सामाजिक न्याय की बौद्ध-अम्बेडकरवादी अवधारणा : नवबौद्धवाद का एक पुनर्पाठ

Eastern Scientist | www.easternscientist.in
Print ISSN: 2581-7884 | Volume III | Issue 33 | October-December 2025 |

Book Review

Date : 12 January 2026

Reviewer : Achal Pulastey


Book Details

Title : बुद्ध-अम्बेडक और नवबौद्धवाद
Author : डॉ.संजय कुमार
Publisher : समदर्शी प्रकाशन,गाजियाबाद उप्र
Year : 2025
Price : ₹340
ISBN : 978-93-48073-61-7


भारतीय सामाजिक चिंतन की परंपरा में गौतम बुद्ध और डॉ. भीमराव अम्बेडकर ऐसे दो विचारक हैंजिन्होंने अपने-अपने समय में सामाजिक अन्यायभेदभाव और असमानता के विरुद्ध निर्णायक हस्तक्षेप किया। डॉ. संजय कुमार की पुस्तक बुद्धअम्बेडकर और नवबौद्धवाद इन्हीं दो महापुरुषों के विचारों को जोड़ते हुए नवबौद्धवाद को सामाजिक न्याय की एक आधुनिक वैचारिक धारा के रूप में प्रस्तुत करती है।

शिक्षा संकाय के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. संजय कुमार की यह पुस्तक पुस्तक केवल इतिहास का पुनर्पाठ नहीं हैबल्कि भारतीय समाज की उन गहरी संरचनाओं को समझने का प्रयास हैजिनके कारण सदियों से एक बड़ा वर्ग हाशिए पर रहा। लेखक स्पष्ट करते हैं कि बुद्ध का धम्म किसी दैवी चमत्कार का परिणाम नहीं थाबल्कि वह जाति-व्यवस्थाकर्मकांडस्त्री-अवमानना और सामाजिक विषमता के विरुद्ध एक मानवीय और तर्कसंगत प्रतिक्रिया था।

पुस्तक के प्रारंभिक अध्याय में बुद्ध-पूर्व समाज की सामाजिक और धार्मिक स्थितियों का विश्लेषण करते हुए यह दिखाया गया है कि किस प्रकार तत्कालीन व्यवस्था आम जन के लिए दमनकारी बन चुकी थी। बुद्ध का मध्यम मार्गकरुणा और विवेक पर आधारित धम्म इसी पृष्ठभूमि से जन्म लेता है। लेखक बुद्ध को केवल धार्मिक प्रवर्तक नहींबल्कि एक सामाजिक सुधारक और नैतिक क्रांतिकारी के रूप में स्थापित करते हैं।

पुस्तक का अगला महत्वपूर्ण पड़ाव डॉ. भीमराव अम्बेडकर का सामाजिक दर्शन है। लेखक बताते हैं कि अम्बेडकर ने जातिवादब्राह्मणवाद और सामाजिक असमानता के विरुद्ध जिस वैचारिक संघर्ष का नेतृत्व कियावह आधुनिक भारत की सबसे सशक्त सामाजिक क्रांति है। अम्बेडकर का बौद्ध धर्म स्वीकार करना किसी धार्मिक भावना से प्रेरित नहीं थाबल्कि यह सामाजिक मुक्ति और मानवीय गरिमा की पुनर्स्थापना का एक सोचा-समझा निर्णय था।

नवबौद्धवाद के संदर्भ में पुस्तक यह स्पष्ट करती है कि यह आंदोलन केवल धर्म परिवर्तन की प्रक्रिया नहीं है। यह समानतास्वतंत्रता और बंधुत्व जैसे लोकतांत्रिक मूल्यों पर आधारित एक आधुनिक मानवतावादी दृष्टि है। हिन्दूईसाई और इस्लाम धर्म-दीक्षा की तुलना में नवबौद्धवाद को लेखक एक ऐसे वैकल्पिक मार्ग के रूप में देखते हैंजो व्यक्ति को आत्मसम्मान और सामाजिक बराबरी का बोध कराता है।

डॉ. संजय कुमार की भाषा सरलप्रवाहपूर्ण और विचारोत्तेजक हैजिससे यह पुस्तक केवल शोधार्थियों तक सीमित नहीं रहतीबल्कि सामान्य पाठकों के लिए भी सहज रूप से पठनीय बन जाती है। यद्यपि समकालीन नवबौद्ध आंदोलनों के जमीनी अनुभवों पर और विस्तार की गुंजाइश बनी रहती हैफिर भी यह पुस्तक अपने मूल उद्देश्य में सफल प्रतीत होती है।

कुल मिलाकरबुद्धअम्बेडकर और नवबौद्धवाद’ सामाजिक न्यायसमता और मानवीय गरिमा में विश्वास रखने वाले पाठकों के लिए एक महत्वपूर्ण और विचारोत्तेजक कृति है। यह पुस्तक हमें यह सोचने के लिए प्रेरित करती है कि सामाजिक बदलाव केवल राजनीतिक या धार्मिक नहींबल्कि गहरे नैतिक और वैचारिक परिवर्तन से ही संभव है।                                                          *वरिष्ठ समीक्षक,लेखक,विचारक,कवि 


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This book is recommended for scholars, students and readers interested in interdisciplinary discussions related to science, society and knowledge traditions.


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