Editorial
Date: 31 March 2026
Growth Without Dignity: The Crisis of Labor in the World’s Fourth-Largest Economy
This editorial critically examines the contradiction between India’s rising status as the world’s fourth-largest economy and the declining value of labor and talent within the country. While the government celebrates rapid economic growth, visible through highways, infrastructure, and grand institutions, the reality for a large section of the population tells a different story. Basic necessities such as education, healthcare, and food are becoming increasingly inaccessible to ordinary citizens, reflecting a deepening crisis of inequality and declining living standards.
In regions like Noida and other developed cities of North India, workers labor for long hours yet earn meager monthly wages of ₹11,000–12,000. Similar conditions persist across sectors—contractual workers in public institutions, delivery personnel, retail employees, and even skilled professionals like teachers, engineers, and degree holders struggle with low incomes despite significant educational investments. This reflects not just an economic issue, but a systemic devaluation of knowledge and labor.
The editorial also highlights the displacement of small traders due to malls, online commerce, and urban beautification projects, as well as the precarious state of journalism and academic employment. In contrast, the same workers receive significantly better wages in South Indian cities, exposing regional disparities in labor valuation. It raises critical questions: Who truly benefits from this economic growth? Why are those contributing to the economy’s expansion excluded from its rewards? The suppression of labor protests by labeling them as conspiracies further reflects a troubling tendency to criminalize dissent. Ultimately, the piece argues that true economic development must be measured not by infrastructure alone, but by the dignity, security, and well-being of workers. Without fair wages, respect for labor, and equitable access to resources, India risks becoming a “rich country of poor people,” where growth remains concentrated and exclusionary.
“अमृत काल”—यह शब्द आज के भारत की राजनीतिक और विकासात्मक भाषा का सबसे चमकीला प्रतीक बन चुका है। पर इस चमक के नीचे एक सघन अँधेरा है, जो आँकड़ों से नहीं, बल्कि पसीने से भीगी ज़ििन्दगियों से दिखाई देता है।ऐसी स्थिति तब है, जब सरकार विश्व की चौथी इकोनामी और विकास नगाड़ा बजाती है।
पर आश्चर्यजनक ही नहीं चिंताजनक भी है कि विश्व की चौथी अर्थव्यवस्था में प्रतिभा और श्रम मूल्यहीन होता जा रहा है। आखिर चमकते विकास और विश्व की चौथी अर्थव्यवस्था लाभ किसके हिस्से में जा रहा है? चमकते हाइवे, चौड़ी सड़कें, भव्य भवन, संसद, मंदिर—इन सबको देखकर भारत एक विकसित राष्ट्र की छवि रचता है; लेकिन आम आदमी से दूर होती शिक्षा, स्वास्थ्य और भोजन, और गिरता जीवन स्तर—एक समानांतर दुर्भिक्ष का इतिहास लिख रहे हैं, जहाँ गरीबी और विषमता का विस्तार ही असली यथार्थ है।
राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र नोयडा और उत्तर भारत के विकसित नगरों में एक मजदूर प्रतिदिन 10 घंटे काम करके महज 11–12 हजार रुपये महीने में गुजारा करता है। यह तब पता चलता हैं जब मजदूरी बढ़ाने का आंदोलन हिंसक हो उठता है। यह महज़ एक आँकड़ा नहीं, व्यवस्था का आईना है—जहाँ श्रम का मूल्य बाजार तय करता है और बाजार संवेदना की नहीं, मुनाफे की भाषा समझता है। कम्पनी मालिक अरबपति होते जा रहे हैं, पर उनके मजदूर खाकपति होने के लिए विवश हैं। यहाँ मनुस्मृति का वह श्लोक याद आता है कि शूद्र के पास धन और घर नहीं होना चाहिए। जिसका तात्पर्य है श्रमिक जितना ही अभाव ग्रस्त रहेगा,उतने ही कम मजदूरी या बेगार करने पर विवश होगा।
गाँवों में बारात का श्रमिक 600 रुपये प्रतिदिन पाता है, पर काम की अनिश्चितता उसे महीने के अंत में फिर अभाव के उसी अँधेरे कुएँ में धकेल देती है। सरकारी संस्थानों में संविदा या ठेके पर काम करने वाले सफाई कर्मी,वार्डव्याय, फार्मासिस्ट, लैब टेक्नीशियन—8 से 12 हजार में अपनी विशेषज्ञता गिरवी रखे हुए हैं।
डिलिवरी ब्वाय, दुकानों के कर्मचारी, अस्पतालों, रेलवे और डाक तंत्र के कर्मचारी—5 से 10 हजार में उस व्यवस्था को ढो रहे हैं, जिसे “विकास” कहा जाता है। शिक्षा जगत, इस विडम्बना का सबसे त्रासद अध्याय है। बीटीसी, बीएड, यहाँ तक कि पीएचडी धारक 5 से 20 हजार में प्राइवेट स्कूल, कालेजों में पढ़ाने को विवश हैं। पॉलिटेक्निक, बीटेक, एमबीए, एमटेक, बीफार्मा जैसी डिग्रियाँ लेने वाले युवा 8 से 25 हजार में जीवन काटने को मजबूर हैं—जबकि इन डिग्रियों के पीछे घरों की जमापूंजी जल चुकी होती है। यह केवल वेतन का संकट नहीं, यह ज्ञान और योग्यता के अवमूल्यन की पराकाष्ठा है।नीजी क्या, सरकारी स्कूल-कालेजों,विश्वविद्यालयों में अस्थाई नियुक्तियों में भी यही हाल है।
दिल्ली विश्वविद्यालय में एडहॉक की जगह “गेस्ट सिस्टम”—15 हजार प्रतिदिन का भ्रम देता है, पर उसके भीतर अस्थिरता का गड्ढा है, जिसमें एक पूरी पीढ़ी अपना भविष्य गिरवी रख रही है। पत्रकारिता भी अब पेशा नहीं, विवशता बनती जा रही है। गाँवों में “प्रतिष्ठा के नाम पर बेगारी”, और जिलों में 15–25 हजार में बिकती कलम—लोकतंत्र की चौथी शक्ति की यह दशा है। बड़े से छोटे शहरों और कस्बों में मॉल और ऑनलाइन बाजार ने फुटकर दुकानदारों को सेल्समैन में बदल दिया है। जो जीवन कभी ठेले, गुमटी या सड़क किनारे की छोटी दुकानों से चलता था, वह अब “सुंदरीकरण” की परियोजनाओं में उजड़ चुका है—दुकान ही नहीं, घर भी छिन गए हैं।
यह उत्तर भारत की तस्वीर है—वही उत्तर भारत, जो देश की राजनीति तय करता है। जिसे देखकर लगता है यहाँ की सत्तर फीसदी आबादी किसी तरह जीने को विवश है। जो विकास के नगाड़े का आवाज को कर्कश कर रही है, और जब यही “अकुशल” मजदूर दक्षिण भारत—बैंगलुरु, चेन्नई, हैदराबाद, गोवा—पहुँचता है, तो 25–30 हजार पाता है। अंतर केवल मजदूरी का नहीं, श्रम के सम्मान का भी है। तो सवाल सीधा है—क्या उत्तर भारत में श्रम सस्ता है, या मनुष्य का मूल्य?
नोएडा जैसे औद्योगिक क्षेत्रों में जब मजदूर आवाज उठाते हैं, तो उन्हें “विदेशी साजिश” या “नक्सली प्रभाव” कहकर खारिज कर दिया जाता है। यह प्रवृत्ति असहमति को अपराध में बदल देती है। शोषण के खिलाफ आवाज उठाने को शोषक के खिलाफ साजिश कहने का मतलब सरकार और मीडिया दोनों का शोषक के साथ खड़े होना है।
विश्व की चौथी अर्थव्यवस्था का मतलब आधुनिक होते शहर, चमचमाती सड़कें नहीं आम मजदूर की थाली में रोटी के साथ दाल-सब्जी और देह पर अच्छा कपड़ा होता है। जिस समाज और देश में श्रम और ज्ञान का उचित मूल्य नहीं मिलता है, उस समाज-देश में समृद्धि का स्वप्न नहीं देखा जा सकता है।
ऐसी स्थिति में पड़ोसी चीन और दुनिया के देशो के मुकाबले हम कहाँ खड़े है,यह देखा जाना चाहिए। जिनके पसीने के बल पर बढ़ती अर्थव्यवस्था का दवा किया जा रहा है, उनके हिस्से में भी उसका लाभ दिखना चाहिए। अन्यथा यह देश गरीबों का अमीर देश बन कर रह जायेगा।
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डॉ. आर. अचल Editor-in-Chief, Eastern Scientist |
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