शक्ति उपासना: लोक से शास्त्र और बाज़ार तक — पुनर्स्मरण की आवश्यकता (बासंतिक नवरात्रि विशेष)

Public Discourse

Date :20 मार्च 2026

Author : डॉ.दिलीप संत


यह लेख अचल पुलस्तेय के क्षेत्रीय शोध और वासुदेव शरण अग्रवाल के सांस्कृतिक चिंतन के अंतर्संबंधों को समकालीन संदर्भ में पुनर्परिभाषित करता है—जो आज के समाज के लिए एक आवश्यक बौद्धिक हस्तक्षेप है।-संपादक

भारतीय सांस्कृतिक चेतना में शक्ति उपासना केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि मानव सभ्यता के विकास की एक दीर्घ और जटिल यात्रा का जीवंत दस्तावेज है। यह यात्रा आदिम ‘लोक’ से आरंभ होकर ‘शास्त्र’ के दार्शनिक विस्तार और आज के ‘बाज़ार’ के बहुआयामी तंत्र तक पहुँचती है। बासंतिक नवरात्रि के इस अवसर पर यह आवश्यक हो जाता है कि हम इस परंपरा को केवल श्रद्धा की दृष्टि से नहीं, बल्कि बौद्धिक और वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य में भी पुनः समझें। सांस्कृतिक अध्येता वासुदेव शरण अग्रवाल तथा समकालीन शोधकर्ता अचल पुलस्तेय के अध्ययनों से स्पष्ट होता है कि शक्ति उपासना की जड़ें उस आदिम काल में निहित हैं, जब मानव जीवन का मूल केंद्र ‘पोषण’ था। मातृ-स्तन के माध्यम से प्राप्त जीवन-संरक्षण ने ‘माँ’ को प्रथम देवता के रूप में प्रतिष्ठित किया। इसी अनुभव ने प्रारंभिक पूजा को ‘पिण्डियों’ के रूप में अभिव्यक्त किया—जो अस्तित्व, पोषण और प्रकृति की अनुकूलता के प्रतीक थे।

लोक परंपराओं में यह प्रतीकवाद मात्र आस्था नहीं, बल्कि एक प्रकार का सहज ‘अनुभवजन्य विज्ञान’ था। दो पिण्डियों से प्रारंभ होकर संख्या-चेतना का विकास तीन, सात और अंततः ‘नवदुर्गा’ तक पहुँचना इस बात का संकेत है कि मानव मस्तिष्क प्रतीकों के माध्यम से जटिल अवधारणाओं को समझने लगा था। पिण्डियों और मानव शरीर के ‘सप्त-चक्रों’ के बीच स्थापित संबंध यह दर्शाता है कि प्राचीन समाज शरीर, प्रकृति और ऊर्जा के गहरे अंतर्संबंधों से परिचित था। समय के साथ वैदिक और उत्तर-वैदिक काल में इन लोक-आधारित मान्यताओं को शास्त्रीय स्वरूप मिला। निराकार पिण्डियाँ साकार देवियों में रूपांतरित हुईं। अस्त्र-शस्त्र, बहु-भुजाएँ और त्रिनेत्र जैसे प्रतीक वास्तव में मानवीय शक्तियों के समेकन के दार्शनिक बिंब हैं। इस प्रकार ‘लोक’ की सहज अनुभूति ‘शास्त्र’ की संरचित व्याख्या में विकसित हुई। इतिहास का एक महत्वपूर्ण सामाजिक पक्ष यह भी है कि बहुत समय तक बासंतिक नवरात्रि मुख्यतः लोक पर्व के रूप में ही विद्यमान रही। बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध—विशेषतः 1980 के दशक तक—इसे शास्त्रीय प्रतिष्ठा प्राप्त नहीं थी। व्रत और अनुष्ठान को कई बार तांत्रिक प्रवृत्तियों से जोड़ा जाता था, और व्रत रखने वाली महिलाओं को सामाजिक उपेक्षा का सामना भी करना पड़ता था। इसके विपरीत, ग्राम्य परंपराओं में काली, शीतला माता, वामती आदि लोक देवियों की पूजा गीतों, अनुष्ठानों और सामुदायिक सहभागिता के माध्यम से जीवित रही। नवमी पर बलि जैसी परंपराएँ भी इस लोक-संरचना का हिस्सा थीं। आज भी इनका अस्तित्व बना हुआ है, किंतु अब इनके साथ शास्त्रीय मंत्र और बाज़ार की उपस्थिति भी जुड़ चुकी है। परिणामस्वरूप, देवी-पूजा अब ‘आस्था’ के साथ-साथ ‘प्रतिष्ठा’ और ‘प्रदर्शन’ का माध्यम भी बन गई है।

