The Destruction of Ecosphere and the Pretext of El Niño: The Suicidal Trajectory of the Blind Development Model
This editorial critically examines the contemporary discourse surrounding global climatic disasters, arguing that the frequent attribution of droughts, erratic monsoons, and extreme thermal anomalies solely to 'El Niño' is a reductionist evasion of anthropogenic accountability. El Niño, fundamentally a periodic oceanic-atmospheric phenomenon, has been weaponized as a convenient scapegoat by policymakers and global economic regimes to camouflage the devastating repercussions of an unbridled, GDP-centric development paradigm. Through the systematic decimation of forests, the unscientific fracturing of mountain ecosystems, and the commercial encroachment of river basins and wetlands, modern consumerist civilization has systematically dismantled the planet's intrinsic ecological resilience.
This paper asserts that the amplification and ferocity of current climatic crises are not mere anomalies of nature, but the direct consequences of man-made environmental degradation. Eastern Scientist advocates for an immediate paradigm shift from the colonial mindset of conquering nature toward an ecologically sustainable development model. Addressing the existential crisis of the Anthropocene requires moving beyond natural pretexts and acknowledging that the ongoing ecological collapse is a self-inflicted catastrophe born out of short-sighted economic exploitation.
Keywords: El Niño, Anthropogenic Degradation, Sustainable Development, Ecological Resilience, Climate Accountability, Eastern Scientist Editorial.
मनुष्य की आदिम चेतना ने प्रकृति को 'माता' माना था, क्योंकि वह जीवन का सृजन और पोषण करती है। परंतु, आधुनिक औद्योगिक और उपभोक्तावादी सभ्यता ने प्रकृति को केवल एक 'जिंस' (Commodity) या उपभोग की वस्तु समझ लिया है। वर्तमान समय में जब वैश्विक स्तर पर सूखे, अत्यधिक गर्मी, अनियमित मानसून और जल-संकट की विभीषिका सामने आती है, तो हमारे नीति-निर्माता, वैज्ञानिक और वैश्विक संगठन बड़ी सुगमता से सारा दोष 'अलनीनो' (El Niño) नामक प्राकृतिक घटना के सिर मढ़कर अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ लेते हैं। यह न केवल हमारी बौद्धिक बेईमानी है, बल्कि उस आत्मघाती सच से मुंह मोड़ना भी है जिसे हम रोज़ अपने हाथों से रच रहे हैं। सच तो यह है कि जंगल, पहाड़ और नदियों को बर्बाद हम कर रहे हैं, और तबाही का ठीकरा प्रकृति के माथे फोड़ रहे हैं।
अलनीनो प्रशांत महासागर की एक प्राकृतिक और आवधिक (Periodic) घटना है, जो सदियों से घटित होती रही है। प्रकृति के पास इस तरह के उतार-चढ़ावों को सोखने और उनसे उबरने की अपनी एक आंतरिक क्षमता (Resilience) थी। लेकिन आज यदि अलनीनो विनाशकारी बन चुका है, तो इसका कारण महासागरों का वह बढ़ता तापमान है जिसे हमारे तथाकथित 'सकल घरेलू उत्पाद' (GDP) केंद्रित विकास मॉडल ने पैदा किया है। जीवाश्म ईंधनों के असीमित दोहन और अनियंत्रित कार्बन उत्सर्जन ने पृथ्वी को एक ऐसे 'प्रेशर कुकर' में बदल दिया है, जहाँ प्राकृतिक चक्र अपनी लय खो चुके हैं।
विनाश का त्रिकोण: जंगल, पहाड़ और नदी
हमारी प्रगति की परिभाषा ने जीवन के तीन आधारभूत स्तंभों पर सबसे क्रूर प्रहार किया है:
• जंगलों का कंक्रीटीकरण: 'सड़क चौड़ीकरण', 'खनन' और 'शहरीकरण' के नाम पर आदिम वनों को बेरहमी से साफ किया गया है। जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं होते, वे वैश्विक तापमान को नियंत्रित करने वाले 'कार्बन सिंक' और मानसून को आकर्षित करने वाले जीवंत तंत्र हैं। उनके नष्ट होने से स्थानीय स्तर पर तापमान में जो वृद्धि हुई है, उसने अलनीनो के थपेड़ों को और अधिक झुलसाने वाला बना दिया है।
• पहाड़ों का सीना छलनी: पहाड़ों को डायनामाइट से उड़ाकर, उनके भीतर सुरंगे खोदकर and उनकी ढलानों पर अनियोजित कंक्रीट के ढांचे खड़े करके हमने उनके पारिस्थितिक संतुलन (Ecological Balance) को ध्वस्त कर दिया है। पहाड़ नदियों के उद्गम और ग्लेशियरों के घर हैं। जब पहाड़ दरकते हैं, तो वे केवल मलबा नहीं गिराते, वे हमारी नदियों की जीवन-रेखा को अवरुद्ध करते हैं।
• नदियों का दम घोंटना: नदियाँ, जिन्हें इस उपमहाद्वीप की संस्कृति में जीवनदायिनी माना गया, आज या तो नालों में तब्दील हो चुकी हैं या बांधों के जाल में छटपटा रही हैं। नदियों के जलग्रहण क्षेत्रों (Catchment Areas) और आर्द्रभूमियों (Wetlands) पर भू-माफियाओं और सरकारी परियोजनाओं का कब्जा है। जब प्राकृतिक जल संचयन के ये स्रोत ही नष्ट हो जाएंगे, तो अलनीनो के कारण मानसून थोड़ा भी कमजोर होने पर हाहाकार मचना तय है।
हम उस अवस्था में पहुँच चुके हैं जहाँ 'बाढ़ और सूखा' अब केवल मौसम की मार नहीं, बल्कि मानव-निर्मित आपदाएं (Man-made Disasters) बन चुकी हैं। जब हम नदियों के प्राकृतिक मार्ग को अवरुद्ध करेंगे, तो वे शहरों में घुसेंगी ही; और जब हम भूजल का अंधाधुंध दोहन करेंगे, तो सूखा और गहराएगा ही। इस पूरी तबाही को 'अलनीनो का प्रभाव' कहकर संबोधित करना दरअसल हमारे उस लालच को छिपाने का मुखौटा है, जो 'विकास' के नाम पर धरती का खून चूस रहा है।
अब समय आ गया है कि हम अलनीनो जैसी प्राकृतिक घटनाओं को अपनी नाकामियों का बहाना बनाना बंद करें। प्रकृति के साथ किया गया यह संहार यदि तुरंत नहीं रुका, तो आने वाली सदियों में इतिहास हमें एक ऐसी सभ्यता के रूप में याद रखेगा जिसने अपनी ही चिता की लकड़ियां अपने 'विकास' के औजारों से काटी थीं। दोष अलनीनो का नहीं, दोष हमारी उस अंधी दृष्टि का है जो वर्तमान के लाभ में भविष्य का सर्वनाश नहीं देख पा रही है।
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