गोंड राजा प्रेमशाह की हत्या और गाय की राजनीति : गोंडवाना से आज के भारत (1590 ई. – 2026 ई.)

Public Discourse
Published: May 23, 2026 | Author: अचल पुलस्तेय

The Gond King Premshah’s Assassination and Cow Politics: From Gondwana to Modern India

The assassination of Gond King Premshah (1590–1634 CE), a descendant of the Gondwana rulers Sangram Shah and Rani Durgavati, was not merely a regional political event but also an early example of how religion and the symbolism of the cow were used to legitimize political violence. Jujhar Singh, a Mughal mansabdar, killed Premshah out of personal revenge, territorial ambition, and the desire to seize the royal treasury. However, after the murder, court narratives portrayed the act as a form of “cow protection,” accusing the Gond king of cruelty toward cows. In reality, the killing was an act of betrayal and political conquest disguised as moral justice.
The episode remains relevant in contemporary India, where the cow has increasingly become a political symbol rather than merely a religious or cultural one. In Bengal and eastern India, small cattle rearers, dairy workers, and rural farmers face severe economic hardships due to rising costs, shrinking grazing lands, and restrictions linked to cow politics. Muslim communities, historically associated with cattle trade, dairy, and leather industries, have often faced suspicion, violence, and exclusion despite their longstanding role in the rural economy.
The essay also highlights the distinct cultural traditions of eastern and northeastern India, where indigenous communities historically viewed cattle primarily as part of agriculture, labor, food, and trade rather than as sacred religious symbols. With the expansion of North Indian majoritarian politics, however, “cow politics” has increasingly been imposed upon these regions, creating social and cultural tensions.
Ultimately, the story of Premshah demonstrates how political power repeatedly uses religious symbolism to justify domination and divert attention from real social and economic issues such as poverty, unemployment, agrarian distress, and inequality. From the royal courts of the seventeenth century to modern media and political campaigns, the use of the cow as a moral and political tool reveals a continuing pattern in Indian history and society.

मध्य भारत के गोंडवाना साम्राज्य के महान शासक संग्राम शाह और रानी दुर्गावती के वंशज प्रेमशाह (शासनकाल : 1590 ई. – 1634 ई.) की हत्या का प्रसंग केवल गढ़ामण्डला राज्य के इतिहास की एक घटना नहीं है, बल्कि यह भारतीय सत्ता-राजनीति के उस गहरे चरित्र को उजागर करता है, जहाँ धर्म, गाय और नैतिकता जैसे प्रतीकों का उपयोग राजनीतिक हिंसा को वैध ठहराने के लिए किया जाता रहा है

मुगल सल्तनत के मंसबदार जुझार सिंह ने प्रेमशाह की हत्या व्यक्तिगत प्रतिशोध, राज्य विस्तार और राजकोष पर कब्जे की लालसा में की थी। ऐतिहासिक विवरण बताते हैं कि यह संघर्ष सत्ता, सम्मान और धन के लिए था, लेकिन हत्या के बाद उसे “गौ-रक्षा” का रूप देकर प्रचारित किया गया। दरबारियों से दोहे और आख्यान लिखवाए गये, जिनमें यह कहा गया कि गोंड़ राजा गायों पर अत्याचार करते थे, इसलिए उन्हें दण्डित किया गया। जबकि वास्तविकता यह थी कि प्रेमशाह की हत्या छल और विश्वासघात से की गयी थी। इस प्रकार “गाय” को एक राजनीतिक हत्या के नैतिक औचित्य के रूप में इस्तेमाल किया गया।

यह प्रसंग आज के भारत को समझने में भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। वर्तमान समय में भी “गाय” का प्रश्न केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि वह राजनीतिक ध्रुवीकरण का प्रभावी साधन बन चुका है। बंगाल सहित देश के अनेक हिस्सों में छोटे पशुपालक, चरवाहे और दूध बेचने वाले किसान गंभीर आर्थिक संकट से गुजर रहे हैं। जिन गायों को राजनीतिक मंचों पर “गौमाता” कहकर सम्मान का प्रतीक बनाया जाता है, उन्हीं गायों की देखभाल का पूरा बोझ गरीब किसानों पर छोड़ दिया जाता है। महँगा चारा, घटती चरागाह भूमि और बूढ़े पशुओं की देखभाल ग्रामीण समाज के लिए भारी समस्या बन चुकी है।

