यदि पूर्वोत्तर भारत अपना है तो वहाँ के लोग क्यो नहीं ?

Editorial| Eastern Scientist

(राजनीतिक, सामाजिक और मनोवैज्ञानिक विश्लेषण)

दिल्ली के मालवीय नगर में घटी हालिया घटना ने एक बार फिर उस असुविधाजनक सच को सामने ला दिया है, जिसे राष्ट्रवाद के शोर में दबा दिया जाता है। तीन पूर्वोत्तर की युवतियाँ, जिनमें एक University of Delhi की छात्रा भी थीं, सिर्फ इसलिए नस्लीय अपमान का शिकार हुईं क्योंकि उनके चेहरे, उच्चारण और सांस्कृतिक पहचान ‘मुख्यधारा’ की कल्पित छवि से मेल नहीं खाते थे। इस घटना को BBC Hindi सहित कई राष्ट्रीय मंचों ने उठाया गया परन्तु खेदजनक रूप से यह दुर्घटना, मुख्यधारा की भारतीय मीडिया में की खास खबर या बहस की विषय नहीं बनी ।
प्रश्न यह नहीं कि एक पड़ोसी विवाद कैसे बढ़ा। प्रश्न यह है कि एक मामूली घरेलू असहमति नस्लीय गाली में इतनी सहजता से क्यों बदल जाती है?
ऐसी दुर्घटनाओं के लिए उत्तर भारतीय राजनीति,समाज,संस्कृति स्थिति व मनोविज्ञान है। भारत की राजनीति “अखण्ड भारत” का उद्घोष करती है। सीमाएँ, मानचित्र, सैन्य शक्ति, इन सब पर गर्व है। परंतु मानसिक रूप हम खण्ड-खण्ड है। पूर्वोत्तर की सीमाएँ रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं, तो वहाँ के नागरिकों की गरिमा भी राष्ट्रीय सुरक्षा जितनी ही महत्वपूर्ण क्यों नहीं मानी जाती?
राजनीतिक विमर्श में पूर्वोत्तर अक्सर ‘सीमा क्षेत्र’ है—एक भू-रणनीतिक इकाई। लेकिन वही क्षेत्र जब अपने युवाओं को शिक्षा और रोजगार के लिए दिल्ली भेजता है, तो वे यहाँ ‘विदेशी’ की तरह देखे जाते हैं। राष्ट्रवाद यदि नागरिक की अस्मिता की रक्षा न करे, तो वह केवल भाषणों की सजावट है।
इस समस्या को गहराई में देखे तो इसके लिए उत्तर भारत की सामाजिक संरचना  व श्रेष्ठताबोध जिम्मेदार है।
उत्तर भारतीय शहरी समाज के भीतर एक अदृश्य सांस्कृतिक पदानुक्रम है। हिंदीभाषी, एक विशिष्ट शारीरिक आकृति और खान-पान को ‘मानक भारतीय’ मान लिया गया है। जो इस साँचे में फिट नहीं बैठता, वह ‘दूसरा’ है।
पूर्वोत्तर के लोगों को “चाइनीज़”, “चिंक़ी”, “मॉमो” जैसे शब्दों से पुकारना महज असभ्यता नहीं—यह नस्लीय श्रेणीकरण है। यह वही मानसिकता है जो औपनिवेशिक दौर में शारीरिक विशेषताओं के आधार पर मानव समूहों को वर्गीकृत करती थी। विडंबना यह है कि जिस देश ने उपनिवेशवाद का विरोध किया, उसके भीतर आज भी औपनिवेशिक मानसिकता जीवित है।
हर समाज अपने भीतर एक ‘अन्य’ गढ़ता है—एक ऐसा समूह जिसे वह अपने संकटों का कारण ठहरा सके। पूर्वोत्तर के चेहरे, भाषा और जीवनशैली को लेकर बनी धारणाएँ इसी ‘अन्यीकरण’ (othering) की प्रक्रिया हैं।
जब किसी नागरिक से बार-बार पूछा जाए—“आप असल में कहाँ से हैं?”—तो यह प्रश्न भौगोलिक नहीं, अस्तित्वगत होता है। यह संकेत देता है कि वह व्यक्ति इस भूमि का स्वाभाविक हिस्सा नहीं माना जा रहा। धीरे-धीरे यह अनुभव आत्म-सम्मान पर आघात करता है और मनोवैज्ञानिक दूरी पैदा करता है।
इस दृष्टि से दिल्ली की घटना : एक प्रतीक मात्र है। मालवीय नगर की घटना केवल तीन युवतियों का अपमान नहीं। यह उस राष्ट्रीय चरित्र पर कलंक है जो स्वयं को विविधता में एकता,विशाल भारत,नेक भारत,एक भारत जैसे नारे गढ़ता लगाता है। यदि राजधानी—जहाँ संसद, सर्वोच्च न्यायालय और सत्ता का केंद्र है—वहीं देश के विशेष शक्ल सूरत का नागरिक अपनी पहचान के कारण अपमानित हों, तो यह समस्या स्थानीय नहीं, संरचनात्मक है। गहरे देखे तो सामाजिक, सांस्कृतिक एवं मनोवैज्ञानिक है। इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता है, उत्तर भारतीय समाज की सांस्कृतिक मनो संरचना भेद-भाव, ऊँच-नीच से भरी पड़ी है। जो समाज अपने साथ साथ रहने वालों को ही जातीय,धार्मिक,भोजन-कपड़े से नीच-अछूत,अगड़ा-पिछड़ा ऊँच-नीच समझता हो,वह समाज के लिए यह पूर्वोत्तर के विशेष शक्ल वाले लोगो के प्रति ऐसा व्यवहार कोई आश्चर्य की बात नहीं है। इस संबंध में यह तर्क दिया जा सकता है कि आरोपियों की गिरफ्तारी हो गई, कानून ने अपना काम किया। परंतु प्रश्न कानून से बड़ा है। कानून अपराध रोक सकता है, मानसिकता नहीं।
 इसके लिए स्कूलिंग और मीडिया द्वारा समाज सुधार के आंदोलन की जरूरत है। उत्तर भारतीय शहरी समाज को यह समझना होगा कि देश जमीन का नक्शा से नहीं लोगो से बनता है। किसी देश या सभ्यता की महानता  भौगोलिक विस्तार से नही नहीं नागरिकों की गरिमा से सिद्ध होती है। यदि पूर्वोत्तर के लोग अपने ही देश में असुरक्षित और अपमानित महसूस करें, तो अखण्डता, महानता  का दावा एक नारा भर रह जाएगा।
एक भारत” की अवधारणा तब तक अधूरी है, जब तक हर भारतीय को बिना शर्त भारतीय माना न जाए।
बार-बार ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति आत्मालोचना की मांग करती है। उत्तर भारतीय समाज को यह स्वीकार करना होगा कि उसके भीतर नस्लीय,जातीय, धार्मिक पूर्वाग्रह मर्ज की तरह मौजूद हैं। उन्हें पहचानना,निदान और ईलाज देश हित में आवश्यक है।
यदि पूर्वोत्तर भारत का हिस्सा है, तो वहाँ के लोग भी बिना किसी शर्त के इस देश की आत्मा का हिस्सा हैं।
अन्यथा इतिहास यह दर्ज करेगा कि कथित रूप से देश की मुख्यधारा माने जाने वाले उत्तर भारतीय लोगो को देश के नक्शे तो प्रिय ही पर देश के लोग नहीं। दुर्योग से इस समय उत्तर भारत धर्म और जाति में तो उलझा ही हुआ नस्लीय आग्रह भी उसमें जुड़ जायेगा।  

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