Culture
Date : 14 April 2026
Author : Dr. Achal Pulastey
The article presents a profound cultural and historical analysis of Bihu, the quintessential folk festival of Assam, rooted in the evolution of primitive agrarian society. The author posits that while Bihu is celebrated as a modern Assamese identity, its origins lie deep within the agricultural cycles of the Bodo-Dimasa tribes. The festival is intrinsically linked to the cultivation of paddy—the lifeline of Assam—celebrated thrice a year to mark the sowing (Bohag-Rongali), ripening (Kati-Kongali), and harvesting (Magh-Bhogali) phases.
Key Highlights for the Journal:
- Origin: Rooted in Dimasa culture (Bi – to ask, Hu – to give).
- Significance: Transition of seasons and celebration of agrarian labor.
- Comparative Lens: Linkage between Bihu and the fading folk rhythms of the Bhojpuri belt.
- Modern Context: Impact of digitalization and the professionalization of Bihu arts.
बिहु का इतिहास आदिम कृषि संस्कृति का इतिहास है। वैसे तो दुनिया के सारे लोक पर्व कृषि से जुड़े पर्व ही हैं। समय के साथ विविध जिनसे आख्यान जुड़ते गये और आज पूरा बाजार जुड़ गया है।
बिहु की शुरुआत कब से हुई इसके बारे में ठीक-ठीक तो किसी को पता नहीं है। फिर भी अध्येताओं द्वारा जानने के कोशिश में शोध होते रहते हैं।
शहरी इलाकों में इसे बिहु के नाम से जाना जाता है, परन्तु गाँवों में बि-हौ, बिसु, पिसुभी कहते हैं। असल में यह धान बोने, पकने, कटने का उत्सव है। धान ही असम की मुख्य फसल है, जो साल में तीन बार बोयी-काटी जाती है। इसलिए बिहु भी साल में तीन बार 14 अप्रैल को मेष संक्रांति पर बोहाग-रोंगोली बिहु, 14अक्तूबर को तुला संक्रांति पर काटि या कंगाली बिहु, 14 जनवरी को मकर संक्रांति पर माघ या भोगाली बिहु मनाया जाता है।
रोंगोली बिहु से नये साल की शुरुआत होती है, इसलिए यह व्यापक रूप में लोकपर्व के रूप में मनाया जाता है। इस दिन आहू धान का बीज बो कर खेती की शुरुआत की जाती है, शालि धान की रोपाई होती है। एक तरह से देखें तो ग्रीष्म, वर्षा, शरद ऋतुओं का संधिपर्व है बिहु। आदि काल में खेती पूरी तरह से प्रकृति पर निर्भर थी। इसलिए अच्छी वर्षा और उपज की कामना से नाच-गाकर देवताओं को खुश करके धान बोने-काटने की परम्परा से शुरु हुई होगी जो आगे चलकर बिहु पर्व बन गया।
मूलतः यह लोक पर्व दिमासा आदिम लोगों का पर्व है, इस इलाके में कृषि की शुरुआत दिमासा आदिम कबीलों से ही मानी जाती है। बिहु दिमासा भाषा का शब्द है, जिसमें ‘बि’ का मतलब पूछना, ‘हु’ का तात्पर्य देना होता है। कुछ लोग बिशु कहते है, जिसमें ‘बि’ का मतलब पूछना और ‘शु’ माने सुख-समृद्धि होता है।
