Current Affairs
Date : 02 February 2026
Author : सरोज कुमार पाण्डेय
वरिष्ठ कवि, कोषाध्यक्ष नागरी प्रचारिणी सभा देवरिया
गुरु रविदास को केवल भक्ति-कवि कहना उनके व्यक्तित्व और काव्य के साथ अन्याय है। वे क्रांति-धर्मी कवि थे, क्योंकि उनकी कविता ईश्वर तक पहुँचने की सीढ़ी नहीं, बल्कि समाज की अन्यायपूर्ण संरचना पर सीधा प्रहार है। उनकी वाणी में विनय कम और प्रतिरोध अधिक है; आत्मसमर्पण नहीं, असहमति है।
रविदास की कविता उस दौर में जन्म लेती है जब धर्म सत्ता के संरक्षण में जाति को स्थायी और पवित्र घोषित कर चुका था। ऐसे समय में जन्म के आधार पर ऊँच-नीच को नकारना मात्र आध्यात्मिक कथन नहीं, बल्कि सामाजिक विद्रोह था। जब वे कहते हैं कि मनुष्य नीच या श्रेष्ठ कर्म से होता है, जन्म से नहीं, तब वे पूरे वर्णधर्म के वैचारिक आधार को ध्वस्त करते हैं। यही क्रांति का पहला संकेत है।
उनकी भक्ति मंदिर और मूर्ति के इर्द-गिर्द नहीं घूमती। वे जड़ पूजा पर व्यंग्य करते हैं और श्रम, मन और मनुष्यता को धर्म का केंद्र बनाते हैं। यह धर्म का लोकतंत्रीकरण है। जब धर्म जनता के हाथ में आता है, तो वह सत्ता के विरुद्ध हथियार बन जाता है। इस अर्थ में रविदास की भक्ति एक सांस्कृतिक क्रांति है।
‘बेगमपुरा’ उनकी सबसे बड़ी क्रांतिकारी अवधारणा है। यह कोई अलौकिक स्वर्ग नहीं, बल्कि भय-मुक्त, कर-मुक्त, भेद-मुक्त समाज की कल्पना है। इसमें राजा, ब्राह्मण और शासक वर्ग की अनिवार्यता समाप्त हो जाती है। यह सामंती राज्य की वैधता को नकारने वाला काव्यात्मक घोष है। कविता यहाँ राजनीति का विकल्प बन जाती है।
रविदास की क्रांतिकारिता तलवार में नहीं, भाषा में है। वे सत्ता पर सीधा हमला नहीं करते, लेकिन उसकी नैतिक जमीन छीन लेते हैं। यही कारण है कि वे खतरनाक भी हैं और स्वीकार्य भी—खतरनाक विचारों के लिए, स्वीकार्य भाषा के लिए। उनकी सीमा भी यहीं है कि वे किसी संगठित राजनीतिक कार्यक्रम तक नहीं पहुँचते, पर उनकी ताकत यही है कि वे जनता की चेतना को आंदोलित करते हैं।
आज रविदास को जाति-विशेष या धार्मिक पहचान में सीमित करना उनकी क्रांतिकारी विरासत का अपमान है। वे पहचान नहीं, बराबरी के कवि थे; पूजा के नहीं, प्रतिरोध के कवि थे।
इसलिए गुरु रविदास को संत कहकर शांत कर देना इतिहास की भूल है—वे समाज के खिलाफ खड़े एक क्रांति-धर्मी कवि थे, जिनकी कविता आज भी व्यवस्था से सवाल करती है।
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