पूँजीवाद के दौर में भारतीय गणतंत्र के स्वास्थ्य की पैथालाजी -एक विमर्श✒️

Current Affairs

Date :26 January 2026

Editor-in-Chief : Dr. R. Achal Pulastey


आज जब हम अपने देश का 77वाँ गणतंत्र दिवस मना रहे हैं तब दुनिया में लोकतंत्र के स्वास्थ्य को लेकर चिंतायें भी जाहिर की जा रही हैं। ऐसे समय में भारतीय गणतंत्र के स्वास्थ्य की पैथालाजी भी जरूरी लगती है।  स्वास्थ्य आदमी का हो या व्यवस्था का, कभी भी संक्रमण का संभावना बनी रहती है,इसलिए दोनो के स्वास्थ्य की जाँच होती रहनी चाहिए। -अचल  पुलस्तेय


इस संदर्भ में देखे तो स्वस्थ भारतीय गणतंत्र की कल्पना केवल एक राजनीतिक व्यवस्था नहीं बल्कि सामाजिक न्यायसमानता और लोकतांत्रिक मूल्यों की साझा परियोजना के रूप में की गई थी। संविधान की प्रस्तावना में निहित न्यायस्वतंत्रतासमानता और बंधुत्वये चार स्तंभ उस गणतांत्रिक स्वप्न की नींव हैंजिसे औपनिवेशिक शोषण के लंबे अंधकार के बाद देश ने चुना। लेकिन इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में खड़े होकर जब हम भारतीय गणतंत्र को देखते हैंतो यह प्रश्न अनिवार्य हो जाता है कि वैश्विक पूँजीवाद के इस आक्रामक दौर में क्या हमारे गणतांत्रिक आदर्श सुरक्षित हैं?
1991 के बाद से भारत ने उदारीकरणनिजीकरण और वैश्वीकरण (एलपीजी मॉडल) को विकास का मंत्र बनाया। इससे आर्थिक वृद्धि की दर बढ़ीएक नया मध्यम वर्ग उभरा और भारत वैश्विक बाजार का अहम हिस्सा बना। परंतु इस विकास की कीमत भी चुकानी पड़ी। पूँजीवाद ने उत्पादन और मुनाफे को केंद्रीय मूल्य बना दियाजबकि सामाजिक न्यायश्रम अधिकार और सार्वजनिक कल्याण हाशिये पर धकेले जाते चले गए।
आज स्थिति यह है कि देश की संपत्ति का बड़ा हिस्सा कुछ चुनिंदा कॉरपोरेट घरानों के हाथों में केंद्रित हो गया है। ऑक्सफैम जैसी रिपोर्टें लगातार बताती हैं कि भारत में असमानता खतरनाक स्तर तक बढ़ चुकी है। एक ओर अरबपतियों की संख्या बढ़ रही हैदूसरी ओर करोड़ों लोग बुनियादी सुविधाओं—शिक्षास्वास्थ्यपोषण—से वंचित हैं। यह असमानता केवल आर्थिक नहींबल्कि राजनीतिक भी हैक्योंकि पूँजी का बढ़ता प्रभाव लोकतांत्रिक निर्णय-प्रक्रिया को प्रभावित करने लगा है।
भारतीय गणतंत्र का मूल विचार यह था कि राज्य एक कल्याणकारी राज्य होगा। लेकिन पूँजीवादी दौर में राज्य धीरे-धीरे एक नियामक से अधिक सुविधादाता बनता जा रहा है—सुविधादाता जनता का नहींबल्कि बड़े निवेशकों और कॉरपोरेट हितों का। सार्वजनिक उपक्रमों का निजीकरणशिक्षा और स्वास्थ्य का बाज़ारीकरणतथा श्रम कानूनों का कमजोर किया जाना इसी प्रवृत्ति के उदाहरण हैं। इससे नागरिक ‘नागरिक’ से अधिक ‘उपभोक्ता’ में बदलता जा रहा है।
