Public Discourse
Date : 26 February 2026
अचल पुलस्तेय
भारतीय राष्ट्रबोध का निर्माण केवल ऐतिहासिक घटनाओं से नहीं हुआ है, बल्कि यह एक विशिष्ट ज्ञान-राजनीति (politics of knowledge)
की उपज है। इस ज्ञान-राजनीति का केंद्र उत्तर भारत—विशेषतः गंगा-यमुना के मैदानी क्षेत्र—रहे हैं। परिणामस्वरूप भारत की विविधता को “राष्ट्रीय” के रूप में नहीं, बल्कि “क्षेत्रीय” के रूप में देखा गया, जबकि उत्तर भारतीय अनुभव को “सार्वदेशिक” मान्यता दे दी गई।
आधुनिक भारत का इतिहासलेखन इसी असंतुलन का प्रमाण है। स्वतंत्रता आंदोलन का नैरेटिव एक सीमित भौगोलिक-सांस्कृतिक परिधि में गढ़ा गया, जिसमें दक्षिण भारत, उत्तर-पूर्व, आदिवासी समाज, तटीय क्षेत्र और सीमावर्ती संस्कृतियाँ संरचनात्मक रूप से हाशिए पर चली गईं। कुछ गैर-उत्तर भारतीय नेताओं के प्रतीकात्मक समावेशन से इस वर्चस्व को वैधता दी गई, पर मूल ढाँचा यथावत रहा। यह प्रक्रिया प्रतिनिधित्व (representation) नहीं, बल्कि समायोजन (assimilation) की थी।
धर्म और जाति के क्षेत्र में यह वर्चस्व और भी गहरा दिखाई देता है। हिंदू धर्म की बहुल परंपराओं को उत्तर भारतीय ब्राह्मणवादी ढाँचे में संकुचित कर दिया गया, और उसी संरचना को पूरे देश का धार्मिक मॉडल मान लिया गया। इसी प्रकार, जाति को एक अखिल भारतीय, एकरूप सामाजिक व्यवस्था के रूप में प्रस्तुत किया गया, जबकि वास्तविकता यह है कि भारत के विभिन्न क्षेत्रों में सामाजिक संरचनाएँ ऐतिहासिक रूप से भिन्न रूपों में विकसित हुई हैं। यह एक प्रकार की सांस्कृतिक सार्वभौमिकता का भ्रम (false universality) है।
इस मानसिक संरचना का परिणाम यह हुआ कि उत्तर भारतीय, हिंदीभाषी समाज ने स्वयं को “राष्ट्र का स्वाभाविक प्रतिनिधि” मान लिया। यही कारण है कि सत्ता-संरचनाओं, प्रशासनिक संस्थाओं और नीति-निर्माण के उच्च पदों पर उसी सामाजिक-भौगोलिक वर्ग की वर्चस्वपूर्ण उपस्थिति दिखाई देती है। इसे अक्सर योग्यता और राष्ट्रभक्ति के नैरेटिव से正 ठहराया जाता है, जबकि यह वस्तुतः संस्थागत असमानता और ऐतिहासिक प्रभुत्व का परिणाम है।
यह स्थिति लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों से टकराती है। लोकतंत्र केवल चुनावी प्रक्रिया नहीं है, बल्कि ज्ञान, प्रतिनिधित्व और सत्ता के न्यायपूर्ण वितरण की प्रणाली है। जब एक क्षेत्रीय दृष्टि स्वयं को “राष्ट्रीय दृष्टि” घोषित कर देती है, तब लोकतंत्र एक बहुलतावादी व्यवस्था न रहकर एक केंद्रीकृत सांस्कृतिक सत्ता में बदल जाता है।
समस्या विविधता में नहीं है; समस्या विविधता को समझने की अनिच्छा में है। भारत की बहुलता को बोझ समझने वाला दृष्टिकोण वस्तुतः राष्ट्र को सशक्त नहीं, बल्कि बौद्धिक रूप से कमजोर बनाता है। यह स्थिति एक प्रकार के आंतरिक उपनिवेशवाद (internal colonialism) को जन्म देती है, जहाँ एक सांस्कृतिक केंद्र शेष देश पर अर्थ, पहचान और राष्ट्रबोध आरोपित करता है।
आज़ादी के 77 वर्षों बाद भी यदि भारत का राष्ट्रबोध क्षेत्रीय वर्चस्व की संरचनाओं से मुक्त नहीं हो पाया है, तो यह केवल ऐतिहासिक विफलता नहीं, बल्कि समकालीन लोकतंत्र की वैचारिक कमजोरी भी है। एक समावेशी भारत का निर्माण तभी संभव है जब “उत्तर भारतीय भारत” की अवधारणा टूटे और उसकी जगह बहुकेन्द्रीय (polycentric) राष्ट्रबोध विकसित हो—जहाँ कोई भी क्षेत्र, भाषा या संस्कृति स्वयं को राष्ट्र का एकमात्र प्रतिनिधि न समझे।
निष्कर्षतः, भारत की लोकतांत्रिक मजबूती उसकी एकरूपता में नहीं, बल्कि उसकी बहुलता को समानता के साथ स्वीकार करने में निहित है। जब तक राष्ट्रबोध सांस्कृतिक वर्चस्व से मुक्त नहीं होगा, तब तक भारत एक राजनीतिक राज्य तो रहेगा, पर एक वास्तविक लोकतांत्रिक राष्ट्र बनने की प्रक्रिया अधूरी ही रहेगी।
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