इसी संदर्भ में ‘सात’ की अवधारणा विशेष रूप से उल्लेखनीय है। लोक परंपराओं में पूजित ‘सात बहनें’—जिन्हें अनेक क्षेत्रों में शीतला माता और उनकी सहचर देवियों के रूप में जाना जाता है—दरअसल उस सामूहिक स्मृति की प्रतीक हैं, जहाँ रोग, पोषण और पर्यावरण एक-दूसरे से गहरे जुड़े थे। उत्तर भारत के ग्राम्य अंचलों में इन देवियों की पूजा चेचक, महामारी और मौसमी रोगों से रक्षा के लिए की जाती रही है। यहाँ शीतला माता स्वास्थ्य-संरक्षण की लोक-वैज्ञानिक चेतना का रूप धारण करती हैं। इसी लोकधारा का शास्त्रीय रूप ‘सप्तमातृका’ के रूप में सामने आता है—ब्राह्मी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, इन्द्राणी और चामुंडा। ये सात मातृ शक्तियाँ विभिन्न देवशक्तियों के स्त्री रूप हैं, जो सामूहिक रूप से सृष्टि, संरक्षण और संहार के सिद्धांतों का प्रतिनिधित्व करती हैं। इस प्रकार ‘सात बहनें’ और ‘सप्तमातृका’ लोक और शास्त्र के बीच एक सेतु का कार्य करती हैं—एक ओर अनुभवजन्य यथार्थ, दूसरी ओर दार्शनिक संरचना। वर्तमान समय में शक्ति उपासना का स्वरूप एक नए संक्रमण—बाज़ारीकरण—से गुजर रहा है। बासंतिक नवरात्रि अब केवल साधना का पर्व नहीं, बल्कि एक विस्तृत ‘सांस्कृतिक बाज़ार’ का अंग बन चुकी है। व्रत-भोजन उद्योग, डिजिटल दर्शन, आयोजन-व्यवस्थाएँ और ब्रांडेड आस्था—इन सबने इस परंपरा को आर्थिक गतिविधि में परिवर्तित कर दिया है। यह परिवर्तन पूर्णतः नकारात्मक नहीं है, किंतु इसका एक गंभीर पक्ष यह है कि मूल संदेश—पोषण, प्रकृति और संतुलन—धीरे-धीरे हाशिए पर चला गया है।

आज जब समाज मिलावटी खाद्य पदार्थों, पर्यावरण प्रदूषण और गिरते स्वास्थ्य मानकों की चुनौती से जूझ रहा है, तब शक्ति उपासना का मूल अर्थ और भी अधिक प्रासंगिक हो उठता है। यदि आदिम मानव ने ‘पोषण’ को ही देवी माना था, तो आधुनिक समाज के लिए वास्तविक शक्ति उपासना महिला स्वास्थ्य, मातृ-शिशु पोषण और स्वच्छ पर्यावरण की सुनिश्चितता में निहित है। शक्ति उपासना की इस यात्रा को समझना केवल अतीत की व्याख्या नहीं, बल्कि भविष्य की दिशा निर्धारित करने का माध्यम भी है। हमें बाज़ार के शोर के बीच उस मूल ‘लोक चेतना’ को पुनः सुनना होगा, जिसने जीवन के आधारभूत सत्य को पहचाना था। निष्कर्षतः, ‘पिण्डी’ से ‘मूर्ति’ और ‘मूर्ति’ से ‘बाज़ार’ तक की यह यात्रा मानव बुद्धि, संवेदना और सामाजिक संरचना के विकास की कथा है। किंतु वास्तविक विकास तभी संभव है, जब हम इस परंपरा के मूल—पोषण, संतुलन और आंतरिक ऊर्जा—को पुनः केंद्र में स्थापित करें।

This section of Eastern Scientist seeks to encourage thoughtful engagement with scientific, social and cultural questions of our time.


About the Author

डॉ. दिलीप संत, इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र दिल्ली में पुराविज्ञान के असिस्टेंट प्रोफेसर हैं।


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