ग्रामीण अर्थव्यवस्था में पशुपालन सदियों से आजीविका का आधार रहा है। बंगाल और पूर्वी भारत में विशेष रूप से मुसलमान समुदाय डेयरी, पशु व्यापार और चमड़ा उद्योग से लंबे समय से जुड़ा रहा है। लेकिन जब गाय को राजनीतिक पहचान और धार्मिक श्रेष्ठता के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया गया, तब सबसे अधिक संदेह, हिंसा और आर्थिक नुकसान इन्हीं समुदायों को झेलना पड़ा। कई जगहों पर मुसलमान पशु व्यापारियों को अपराधी की तरह देखा जाने लगा, जबकि वे सदियों से ग्रामीण अर्थव्यवस्था का अभिन्न हिस्सा रहे हैं। पूर्वी भारत और कोशी क्षेत्र की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को देखें तो यह क्षेत्र मूलतः किरात, कोच और अन्य आदिम समुदायों की सभ्यता का क्षेत्र रहा है। यहाँ गाय का संबंध मुख्यतः कृषि, श्रम और व्यापार से रहा, न कि धार्मिक पवित्रता से। कोशी के पूरब—सिक्किम, असम, नागालैण्ड, मिजोरम और पूर्वोत्तर के अन्य क्षेत्रों में—आदिम समुदायों तथा वज्रयानी बौद्ध परम्पराओं में गाय अन्य पशुओं की तरह भोजन और श्रम से जुड़ी रही है। हिन्दू परम्परा के भीतर भी शाक्त परम्पराओं में पशुबलि की मान्यताएँ रही हैं, जहाँ कई क्षेत्रों में देवी को भैंसे की बलि दी जाती रही है। यह उत्तर भारतीय वैदिक-हिन्दू परम्परा से भिन्न सांस्कृतिक दृष्टि को दर्शाता है। इसीलिए आज पंश्चिम बंगाल की उत्तरभारतीय-मराठी हिन्दुत्ववादी सरकार आज दुविधा में फँसी दिखती है। गाय के की राजनीति व्यापक भारतीय परिवेश में असफल होती दिख रही है।

इतिहासकारों का मानना है कि उत्तर भारतीय आर्य परंपरा का सांस्कृतिक प्रभाव पूर्वी और उत्तर-पूर्वी भारत में बाद के समय में पहुँचा। इसलिए इन क्षेत्रों की लोकसंस्कृति में गाय अन्य उपयोगी पशुओं की तरह आर्थिक और सामाजिक जीवन का हिस्सा थी। परंतु आधुनिक राजनीति ने उत्तर भारतीय “गौ-राजनीति” को यहाँ भी स्थापित करने का प्रयास किया, जिसके कारण गाय अब सांस्कृतिक से अधिक राजनीतिक प्रतीक बनती जा रही है। यही कारण है कि इन क्षेत्रों में सांस्कृतिक तनाव और सामाजिक उथल-पुथल भी दिखाई देती है। विडम्बना यह है कि इतिहास में भी और आज भी, गाय के नाम पर राजनीति करने वाले लोग अक्सर उन समुदायों से दूर रहते हैं जो वास्तव में पशुपालन से जुड़े हैं। प्रेमशाह की हत्या के समय “गौ-रक्षा” का आख्यान एक राजनीतिक हत्या को धार्मिक न्याय सिद्ध करने के लिए गढ़ा गया था। आज भी कई बार गाय के नाम पर लोकतांत्रिक भारत को हिन्दू-मुसलमान में बाँटने, चुनावी ध्रुवीकरण करने और गरीबी, बेरोज़गारी, किसान संकट तथा सामाजिक असमानता जैसे वास्तविक मुद्दों से ध्यान हटाने का प्रयास दिखाई देता है। प्रेमशाह के प्रसंग से लेकर आज के बंगाल और पूर्वोत्तर भारत तक एक समानता स्पष्ट दिखाई देती है—गाय को सत्ता और नैतिकता के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, लेकिन उसकी वास्तविक कीमत गरीब किसान, आदिवासी, दलित और मुसलमान समुदाय चुकाते हैं। इतिहास में दरबारियों द्वारा लिखे गये दोहे जिस प्रकार राजनीतिक झूठ को “धर्म” का रूप देने का प्रयास करते थे, आज वही कार्य मीडिया, सोशल मीडिया और संगठित प्रचार तंत्र के माध्यम से होता दिखाई देता है।

इस दृष्टि से प्रेमशाह की हत्या केवल अतीत की घटना नहीं है। यह भारतीय राजनीति में धर्म, सत्ता और प्रचार के गठजोड़ को समझने का एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक दर्पण है, जो हमें यह सोचने के लिए विवश करता है कि क्या आज भी “गाय” का प्रश्न वास्तव में पशु और किसान से जुड़ा है, या फिर वह सत्ता की राजनीति का एक प्रभावी औजार बन चुका है।

संदर्भ / References

  • पुलस्तेय, अचल। महान गणराज्य गढ़डला. नम्या प्रेस, दिल्ली, 2023. ISBN: 978-93-55455-87-5
  • अग्रवाल, रामभरोश। गोंड जाति का सामाजिक अध्ययन, पृ. 604.
  • अग्रवाल, रामभरोश। गोंड जाति का सामाजिक एवं राजनैतिक अध्ययन, पृ. 607.
  • Hiralal, Rai Bahadur B.A. The Inscriptions of the Central Provinces & Berar, 2nd Edition, 1932.
  • Hislop, Rev. Stephen. Papers Relating to the Aboriginal Tribes of the Central Provinces, edited by Sir Richard Temple, 1866.
  • Risley, H. H. The Tribes and Castes of Bengal: Anthropometric Data. Calcutta: Bengal Secretariat Press, 1891.

About the Author

डॉ. अचल पुलस्तेय एक बहुविषयक विद्वान, लेखक, चिंतक और लोक अध्येता हैं। उनका लेखन सामाजिक यथार्थ, सांस्कृतिक परिवर्तन और मानवीय चेतना के गहन विश्लेषण के लिए जाना जाता है।

  • Journal Home
  • Article Views :

    How to Cite this Article :


    Related Articles

    Post a Comment

    0 Comments