पूँजीवाद के दौर में भारतीय गणतंत्र के स्वास्थ्य की पैथालाजी -एक विमर्श

आज जब हम अपने देश का 77वाँ गणतंत्र दिवस मना रहे हैं तब दुनिया में लोकतंत्र के स्वास्थ्य को लेकर चिंतायें भी जाहिर की जा रही हैं। ऐसे समय में भारतीय गणतंत्र के स्वास्थ्य की पैथालाजी भी जरूरी लगती है।  स्वास्थ्य आदमी का हो या व्यवस्था का, कभी भी संक्रमण का संभावना बनी रहती है,इसलिए दोनो के स्वास्थ्य की जाँच होती रहनी चाहिए। -अचल  पुलस्तेय

इस संदर्भ में देखे तो स्वस्थ भारतीय गणतंत्र की कल्पना केवल एक राजनीतिक व्यवस्था नहीं बल्कि सामाजिक न्याय, समानता और लोकतांत्रिक मूल्यों की साझा परियोजना के रूप में की गई थी। संविधान की प्रस्तावना में निहित न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्वये चार स्तंभ उस गणतांत्रिक स्वप्न की नींव हैं, जिसे औपनिवेशिक शोषण के लंबे अंधकार के बाद देश ने चुना। लेकिन इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में खड़े होकर जब हम भारतीय गणतंत्र को देखते हैं, तो यह प्रश्न अनिवार्य हो जाता है कि वैश्विक पूँजीवाद के इस आक्रामक दौर में क्या हमारे गणतांत्रिक आदर्श सुरक्षित हैं?

1991 के बाद से भारत ने उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण (एलपीजी मॉडल) को विकास का मंत्र बनाया। इससे आर्थिक वृद्धि की दर बढ़ी, एक नया मध्यम वर्ग उभरा और भारत वैश्विक बाजार का अहम हिस्सा बना। परंतु इस विकास की कीमत भी चुकानी पड़ी। पूँजीवाद ने उत्पादन और मुनाफे को केंद्रीय मूल्य बना दिया, जबकि सामाजिक न्याय, श्रम अधिकार और सार्वजनिक कल्याण हाशिये पर धकेले जाते चले गए।

आज स्थिति यह है कि देश की संपत्ति का बड़ा हिस्सा कुछ चुनिंदा कॉरपोरेट घरानों के हाथों में केंद्रित हो गया है। ऑक्सफैम जैसी रिपोर्टें लगातार बताती हैं कि भारत में असमानता खतरनाक स्तर तक बढ़ चुकी है। एक ओर अरबपतियों की संख्या बढ़ रही है, दूसरी ओर करोड़ों लोग बुनियादी सुविधाओं—शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण—से वंचित हैं। यह असमानता केवल आर्थिक नहीं, बल्कि राजनीतिक भी है, क्योंकि पूँजी का बढ़ता प्रभाव लोकतांत्रिक निर्णय-प्रक्रिया को प्रभावित करने लगा है।

भारतीय गणतंत्र का मूल विचार यह था कि राज्य एक कल्याणकारी राज्य होगा। लेकिन पूँजीवादी दौर में राज्य धीरे-धीरे एक नियामक से अधिक सुविधादाता बनता जा रहा है—सुविधादाता जनता का नहीं, बल्कि बड़े निवेशकों और कॉरपोरेट हितों का। सार्वजनिक उपक्रमों का निजीकरण, शिक्षा और स्वास्थ्य का बाज़ारीकरण, तथा श्रम कानूनों का कमजोर किया जाना इसी प्रवृत्ति के उदाहरण हैं। इससे नागरिक ‘नागरिक’ से अधिक ‘उपभोक्ता’ में बदलता जा रहा है।

इस परिवर्तन का सबसे गहरा असर वंचित तबकों—दलितों, आदिवासियों, पिछड़ों, अल्पसंख्यकों और असंगठित श्रमिकों—पर पड़ा है। पूँजीवाद जाति और वर्ग की असमानताओं को खत्म करने के बजाय अक्सर उन्हें और मजबूत करता है। आदिवासी क्षेत्रों में खनन और बड़े विकास परियोजनाओं के नाम पर विस्थापन, किसानों की आत्महत्याएँ, और अस्थायी व ठेका श्रम का विस्तार—ये सब संकेत हैं कि विकास का मॉडल बहुसंख्यक जनता के हितों से कटता जा रहा है।

पूँजीवाद का एक और खतरनाक पहलू है—लोकतंत्र का प्रबंधकीय (मैनेजरियल) रूप में बदल जाना। चुनाव अब विचारों की बहस कम और संसाधनों की प्रतिस्पर्धा अधिक बनते जा रहे हैं। चुनावी चंदे की अपारदर्शी व्यवस्था और कॉरपोरेट फंडिंग ने राजनीतिक समानता के सिद्धांत को कमजोर किया है। जब सत्ता तक पहुँच धन पर निर्भर हो जाए, तो गणतंत्र स्वाभाविक रूप से कुलीनतंत्र (ओलिगार्की) की ओर झुकने लगता है।

मीडिया, जिसे लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है, वह भी इस पूँजीवादी दबाव से अछूता नहीं है। बड़े कॉरपोरेट घरानों के स्वामित्व वाले मीडिया संस्थान अक्सर सत्ता और पूँजी के गठजोड़ के आलोचक बनने के बजाय उनके प्रवक्ता बनते दिखाई देते हैं। इससे सार्वजनिक विमर्श संकुचित होता है और असहमति को हाशिये पर डाल दिया जाता है—जो किसी भी गणतंत्र के लिए खतरनाक संकेत है।

हालाँकि यह भी सच है कि भारतीय गणतंत्र पूरी तरह निष्क्रिय या मृत नहीं हुआ है। न्यायपालिका, सामाजिक आंदोलन, छात्र-युवा संघर्ष, महिला और श्रमिक आंदोलन—ये सभी अब भी लोकतांत्रिक चेतना को जीवित रखे हुए हैं। समय-समय पर उठने वाली जन-आवाज़ें यह याद दिलाती हैं कि गणतंत्र केवल सत्ता का ढाँचा नहीं, बल्कि जनता की सक्रिय भागीदारी से चलने वाली प्रक्रिया है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि विकास और पूँजी के प्रश्न को लोकतांत्रिक मूल्यों के अधीन रखा जाए, न कि लोकतंत्र को पूँजी के अधीन। राज्य को फिर से अपनी कल्याणकारी भूमिका को सशक्त करना होगा। शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार को बाज़ार के भरोसे छोड़ने के बजाय इन्हें नागरिक अधिकार के रूप में देखना होगा। साथ ही, आर्थिक नीतियों के निर्माण में सामाजिक न्याय को केंद्रीय स्थान देना होगा।

भारतीय गणतंत्र की मजबूती इसी में है कि वह केवल आर्थिक वृद्धि का उत्सव न मनाए, बल्कि यह भी पूछे कि यह वृद्धि किसके लिए है और किस कीमत पर। पूँजीवाद के इस दौर में यदि गणतंत्र को बचाना है, तो संविधान की आत्मा को केवल स्मृति-दिवसों तक सीमित न रखकर, उसे नीतियों और व्यवहार में उतारना होगा। वरना खतरा यह है कि हम एक ऐसे देश में जागें, जहाँ चुनाव तो हों, पर विकल्प न हों; संसद हो, पर जन-सरोकार न हों; और गणतंत्र हो, पर लोक गायब हो।

यही भारतीय गणतंत्र के सामने आज की सबसे बड़ी चुनौती और सबसे बड़ा प्रश्न है।

  


 

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