दिमासा लोग नारियल का लड्डू, घिया (चावल) पीठा, तिलपीठा, मच्छी पितिका, बेनगेना खार (केले बने नमक) तथा जड़ी-बूटियों से बने आसव पेय लेकर खेत में पेड़ों के पास जाते हैं। नाचते गाते माँ ब्राई और पिता शिबराई की पूजा करके बिहु की शुरुआत करते है। ब्राई और शिबराई को हम शक्ति-शिव के रुप में भी देख सकते हैं।
आज संचार माध्यमों के विकास के लिए नई शहरी पीढ़ी अब डीजे पर म्यूजिक बजा कर नाचकर बिहु मनाने लगी है, लेकिन गाँवों में आज भी शुद्धो बिहु मनाया जाता है।
असल में बिहु बोडो-दिमासा लोगों का कृषि पर्व है, जो एग्रीकल्चर के विस्तार के साथ दिमासा कबीले से निकल कर, ब्रह्मपुत्र की पानी की तरह सभी कुल कबीलों, जाति, धरम के तटबंध तोड़ते हुए असमिया सांस्कृतिक प्रतीक बन गया, इसकी शुरुआत को लेकर कई मिथकीय कथायें हैं।
सबसे पुरानी कथा बोडो संस्कृति की है। जिसमें एक खूबसूरत बोडो बेटी बोर्डोइशिला की खूबसूरती पर मोहित एक देवता ब्याह कर उसे स्वर्ग लेकर चला गया। बोर्डोइशिला अपने माँ से मिलने के लिए धरती पर आना चाहती थी, पर उसका देवता पति एक क्षण के लिए भी छोड़ने को राजी नहीं था। फिर धरती पर बसंत आया, जंगलों में रंग-बिरंगी फूल खिले, धरती का सौन्दर्य बोर्डोइशिला को खींच लाया। अपनी माँ से मिलने की जिद् में आँधी-तूफान बन, स्वर्ग से इसी दिन धरती पर उतर आयी। लोगों को पता नहीं था, इसलिए आँधी-तूफान से काफी नुकसान हुआ, जिसे देख कर वह भी रोने लगी। फिर उसे खुश करने के लिए कबीले के लोग नाच गाकर पकवान खिलाया। तभी से ऐसा माना जाता है कि हर साल बोर्डोइशिला इस दिन धरती पर उतरती है। जिसके स्वागत में बिहु मनाया जाता है।
एक अन्य मिथक में रूप नामक युवक और जानकला नामक युवती की प्रेम कहानी से बिहु की शुरुआत हुई। रूप के गीत-संगीत पर जानकला ने ऐसा नृत्य किया कि सम्मोहित मेघ देव बरसने लगे। फसल अच्छी हुई। इसी परम्परा में नाच-गाकर यह त्यौहार मनाया जाने लगा।
एक अन्य मिथक में लखिंदा-कोचोपटी नामक दो मित्रों की वजह से बिहू की शुरुआत हुई। लखिंदा-कोचोपटी आवारा-नीच समझे जाते थे। अपमान से तंग आकर दोनों ने मेहनत कर गर्मी में भी धान की फसल उगाया, फिर चमत्कृत समाज उन्हें सम्मान देने लगा। इस तरह बिहु को लेकर विविध कबीलों की अपनी-अपनी कथायें हैं।
आगे चलकर कोच राजाओं के समय जब उत्तर भारतीय संस्कृति का प्रभाव बढ़ा तो ब्रह्म, विष्णु, शिव, नारद, विश्वकर्मा, कृष्ण आदि भी बिहु से जुड़ गये। जिसके अनुसार कलयुग आने पर देवता इसी दिन धरती छोड़कर स्वर्ग चले गये, पर अपना साज-बाज यही छोड़ गये। उसी की याद में उनके वाद्ययंत्रों का उत्सव मनाया जाता है। इस तरह धरती, नदी, पहाड़, पेड़, पशु, देवता, स्वर्ग आदि बिहु के मिथकों, गीतों में समाते चले गये।
इन सारे मिथकों-कथाओं के मूल में प्रकृति से जुड़ा पर्व हैं। प्रेम संगीत का उत्सव है, जिसकी झलक इस बिहु गीत में मिलती है:
“प्रथमे ईश्वरे सृष्टि सरजिले, तार पासत सरजिले जीव
तेनेजन ईश्वरे पीरिति करिले, आमि बा नकरिम किय....”
