्य है। लड़कियों की शिक्षा को आज भी ‘अच्छे विवाह’ की तैयारी माना जाता है, न कि आत्मनिर्भरता का रास्ता। जाति और पितृसत्ता का गठजोड़ यहाँ साफ़ दिखता है—ऊँची जातियों की महिलाएँ खेतों में काम नहीं करतीं, जबकि छोटी जातियों की स्त्रियाँ पुरुषों के बराबर श्रम करती हैं, फिर भी सामाजिक सम्मान उन्हें नहीं मिलता। श्रम करने वाली स्त्री आज भी ‘कमतर’ मानी जाती है।
उपभोग संस्कृति ने गाँवों में गहरी पैठ बना ली है। मोबाइल, बाइक और टीवी अब शौक नहीं, सामाजिक ज़रूरत बन चुके हैं। शादियाँ और त्योहार गाँव की अर्थव्यवस्था को कुछ दिनों के लिए गति देते हैं, लेकिन इसके पीछे कर्ज़ की लंबी छाया होती है। साहूकारी आज भी ज़िंदा है—बस उसने माइक्रोफाइनेंस और निजी ऋण कंपनियों का रूप ले लिया है। थोड़ी-सी नकदी आते ही कई गरीब परिवार अपनी ज़मीन बेचने को मजबूर हो जाते हैं। यह विकास नहीं, बल्कि धीमी बेदखली है।
निजीकरण और मशीनीकरण ने ग्रामीण रोज़गार को और असुरक्षित किया है। ट्रैक्टर, हार्वेस्टर और ठेका-प्रणाली ने परंपरागत श्रम की ज़रूरत घटाई है। नतीजा यह है कि गाँव के युवाओं के सामने या तो पलायन है या बेरोज़गारी। इस कुंठा का रास्ता अक्सर नशे, अपराध और राजनीतिक भीड़ में खप जाने तक जाता है। नीति की विडंबना देखिए—महुआ जैसी परंपरागत शराब, जो आदिवासी समुदायों की आजीविका से जुड़ी रही है, उसे अवैध ठहराया जाता है, जबकि कॉरपोरेट शराब को राजस्व के नाम पर वैध और प्रोत्साहित किया जाता है। यह स्वास्थ्य की नहींवर्गीय और जातिगत प्राथमिकताओं की नीति है।
सबसे खतरनाक भ्रम यह है कि आर्थिक समृद्धि अपने-आप सामाजिक बराबरी ले आएगी। वास्तविकता यह है कि जैसे-जैसे कुछ छोटी जातियों की आय बढ़ी है, वे सामाजिक स्वीकृति पाने के लिए बड़ी जातियों के रहन-सहन, रीति-रिवाज़ और प्रतीकों की नकल कर रही हैं। यह बराबरी नहीं, बल्कि स्थिति-चिंता (status anxiety) है—जहाँ सम्मान श्रम और अधिकार से नहीं, बल्कि दिखावे से तय होता है। इससे जाति व्यवस्था टूटती नहीं, बल्कि नए रूप में मज़बूत होती है।
यदि भोजपुरी क्षेत्र की तुलना नॉर्थ-ईस्ट भारत के ग्रामीण समाज से की जाए, तो फर्क स्पष्ट हो जाता है। वहाँ श्रम को जातिगत अपमान से नहीं जोड़ा जाता, महिलाओं की भागीदारी अधिक है और भूमि संबंध अपेक्षाकृत समतामूलक हैं। इससे यह साफ़ होता है कि समस्या विकास की कमी नहीं, बल्कि सामाजिक संरचना की जकड़न है।
निष्कर्ष सीधा और असुविधाजनक है—भोजपुरी गाँवों में सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन हुआ है, लेकिन वह न तो समानतावादी है, न ही न्यायपूर्ण। आज का विकास मॉडल बहुसंख्यक ग्रामीण समाज को श्रम, कर्ज़ और प्रतीक्षा की स्थिति में छोड़ देता है, जबकि सम्मान, भूमि और निर्णय-सत्ता सीमित वर्ग के पास सुरक्षित रहती है। जब तक भूमि सुधार, श्रम की गरिमा और सामाजिक बराबरी को एक साथ नहीं देखा जाएगा, तब तक गाँव बदलते रहेंगे—लेकिन सिर्फ़ ऊपर से।

(-लेखक कथाकार,स्वतंत्र विचारक,लोक जीवन के अध्येता है)

 


Public Discourse Archive
Related Articles

Post a Comment

0 Comments