Editorial| Eastern Scientist
हरियाणा की औद्योगिक पहचान में पानीपत रिफाइनरी का विशेष स्थान है। यह केवल ऊर्जा उत्पादन का केंद्र नहीं, बल्कि हजारों श्रमिक परिवारों की जीवनरेखा है। आज जब यहां के मजदूर आंदोलनरत हैं, तो यह संघर्ष केवल वेतन या भत्तों का नहीं, बल्कि श्रमिक गरिमा और अधिकारों की रक्षा का प्रश्न बन चुका है।
हाल के श्रम कानून परिवर्तनों के बाद उद्योगों को अधिक “लचीलापन” प्रदान किया गया है। सरकार का तर्क है कि इससे निवेश बढ़ेगा, उद्योग प्रतिस्पर्धी बनेंगे और रोजगार सृजन होगा। परंतु जमीनी सच्चाई यह है कि इस लचीलेपन का भार श्रमिकों के कंधों पर डाला जा रहा है।सबसे गंभीर चिंता कार्य-घंटों को लेकर है। 8 घंटे का कार्य-दिवस कोई दया या सुविधा नहीं, बल्कि लंबे ऐतिहासिक संघर्षों की उपलब्धि है। यदि कार्य-समय को व्यवहारिक रूप से 8 से बढ़ाकर 12 घंटे तक ले जाया जाता है, या ओवरटाइम को अनिवार्य संस्कृति बना दिया जाता है, तो यह श्रमिक अधिकारों के क्षरण का संकेत है। यह न केवल शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर आघात है, बल्कि परिवार और सामाजिक जीवन पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालता है।दूसरा बड़ा प्रश्न है—बिना अग्रिम सूचना या पर्याप्त कारण के नौकरी से निकाल देना। रोजगार की अस्थिरता श्रमिक को भय और असुरक्षा में जीने को मजबूर करती है। यदि किसी कर्मचारी को अचानक सेवा से मुक्त कर दिया जाए, बिना सामाजिक सुरक्षा या उचित मुआवज़े के, तो यह आधुनिक औद्योगिक लोकतंत्र की भावना के विपरीत है। ऐसी व्यवस्था, जहाँ श्रमिक का भविष्य प्रबंधन की एकतरफा शक्ति पर निर्भर हो, हमें अनायास ही दास प्रथा जैसी असमान संरचनाओं की याद दिलाती है। ठेका प्रथा का विस्तार, यूनियनों की कमजोर होती भूमिका, और औद्योगिक विवादों में श्रमिक पक्ष की घटती भागीदारी—ये सभी संकेत हैं कि संतुलन बिगड़ रहा है। विकास का अर्थ यदि केवल उत्पादन और लाभ तक सीमित हो जाए, तो वह अधूरा है। वास्तविक विकास वह है जिसमें श्रमिक को सम्मान, सुरक्षा और भागीदारी मिले।पानीपत रिफाइनरी का आंदोलन एक स्थानीय घटना भर नहीं है; यह देशभर में चल रही उस बहस का प्रतीक है जिसमें विकास और अधिकार आमने-सामने खड़े दिखाए जा रहे हैं। जबकि सच्चाई यह है कि दोनों परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि परस्पर पूरक हो सकते हैं। आवश्यक है कि सरकार, प्रबंधन और श्रमिक संगठनों के बीच गंभीर और पारदर्शी संवाद स्थापित हो। श्रम सुधारों में सामाजिक सुरक्षा की ठोस गारंटी, स्पष्ट कार्य-घंटा सीमा, और नौकरी समाप्ति के लिए न्यायसंगत प्रक्रिया सुनिश्चित की जानी चाहिए।औद्योगिक प्रगति का मार्ग श्रमिकों की कीमत पर नहीं, बल्कि उनके साथ मिलकर तय होना चाहिए। पानीपत की गूंज हमें यही चेतावनी देती है—यदि विकास का चेहरा मानवीय नहीं होगा, तो वह टिकाऊ नहीं होगा,एक बड़े आंदोलन का भी संकेत करता है।
दूसरा बड़ा प्रश्न है—बिना अग्रिम सूचना या पर्याप्त कारण के नौकरी से निकाल देना। रोजगार की अस्थिरता श्रमिक को भय और असुरक्षा में जीने को मजबूर करती है। यदि किसी कर्मचारी को अचानक सेवा से मुक्त कर दिया जाए, बिना सामाजिक सुरक्षा या उचित मुआवज़े के, तो यह आधुनिक औद्योगिक लोकतंत्र की भावना के विपरीत है। ऐसी व्यवस्था, जहाँ श्रमिक का भविष्य प्रबंधन की एकतरफा शक्ति पर निर्भर हो, हमें अनायास ही दास प्रथा जैसी असमान संरचनाओं की याद दिलाती है।
पानीपत रिफाइनरी का आंदोलन एक स्थानीय घटना भर नहीं है; यह देशभर में चल रही उस बहस का प्रतीक है जिसमें विकास और अधिकार आमने-सामने खड़े दिखाए जा रहे हैं। जबकि सच्चाई यह है कि दोनों परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि परस्पर पूरक हो सकते हैं।
औद्योगिक प्रगति का मार्ग श्रमिकों की कीमत पर नहीं, बल्कि उनके साथ मिलकर तय होना चाहिए। पानीपत की गूंज हमें यही चेतावनी देती है—यदि विकास का चेहरा मानवीय नहीं होगा, तो वह टिकाऊ नहीं होगा,एक बड़े आंदोलन का भी संकेत करता है।
0 Comments