ईश्वर ने पहले सृष्टि बनाया, फिर जीव बनाया, उसे प्रेम किया, फिर हम क्यों न प्रेम करे...।
अब तो आप समझ ही गये होगें कि प्रकृति पूजा और प्रेम का पर्व है बिहु। इसीलिए युवाओं का त्यौहार भी कहा जाता है, क्योंकि उन्मुक्त होकर नाचने-गाने का अवसर होता है यह। पहले बंगाल और पश्चिम से आये लोग इसे आदिम लोगों का अश्लील पर्व मानते थे, क्योंकि कभी-कभी गीतों और देह की भाव भंगिमायें सौन्दर्य-प्रेम के शिखर पर पहुँच जाती हैं। इसलिए वे उन्मुक्त असभ्यता मानते थे। अपनी बेटियों-स्त्रियों को बिहु से दूर रखते थे। लेकिन जब पाल राजाओं ने राजकीय तौर बिहु मनाना शुरु किया, तो वे लोग भी इस उत्सव में शामिल हो गये।
संत शंकरदेव के वैष्णव आंदोलन ने इसे राधा-कृष्ण के रास से जोड़ दिया। वैष्णव लोग बिहु की शुरुआत नामघर से करते है। बिहु का असल विस्तार कोच-अहोम काल में हुआ, जब अहोम राजदरबार में बिहु का प्रवेश हो गया। जब अफगानों- मुगलों का समय आया तो उनके दरबारों में भी बिहु प्रवेश कर गया। अंग्रेजी राज, आजादी की लड़ाई, गाँधी, नेहरु सभी के लिए बिहु लोक जागरण का माध्यम बना। प्रेम के गीत संघर्ष के गीतों में बदल गये। सभी युगों में जनता अपने दुख-सुख, बाढ़, सूखा, संघर्ष, प्रेम-विछोह को बिहु गीतों के माध्यम से अभिव्यक्त करती रही है।
डिजिटल युग ने बिहु नृत्य-गीत-संस्कृति का स्वरूप ही बदल दिया है। आज लोग हैपी बिहु बोलने लगे हैं, पर अब बिहु विश्व पटल पर देखा-सुना जा रहा है। होटल, क्लब, कार्पोरेट्स द्वारा लक्जरी आयोजन होने लगे हैं। बिहुरानी (क्वीन), बिहु कुँवोरी (बिहु ब्यूटी) जैसे अवार्ड दिये जाने लगे हैं। बिहु कोरियोग्राफी, डांस, म्यूजिक को लोग पेशे के रुप में अपनाने लगे हैं, बिहु स्कूल भी खुल चुके हैं। यू-ट्यूब, इंस्टाग्राम जैसे सोशल मीडिया की वजह से बहुत लोगों का रोजगार-व्यवसाय बन गया है बिहु। जुबीन गर्ग, मानस रॉबिन, कृष्णामोनी चुटिया, मौसम गोगोई, भीताली दास, खगेन गोगोई, बिपुल चुटिया, फुकोन बिहु के लोकप्रिय कलाकार हैं, जो बिहु से दुनिया में शोहरत और समृद्धि पाये हैं।
