The Commodity of Commons and Cultural Paradox: Ambubachi, Marketization, and the Hegemony of Taboos
This aticle critically examines the rampant commercialization and cultural appropriation of the sacred Ambubachi Mela at Kamakhya, Guwahati. Traditionally rooted in indigenous Assamese culture, Ambubachi is a celebration of eco-feminism, geo-ecological cycles, and matriarchal reverence, honoring the menstruation (fertility) of Mother Earth and the Goddess.
The essay highlights a stark sociological paradox: the festival is currently overwhelmed by mainstream patriarchal crowds from regions where menstruation is fiercely stigmatized as an impure taboo, and where women have historically been denied the right to spiritual practice or Vedic chanting. Driven by market-induced 'religious tourism' and social media sensationalism, these visitors commodify the rituals without absorbing the liberating philosophy. The influx severely threatens the fragile ecology of the Nilachal hills. The editorial concludes that unless society dismantles its deep-seated misogyny and embraces the scientific and egalitarian philosophy of the regional culture, such tourism remains a hollow, hypocritical exercise in consumption.
अम्बुवाची पर्व के व्यावसायिकरण, पारिस्थितिकी संकट और मुख्यधारा संस्कृति के वैचारिक पाखंड का विश्लेषण
वर्तमान में असम के गुवाहाटी स्थित पौराणिक नीलांचल पर्वत पर आदि शक्ति माँ कामाख्या का पावन ‘अम्बुवाची पर्व’ मनाया जा रहा है। किंतु, समकालीन परिदृश्य में यह उत्सव अपनी मूल आध्यात्मिक और प्राकृतिक चेतना से भटककर तीव्र पर्यावरणीय संकट और चरम वैचारिक अंतर्विरोधों का गवाह बन रहा है। देश-विदेश से उमड़ी अभूतपूर्व भीड़ ने न केवल गुवाहाटी और नीलांचल पर्वत की संवेदनशील पारिस्थितिकी (Ecology) को गंभीर खतरे में डाल दिया है, बल्कि सोशल मीडिया के इस दौर में इस प्राच्य पर्व को एक लोक-उत्सव से बदलकर महज एक ‘धार्मिक पर्यटन इवेंट’ और आभासी प्रदर्शन की वस्तु बना दिया है। यह भीड़ वास्तविक श्रद्धा या दर्शन की समझ से अधिक, आधुनिक बाजारवाद द्वारा जनित धार्मिक पर्यटन के आक्रामक प्रचार-प्रसार की देन है।
ऐतिहासिक और नृवैज्ञानिक (Anthropological) दृष्टिकोण से देखा जाए, तो अम्बुवाची मूलतः असम की प्राच्य (Indigenous) संस्कृति का आदि पर्व है। यह एक ऐसी मातृप्रधान, स्त्री-समानता और सहज चेतना से उपजा विमर्श है, जहाँ प्रकृति और स्त्री के सह-अस्तित्व को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। इसके विपरीत, शेष भारत का एक बड़ा हिस्सा अपनी पितृसत्तात्मक लेंंगिक- सामाजिक विषमता के लिए कुख्यात रहा है। असम की इस महान परंपरा में स्त्री के रजस्राव (Menstruation) को वर्जना या लज्जा नहीं, बल्कि परम पवित्र, पूज्य और नव-सृजन का आधार माना गया है। यहाँ तक कि इस समाज में कन्या के प्रथम रजस्राव को ‘तुलनी बिया’ जैसे एक बड़े सामाजिक उत्सव के रूप में आदर सहित मनाने की स्वस्थ परंपरा रही है।
यह पर्व विशुद्ध रूप से खगोलीय चक्र और भू-पारिस्थितिकी (Geo-ecological) सत्य पर आधारित है। आषाढ़ मास में जब सूर्य आर्द्रा नक्षत्र में प्रवेश करता है (प्रायः 22 जून), तब ग्रीष्म की तपन के बाद मॉनसून की पहली फुहारों से धरती माता आर्द्र (गीली) होती हैं। ‘अम्बुवाची’ शब्द का वास्तविक अर्थ ही है—"पानी का बोलना या गर्जना"। यह समय प्रकृति का ऋतुमती काल है, जहाँ आदि शक्ति और धरती दोनों को रजस्वला मानकर उनके स्वतः-नवीनीकरण (Self-healing) और विश्राम को सम्मान दिया जाता है। इसी कारण, तीन दिनों तक जहाँ देवी मंदिर के कपाट बंद रहते हैं, वहीं संपूर्ण क्षेत्र में हल चलाना, खुदाई या बुवाई जैसे कृषि कार्य पूरी तरह वर्जित हो जाते हैं। मात्र कुछ वर्ष पूर्व तक, इस पर्व की महत्ता स्थानीय समाज और साधना-लीन शाक्त तांत्रिकों तक ही सीमित थी, जहाँ एक गंभीर, मूक और आध्यात्मिक वातावरण निर्मित होता था।
