Culture
Date : 25 January 2026
Author :अचल पुलस्तेय
Culture reflects the collective memory, traditions and creative expressions of society. It includes literature, art, folklore, knowledge systems and everyday practices that shape human identity and social values. संस्कृति समाज की सामूहिक स्मृति, परम्पराओं और सृजनात्मक अभिव्यक्तियों का प्रतिबिम्ब होती है। इसमें साहित्य, कला, लोक परम्पराएँ, ज्ञान प्रणालियाँ तथा दैनिक जीवन की वे सभी प्रथाएँ शामिल होती हैं, जो मानव की पहचान और सामाजिक मूल्यों को आकार देती हैं।
पूर्वी उत्तर प्रदेश में शीतला नवरात्रि, पश्चिमी बिहार में चैती छठ, और झारखण्ड में सरहुल—यह केवल पर्वों का भौगोलिक परिवर्तन नहीं, बल्कि संस्कृति की जीवित, सांस लेती विविधता का प्रमाण है। कुछ ही किलोमीटर की दूरी पर बदलते ये उत्सव इस सत्य को उद्घाटित करते हैं कि भारत की सांस्कृतिक पहचान किसी एकरेखीय, एकरूप या केंद्रीकृत ढाँचे में समाहित नहीं की जा सकती। लंबे समय से “भारतीय संस्कृति” या “हिन्दू संस्कृति” जैसे व्यापक और समेकित शब्दों का प्रयोग एक ऐसी छतरी के रूप में किया जाता रहा है, जिसके नीचे असंख्य स्थानीय परंपराएँ, भाषाएँ और लोक-जीवन की विशिष्टताएँ धुंधली कर दी जाती हैं। यह विमर्श अक्सर अनजाने में—और कई बार जानबूझकर—क्षेत्रीय संस्कृतियों की स्वायत्तता और उनके ऐतिहासिक महत्व को कमतर करता है। प्रश्न यह नहीं है कि एक साझा सांस्कृतिक बोध नहीं है, बल्कि यह है कि क्या उस बोध के नाम पर विविधताओं को हाशिए पर धकेलना उचित है?
दरअसल, भारतीय उपमहाद्वीप की वास्तविक शक्ति उसकी बहुलता में निहित है। भोजपुरी, मैथिली, मगही, और झारखण्डी भाषाओं में गाए जाने वाले लोकगीत केवल मनोरंजन के साधन नहीं, बल्कि वे इतिहास, स्मृति और सामूहिक चेतना के वाहक हैं। ये गीत खेत-खलिहानों से लेकर पर्व-त्योहारों तक जीवन के हर आयाम को स्वर देते हैं। इनकी अपनी लय, अपनी भाषा और अपना दर्शन है—जो किसी एक “राष्ट्रीय” या “धार्मिक” फ्रेम में पूरी तरह समाहित नहीं हो सकता। हालाँकि, बीते दशकों में औपचारिक विमर्शों—चाहे वे अकादमिक हों या राजनीतिक—ने इन लोक परंपराओं को अपेक्षित स्थान नहीं दिया। परिणामस्वरूप, अनेक सांस्कृतिक रूप विलुप्ति के कगार पर पहुँच गए। किंतु अब परिदृश्य बदल रहा है। व्यापक सूचना तंत्र और सोशल मीडिया के विस्तार ने सांस्कृतिक अभिव्यक्ति को एक नया मंच प्रदान किया है। जो आवाजें पहले सीमित भौगोलिक दायरों में कैद थीं, वे अब वैश्विक स्तर पर सुनी जा रही हैं। इसी संदर्भ में, हाल के वर्षों में “हिन्दू नववर्ष” या “भारतीय नववर्ष” के नाम पर एक एकरूप सांस्कृतिक तिथि गढ़ने की प्रवृत्ति भी सामने आई है। इसी क्रम में शास्त्र के पैरोकारों द्वारा शीतला नवरात्रि को दुर्गा पूजा से जोड़ा जा रहा है,जबकि सच यह है जहाँ दुर्गा पूजा शारदीय नवरात्रि की बंगाली परम्परा है, अन्य क्षेत्रों शास्त्र व बाजार के पैरोकारों द्वार प्रसारित की गयी।