यूजीसी एक्ट 2026 : कैंपस की लोकतांत्रिक आत्मा पर नियंत्रण की कोशिश✒️

Public Discourse

Date : 25 January 2026

डॉ.चतुरानन ओझा


सोशल मीडिया पर इन दिनों प्रस्तावित यूजीसी एक्ट 2026 को लेकर तीखी बहस चल रही है। लेकिन विडंबना यह है कि जिस मुद्दे पर सबसे अधिक और संगठित चर्चा होनी चाहिए—यानी शिक्षा संस्थानों पर सरकार द्वारा बढ़ते नियंत्रण के प्रयास—वह विमर्श के केंद्र में नहीं आ पा रहा है। इसके बजाय बहस का बड़ा हिस्सा सामाजिक पिछड़ेदलित और आदिवासी छात्रोंफैकल्टी और नॉन-फैकल्टी कर्मचारियों के साथ होने वाले भेदभाव तक सिमटता जा रहा है। यह सवाल महत्वपूर्ण हैलेकिन यदि चर्चा यहीं ठहर जाएतो मूल राजनीतिक चुनौती पीछे छूट जाएगी।


भारत की उच्च शिक्षा व्यवस्था आज केवल शैक्षणिक सुधार के नहींबल्कि एक गहरे लोकतांत्रिक संघर्ष के दौर से गुजर रही है। प्रस्तावित यूजीसी एक्ट 2026 को सरकार गुणवत्तामानकीकरण और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के नाम पर आगे बढ़ा रही है। लेकिन विश्वविद्यालय परिसरों में उभर रहा विरोध यह स्पष्ट करता है कि यह कानून महज़ प्रशासनिक पुनर्गठन नहीं है। यह उस बुनियादी सवाल से जुड़ा है—किसके लिए शिक्षाकिसके नियंत्रण में शिक्षा और किसकी आवाज़ को शिक्षा में जगह मिलेगी?

भारतीय विश्वविद्यालय लंबे समय से छात्र आंदोलनों के केंद्र रहे हैं। स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर मंडल आंदोलनआपातकाल विरोधऔर हाल के वर्षों में रोहित वेमुला प्रकरणजेएनयू आंदोलन तथा फीस वृद्धि के विरुद्ध संघर्ष—कैंपस हमेशा सत्ता से सवाल पूछने की जगह रहा है। विश्वविद्यालयों की यही राजनीतिक-सामाजिक चेतना उन्हें जीवंत बनाती है। यूजीसी एक्ट 2026 इसी परंपरा के विपरीत जाता प्रतीत होता हैक्योंकि यह विश्वविद्यालयों को राजनीतिक रूप से निर्जीव और प्रशासनिक रूप से आज्ञाकारी बनाने की दिशा में कदम बढ़ाता है।

इस कानून के विरोध में सबसे मुखर स्वर दलितआदिवासी और पिछड़े वर्ग के छात्र संगठनों से उठ रहे हैं। इसके पीछे ठोस कारण हैं। केंद्रीकरण का हर प्रयास सबसे पहले उन्हीं समूहों को प्रभावित करता हैजिनकी संस्थागत मौजूदगी पहले से कमजोर है। प्रवेश प्रक्रियाफेलोशिपहॉस्टलशोध निर्देशन और मूल्यांकन में व्याप्त जातिगत भेदभाव के खिलाफ जो सीमित लोकतांत्रिक स्पेस अब तक मौजूद थाउसके और सिमटने का खतरा इस कानून में निहित है।

कैंपस राजनीति का अनुभव बताता है कि जब भी आरक्षणसामाजिक प्रतिनिधित्व या जातिगत भेदभाव का सवाल उठता हैतो उसका संगठित विरोध प्रायः सवर्ण वर्चस्ववादी छात्र समूहों और शिक्षक वर्ग की ओर से देखने को मिलता है। यूजीसी एक्ट 2026 के संदर्भ में भी यही प्रवृत्ति दिखाई देती है। एक ओर स्वायत्तता की बात की जाती हैवहीं दूसरी ओर सामाजिक न्याय की माँगों को ‘अकादमिक गुणवत्ता के लिए खतरा’ बताकर खारिज कर दिया जाता है। दरअसल यह विरोध उस असमान कैंपस संरचना की रक्षा हैजिसमें सत्तासंसाधन और निर्णायक पद लंबे समय से कुछ विशेष वर्गों तक सीमित रहे हैं।

छात्र आंदोलनों की सबसे बड़ी चिंता यह है कि नया नियामक ढाँचा अनुशासन के नाम पर असहमति को अपराध में बदल सकता है। कैंपस में विरोधधरनापोस्टर और वैचारिक बहस को ‘अराजकता’ बताकर कुचलने की प्रवृत्ति पहले ही तेज़ हुई है। यदि नियमन और नियुक्तियाँ पूरी तरह केंद्रीकृत होती हैंतो प्रशासनिक दबाव के सामने छात्र राजनीति और अधिक कमजोर पड़ेगी। इसका सीधा असर उन छात्रों पर होगाजिनके लिए आंदोलन ही अपनी बात रखने का एकमात्र माध्यम रहा है।

राज्य विश्वविद्यालयों का प्रश्न भी इसी राजनीति से गहराई से जुड़ा है। ये संस्थान ग्रामीणआदिवासी और पिछड़े वर्ग के छात्रों के लिए उच्च शिक्षा का सबसे बड़ा आधार हैं। यदि केंद्र का नियंत्रण बढ़ता है और स्थानीय नीतिगत स्वायत्तता समाप्त होती हैतो सामाजिक न्याय आधारित छात्र राजनीति का दायरा स्वतः सिमट जाएगा। यह केवल प्रशासनिक नहींबल्कि राजनीतिक हाशियाकरण की प्रक्रिया होगी।

शिक्षक समुदाय के भीतर भी यही विभाजन साफ़ दिखाई देता है। अस्थायी नियुक्तियाँसंविदा प्रणाली और प्रदर्शन आधारित मूल्यांकन सबसे पहले दलितआदिवासी और पिछड़े वर्ग के शिक्षकों को प्रभावित करते हैं। एक असुरक्षित शिक्षक न तो छात्र आंदोलनों का नैतिक समर्थन कर पाता है और न ही संस्थागत भेदभाव के खिलाफ खुलकर खड़ा हो पाता है। परिणामस्वरूप पूरा कैंपस धीरे-धीरे भय और चुप्पी की संस्कृति में ढलने लगता है।

निष्कर्षतःयूजीसी एक्ट 2026 केवल शिक्षा नीति का दस्तावेज़ नहीं है। यह कैंपस की लोकतांत्रिक आत्माछात्र राजनीति और सामाजिक न्याय की दिशा तय करने वाला प्रस्ताव है। यदि इसमें स्वायत्तताअसहमति और प्रतिनिधित्व की ठोस गारंटी नहीं होगीतो यह सुधार नहींबल्कि विश्वविद्यालयों के राजनीतिक निर्वातकरण का माध्यम बन जाएगा।

क्योंकि बिना सवाल पूछने वाले छात्रों के और बिना बराबरी की राजनीति के,कोई भी विश्वविद्यालय ज्ञान का नहीं, केवल सत्ता का परिसर बन जाता है।

(*लेखक शिक्षाविद्, सबके लिए समान शिक्षा का अधिकार आंदोलन के उप्र संयोजक हैं।)




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