आइये अब हर साल गुवाहाटी के लोटासिल प्लेग्राउण्ड में आयोजित बिहु समारोह को देखते हैं। फूलों-गुब्बारों से सजे द्वार से हम मेले में प्रवेश कर गये। जहाँ चाट, आइसक्रीम, गुब्बारों, खिलौनों, पान की दुकानों पर मेलहे लगे थे। कुछ युवक-युवतियाँ निःशुल्क पानी पिला रहे थे। बच्चे, युवक-युवतियों, स्त्री-पुरुषों से भरा था प्लेग्राउण्ड। हँसते-बोलते लोग इधर-उधर आ जा रहे थे, सेल्फी लेने की होड़ लगी थी। अद्भुत सम्मोहक छवियाँ सामने से गुजर रहीं थी। भीड़ से गुजरते हुए हम लोटासिल ग्राउण्ड के मध्य एक बड़े वाटर-फायर प्रूफ टेंट हाल में पहुँचे, जहाँ हजारों कुर्सियों पर रंग-बिरंगी पारंपरिक पोशाक में स्त्रियाँ-युवतियाँ, युवक, पुरुष बैठे थे, अद्भुत दृश्य था।
मनमोहक क्षणों को मोबाइल में कैद करते स्त्री-पुरुष, इलेक्ट्रॉनिक लाइटिंग, साउण्ड सिस्टम, असमिया गमोछे जैसा बैक ग्राउण्ड पर्दा, जिसके दोनो किनारों पर सुपारी-केले के पेड़ों की पेंटिग। पर्दे से टंगी जापी, कापो फूलांग (आर्किड फूल माला) अशोक, आम की पत्तियों के वंदनवार से सजा था बिहु फ्लोर।
पर्दे से सटे बैठे क्लासिकल, मार्डन वाद्ययंत्रों के साथ कलाकार। दायें कोने में फूलों से सजा डायस, जिस पर बालों में आर्किड फूल लगाये, रेशमी मेखला-चद्दर में एक गोरी, छरहरी युवती मधुर स्वर में जनसमूह को बिहु की शुभकामनायें देती, कार्यक्रम के शुरुआत की घोषणा करती है। फिर ढ़ोल, पेपा (भैंस के सिंग की बाँसुरी), गोगोना (बाँस से बना माउथ आर्गन), टोका (बाँस की डण्डी), बन्ही (बाँसुरी), हुटुली (मिट्टी से बना वाद्य) क्लासिक असमिया वाद्ययंत्र बजने लगते हैं, जिसकी लय पर नाचते हुए, रंगीन धोती, कुर्ते में, सिर पर गमोछा बाँधे युवक फ्लोर पर प्रगट होते हैं। उसके पीछे मुगा रेशम की मेखला चाद्दर में, बालों में कपौ फुल (ऑर्किड), कलाइयों पर गमखारू-मुथी खारू (एक प्रकार की चूड़ियाँ) कमर पर हासोती (छोटा गमोछा) बाँधे, दोनो हाथों को गर्दन पर लगाये, झुकी नृत्यमुद्रा में कटि को आगे-पीछे स्पंदित करती, मुस्कुराती किशोरियाँ प्रगट हुई, हाल तालियों से गूँज उठा। एंकरिंग करती युवती के होठ कंपित हुए और गीत के बोल फूट पड़े-
हाओइइइइइइ/ किनु चोइत मोहिया
बोहथ जाकी मारिले ओय / गोसे हड्डी सोले ओय पैट
किनु असोमियार बोहाग बिहु अहिले /उकियाई लोगले माट....