इस परिवर्तन का सबसे गहरा असर वंचित तबकों—दलितोंआदिवासियोंपिछड़ोंअल्पसंख्यकों और असंगठित श्रमिकों—पर पड़ा है। पूँजीवाद जाति और वर्ग की असमानताओं को खत्म करने के बजाय अक्सर उन्हें और मजबूत करता है। आदिवासी क्षेत्रों में खनन और बड़े विकास परियोजनाओं के नाम पर विस्थापनकिसानों की आत्महत्याएँऔर अस्थायी व ठेका श्रम का विस्तार—ये सब संकेत हैं कि विकास का मॉडल बहुसंख्यक जनता के हितों से कटता जा रहा है।
पूँजीवाद का एक और खतरनाक पहलू है—लोकतंत्र का प्रबंधकीय (मैनेजरियल) रूप में बदल जाना। चुनाव अब विचारों की बहस कम और संसाधनों की प्रतिस्पर्धा अधिक बनते जा रहे हैं। चुनावी चंदे की अपारदर्शी व्यवस्था और कॉरपोरेट फंडिंग ने राजनीतिक समानता के सिद्धांत को कमजोर किया है। जब सत्ता तक पहुँच धन पर निर्भर हो जाएतो गणतंत्र स्वाभाविक रूप से कुलीनतंत्र (ओलिगार्की) की ओर झुकने लगता है।
मीडियाजिसे लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता हैवह भी इस पूँजीवादी दबाव से अछूता नहीं है। बड़े कॉरपोरेट घरानों के स्वामित्व वाले मीडिया संस्थान अक्सर सत्ता और पूँजी के गठजोड़ के आलोचक बनने के बजाय उनके प्रवक्ता बनते दिखाई देते हैं। इससे सार्वजनिक विमर्श संकुचित होता है और असहमति को हाशिये पर डाल दिया जाता है—जो किसी भी गणतंत्र के लिए खतरनाक संकेत है।
हालाँकि यह भी सच है कि भारतीय गणतंत्र पूरी तरह निष्क्रिय या मृत नहीं हुआ है। न्यायपालिकासामाजिक आंदोलनछात्र-युवा संघर्षमहिला और श्रमिक आंदोलन—ये सभी अब भी लोकतांत्रिक चेतना को जीवित रखे हुए हैं। समय-समय पर उठने वाली जन-आवाज़ें यह याद दिलाती हैं कि गणतंत्र केवल सत्ता का ढाँचा नहींबल्कि जनता की सक्रिय भागीदारी से चलने वाली प्रक्रिया है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि विकास और पूँजी के प्रश्न को लोकतांत्रिक मूल्यों के अधीन रखा जाएन कि लोकतंत्र को पूँजी के अधीन। राज्य को फिर से अपनी कल्याणकारी भूमिका को सशक्त करना होगा। शिक्षास्वास्थ्य और रोजगार को बाज़ार के भरोसे छोड़ने के बजाय इन्हें नागरिक अधिकार के रूप में देखना होगा। साथ हीआर्थिक नीतियों के निर्माण में सामाजिक न्याय को केंद्रीय स्थान देना होगा।
भारतीय गणतंत्र की मजबूती इसी में है कि वह केवल आर्थिक वृद्धि का उत्सव न मनाएबल्कि यह भी पूछे कि यह वृद्धि किसके लिए है और किस कीमत पर। पूँजीवाद के इस दौर में यदि गणतंत्र को बचाना हैतो संविधान की आत्मा को केवल स्मृति-दिवसों तक सीमित न रखकरउसे नीतियों और व्यवहार में उतारना होगा। वरना खतरा यह है कि हम एक ऐसे देश में जागेंजहाँ चुनाव तो होंपर विकल्प न होंसंसद होपर जन-सरोकार न होंऔर गणतंत्र होपर लोक गायब हो।
यही भारतीय गणतंत्र के सामने आज की सबसे बड़ी चुनौती और सबसे बड़ा प्रश्न है।

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