महज तीस चालीस साल पहले नवरात्रियों में कुलदेवियों या लोकदेवियों के उपासना का पर्व था यह। इसे एक व्यापक सांस्कृतिक प्रतीक के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया जा रहा है, मानो पूरे देश की परंपराएँ एक ही समय-सारिणी और एक ही मानक से संचालित होती हों। यह प्रवृत्ति कई मायनों में प्राचीन लोक संस्कृतियों और उनके विविध नववर्ष-परंपराओं—जैसे अलग-अलग क्षेत्रों में मनाए जाने वाले चैत्र, बैसाख या अन्य स्थानीय नव आरंभ—को हाशिए पर डालने का जोखिम पैदा करती है। दिलचस्प यह है कि यह “नववर्ष” का विमर्श सोशल मीडिया और डिजिटल अभियानों में तो व्यापक रूप से दिखाई देता है, लेकिन जमीन पर इसकी स्वाभाविक सामाजिक स्वीकृति सीमित ही रहती है। गाँवों, कस्बों और स्थानीय समुदायों में आज भी लोग अपने पारंपरिक कैलेंडर, अपने ऋतुचक्र और अपने लोक-विश्वासों के अनुसार ही जीवन और उत्सव का निर्धारण करते हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि संस्कृति को ऊपर से थोपा नहीं जा सकता; वह जड़ों से ही पनपती है।आज यूट्यूब, फेसबुक और अन्य डिजिटल माध्यमों पर भोजपुरी और मैथिली लोकगीतों की लोकप्रियता, सरहुल जैसे आदिवासी पर्वों की दृश्यता, और चैती छठ जैसे उत्सवों की पुनर्स्थापना इस बात का संकेत है कि संस्कृति अब ऊपर से थोपी जाने वाली संरचना नहीं, बल्कि नीचे से उभरने वाली जीवंत प्रक्रिया बन रही है। यह एक प्रकार का सांस्कृतिक लोकतंत्रीकरण है, जहाँ हर समुदाय अपनी पहचान को पुनः स्थापित कर रहा है। यह पुनर्जागरण केवल सांस्कृतिक नहीं, बल्कि राजनीतिक और सामाजिक भी है। जब कोई समुदाय अपने गीत, अपनी भाषा और अपने पर्वों के माध्यम से स्वयं को अभिव्यक्त करता है, तो वह अपने अस्तित्व और सम्मान की भी घोषणा करता है। ऐसे में “एक संस्कृति” की अवधारणा स्वतः चुनौती के घेरे में आ जाती है।
समय की मांग है कि हम “भारतीय संस्कृति” को एक स्थिर, एकरूप इकाई के रूप में देखने के बजाय उसे एक बहुल, गतिशील और संवादशील प्रक्रिया के रूप में समझें। यह स्वीकार करना होगा कि भारत की पहचान उसकी विविधताओं में है—और इन्हीं विविधताओं के संरक्षण और सम्मान में उसका भविष्य निहित है। अंततः, संस्कृति कोई आरोपित संरचना नहीं, बल्कि वह जीवन का स्वाभाविक विस्तार है। इसे नियंत्रित या सीमित करने के प्रयास जितने भी किए जाएँ, यह अपने नए रास्ते खोज ही लेती है। आज जब उपेक्षित और विलुप्तप्राय संस्कृतियाँ पुनर्जीवित हो रही हैं, तो यह केवल अतीत की वापसी नहीं, बल्कि एक अधिक समावेशी और न्यायपूर्ण सांस्कृतिक भविष्य की ओर संकेत है।Through this section, Eastern Scientist aims to highlight diverse cultural perspectives and encourage interdisciplinary dialogue between science, society and cultural knowledge traditions.इस अनुभाग के माध्यम से, 'ईस्टर्न साइंटिस्ट' का उद्देश्य विविध सांस्कृतिक दृष्टिकोणों को उजागर करना तथा विज्ञान, समाज और सांस्कृतिक ज्ञान परंपराओं के बीच अंतर्विषयक संवाद को प्रोत्साहित करना है।
Dr. R. Achal Pulastey is a multidisciplinary scholar, author, and researcher whose work spans cultural studies, history, literature, and indigenous knowledge systems. His writings explore the intersections of tradition, society, and scientific thought, contributing significantly to contemporary academic and cultural discourse.
डॉ. आर. अचल पुलस्तेय एक बहुआयामी विद्वान, लेखक और शोधकर्ता हैं, जिनका कार्यक्षेत्र संस्कृति, इतिहास, साहित्य और आदिवासी ज्ञान परंपराओं तक विस्तृत है। उनके लेखन में परंपरा, समाज और वैज्ञानिक चिंतन के अंतर्संबंधों का गहन विश्लेषण देखने को मिलता है।
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