किंतु आज की सबसे बड़ी सामाजिक विडंबना और सांस्कृतिक घालमेल (Cultural Appropriation) यह है कि इस मेले में आज सबसे अधिक भीड़ उस उत्तर-भारतीय और अन्य क्षेत्रों की मुख्यधारा संस्कृति के लोगों की है, जिनकी अपनी सामाजिक संरचना स्त्री-दमन और विषमता पर टिकी है। यह एक ऐसा समाज है जहाँ स्त्रियों को सदियों तक आध्यात्मिक साधना के मूल अधिकारों तक से वंचित रखा गया, यहाँ तक कि उनके लिए वैदिक मंत्रों का उच्चारण और पठन भी वर्जित कर दिया गया। अजीब विरोधाभास है कि जिस संस्कृति ने स्त्री को धार्मिक और सामाजिक रूप से दोयम दर्जे पर रखा, उसी संस्कृति के ध्वजवाहक आज नीलांचल पर्वत पर ‘रजस्वला प्रकृति’ और ‘ऋतुमती देवी’ के जयकारे लगा रहे हैं।
यह आगंतुक भीड़ इस ऐतिहासिक और कड़वे सत्य से पूरी तरह अनभिज्ञ—या शायद उदासीन—है कि रजस्राव को लेकर उनके अपने क्षेत्रों में आज भी एक अशुद्ध ‘टैबू’ (Taboo) कायम है, जहाँ इसे एक सामाजिक अपराध की तरह छुपाया जाता है। यहाँ तक कि आधुनिकता के दावों के बीच आज भी बाजारों में सेनेटरी पैड्स को ‘काली पॉलिथीन’ या अखबार में लपेटकर देने की रूढ़िवादी मर्यादा स्थापित है। कितनी बड़ी विडंबना है कि जो समाज अपने घरों में स्त्री और उसके रजस्राव के प्रति इतना असहज और संकीर्ण रहता है, वही आज सोशल मीडिया पर आदिशक्ति माँ कामाख्या के रजस्राव का न केवल उत्सव मना रहा है, बल्कि उसका खुलेआम सतही प्रदर्शन (Showoff) भी कर रहा है। इसके विपरीत, मूल असमिया संस्कृति इस सत्य का उत्सव जरूर मनाती है, किंतु उसमें आस्था की शुचिता होती है, ऐसा तमाशाई प्रदर्शन नहीं। इसी घोर गोपनीयता, लोक-लाज और दकियानूसी सोच के कारण आज भी देश के एक बड़े हिस्से की स्त्रियाँ मासिक धर्म के दौरान वैज्ञानिक स्वच्छता (Menstrual Hygiene) से वंचित रहकर अनेक असाध्य रोगों की शिकार हो जाती हैं। इससे बड़ा व्यंग क्या हो सकता है, जो उत्तर भारतीय समाज सावन में माँसाहार बन्द करने का नया चलन स्थापित करने मे लगा। बलि और मांसाहार को धर्मविरुद्ध मानता है,वही समाज कामाख्या में जाकर धन्य हो रहा है जहाँ बकरे,भैेसे आदि बलि अनवरत चलती रहती है।
बाजारवाद ने इस पर्व के इस क्रांतिकारी और नारीवादी दर्शन को पूरी तरह ओझल कर के इसे एक कौकुकपूर्ण रहस्य (Exotic Mystic Event) के रूप में ब्रांड कर दिया है। यह एक कटु सामाजिक सत्य है कि यहाँ आया हुआ बहुसंख्यक पर्यटक वर्ग यहाँ से लौटने के बाद भी रजस्राव के प्रति अपनी उसी पारंपरिक, संकीर्ण और दकियानूसी वर्जनाओं को जारी रखेगा। वे अपने घरों में लौटकर रोज़मर्रा के स्त्री-दमन और उनके अधिकारों के हनन को अपनी मौन सहमति देंगे। वे कामाख्या से प्रसाद स्वरूप ‘रक्तवस्त्र’ लाकर अपनी तिजोरियों में तो बंद कर लेंगे ताकि वैभव बढ़े, लेकिन अपने मस्तिष्क के उन बंद कपाटों को कभी नहीं खोलेंगे जो स्त्री के इस नैसर्गिक सृजन-चक्र और उसकी आध्यात्मिक संप्रभुता को हेय दृष्टि से देखते हैं।
निष्कर्षतः, जब तक हम किसी संस्कृति या पर्व के बाह्य प्रतीकों के उपभोग की ललक छोड़कर उसके पीछे छिपे वैज्ञानिक, प्राकृतिक और मानवीय दर्शन को आत्मसात नहीं करते, तब तक ऐसा धार्मिक पर्यटन समाज को वैचारिक रूप से खोखला और प्रकृति को अक्षम ही करेगा। अम्बुवाची की मूल पुकार बाजार के कोलाहल को शांत कर, प्रकृति के विश्राम का सम्मान करने और स्त्री-ऊर्जा के जैविक व आध्यात्मिक सत्य को सहर्ष व बराबरी के साथ स्वीकार करने में ही निहित है।
डॉ. अचल पुलस्तेय एक बहुविषयक विद्वान, लेखक, चिंतक और लोक अध्येता हैं। उनका लेखन सामाजिक यथार्थ, सांस्कृतिक परिवर्तन और मानवीय चेतना के गहन विश्लेषण के लिए जाना जाता है।
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