(हाओइइइइइ चैत्र महीने में इधर-उधर हवायें चल रही हैं, पेड़ अपने पत्ते बदल रहे हैं, हम असमिया लोगों की खुशी के लिए बिहु आया है, हमें बुला रहा है।)
कुछ देर में संगीत-गीत नृत्य शिखर पर पहुँचता है, हाल में बैठे-खड़े सभी के सिर पर बिहु सवार हो जाता है, जो जहाँ जैसे है, वहीं उसी मुद्रा में नाचने लगता है। इस क्रम में आठ-दस साल के बच्चों, युवक-युवतियों की प्रस्तुतियाँ दर्शकों को घंटो झूमने पर विवश कर रहीं थी।
बिहु का यह दृश्य देख कर हम सोच सकते है कि आखिर भोजपुरी संस्कृति में भी तो सारे पर्व-त्यौहार कृषि और मौसम से जुड़े आदिम लोगों के है। अक्षय तृतीया को धरती की पूजा कर धान का बीज बोते हैं, अषाढ़ में रोपते हैं, कजरी गीतों की लय पर सावन बरसता हैं। भादो में मक्के की बालियाँ निकलती हैं, काली रात में धरती का अँधेरा मिटाने आ जाते है काले कृष्ण। धान की बालियाँ निकल आती है। क्वार की नवरात्रि से मौसम बदलता है, धान पकता है, कटता है नवरात्रि में देवी के रुप आ जाती धरती, देवी गीतो से गूँज उठता है गाँव। धान से ही तो धन शब्द बना है, जो बाजार में बिकता है तो दीवाली मन जाती है किसानों के घर। पिड़िया के गीतों की धुन पर गेहूँ उगने लगता है। कँप कँपाती ठंड से मुक्ति की आश में बन जाती है खिचड़ी। बसंत पंचमी को फूलने लगती है मटर, सरसों, चना, तीसी। शिवरात्रि को प्रकृति-पुरुष मिल जाते है, जिसका मेला आज भी याद है मुझे। पककर सुनहरी हो जाती हैं जब गेंहू की बालियाँ तो फिर मादक फगुआ गीतों से गूँज उठते हैं गाँव। वासंतिक नवरात्रि पर लोक देवी स्थानों पर भीड़ लग जाती है। जब नये गेंहूँ के आटे से कराही चढ़ती है, घर-घर में, गाँव के सीवान पर, देवघड़ पर पुड़िया महक उठती है।
दुनिया से सारे पर्व हमारे आदिम पुरखों ने प्रकृति के साथ जीने के लिए पहचाने और निश्चित किये हैं। पर कालक्रम में सांस्कृतिक, राजनैतिक संघर्षो और वर्चस्व की कथाओं के मिथक गढ़ लिए गये, अन्यथा बिहु प्रकृति के साथ होने का पर्व है, तो दिवाली होली, चपचार कूट (मिजो पर्व) ओणम, चैती, लोहड़ी भी प्रकृति के साहचर्य का पर्व है। यही तो है विविधता में एकता का सूत्र इस देश का। जिसकी अनुभूति के लिए व्यापक दृष्टि की जरूरत है।
बिहू को देखकर मुझे अपनी भोजपुरिया संस्कृत के विकृत होते रूप पर ग्लानि होने लगती है। हम उत्तर भारतीय वर्चस्ववादी कथाओं का बोझ लाद कर अपने पर्वो के नैसर्गिक स्वरूप को नष्ट कर दिये है। आज आधुनिक-विकसित बनने की अंधी दौड़ में पर्वों के लय, आनन्द को बाजार के हवाले कर चुके हैं। आदिम पुरखों की विरासत फगुआ-चैता, कजरी कुछ नहीं गूँजती है अब गाँवों में। धन्य है असम, मिजोरम के प्रकृति पूत जो अपने पुरखों के आदिम पर्वों को आज भी जी रहे हैं, किसी पर्व को युद्ध पर्व में बदलने से बचा लिया है, शास्त्रकारों की कुदृष्टि नहीं पड़ सकी बिहु, चपचार कूट पर अन्यथा यहाँ भी कोई होलिका जल रही होती, कोई रावन-महिषासुर मारा - जलाया जाता होता जरूरी नहीं कि कथानकों के पात्र अत्याचारी ही रहे हों, वैचारिक-सांस्कृतिक प्रतिरोधी हो सकते हैं ?
डॉ. आर. अचल पुलस्तेय एक बहुआयामी विद्वान, लेखक और शोधकर्ता हैं, जिनका कार्यक्षेत्र संस्कृति, इतिहास, साहित्य और आदिवासी ज्ञान परंपराओं तक विस्तृत है। उनके लेखन में परंपरा, समाज और वैज्ञानिक चिंतन के अंतर्संबंधों का गहन विश्लेषण देखने को मिलता है।
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