भारतीय सामाजिक चिंतन की परंपरा में गौतम बुद्ध और डॉ. भीमराव अम्बेडकर ऐसे दो विचारक हैं, जिन्होंने अपने-अपने समय में सामाजिक अन्याय, भेदभाव और असमानता के विरुद्ध निर्णायक हस्तक्षेप किया। डॉ. संजय कुमार की पुस्तक ‘बुद्ध, अम्बेडकर और नवबौद्धवाद’ इन्हीं दो महापुरुषों के विचारों को जोड़ते हुए नवबौद्धवाद को सामाजिक न्याय की एक आधुनिक वैचारिक धारा के रूप में प्रस्तुत करती है।
शिक्षा संकाय के एसोसिएट
प्रोफेसर डॉ. संजय कुमार की यह पुस्तक पुस्तक केवल इतिहास का पुनर्पाठ नहीं है, बल्कि भारतीय
समाज की उन गहरी संरचनाओं को समझने का प्रयास है, जिनके कारण
सदियों से एक बड़ा वर्ग हाशिए पर रहा। लेखक स्पष्ट करते हैं कि बुद्ध का धम्म किसी
दैवी चमत्कार का परिणाम नहीं था, बल्कि वह जाति-व्यवस्था,
कर्मकांड, स्त्री-अवमानना और सामाजिक विषमता
के विरुद्ध एक मानवीय और तर्कसंगत प्रतिक्रिया था।
पुस्तक के प्रारंभिक अध्याय
में बुद्ध-पूर्व समाज की सामाजिक और धार्मिक स्थितियों का विश्लेषण करते हुए यह
दिखाया गया है कि किस प्रकार तत्कालीन व्यवस्था आम जन के लिए दमनकारी बन चुकी थी।
बुद्ध का मध्यम मार्ग,
करुणा और विवेक पर आधारित धम्म इसी पृष्ठभूमि से जन्म लेता है। लेखक
बुद्ध को केवल धार्मिक प्रवर्तक नहीं, बल्कि एक सामाजिक
सुधारक और नैतिक क्रांतिकारी के रूप में स्थापित करते हैं।
पुस्तक का अगला महत्वपूर्ण
पड़ाव डॉ. भीमराव अम्बेडकर का सामाजिक दर्शन है। लेखक बताते हैं कि अम्बेडकर ने
जातिवाद, ब्राह्मणवाद और सामाजिक असमानता के विरुद्ध जिस वैचारिक संघर्ष का नेतृत्व
किया, वह आधुनिक भारत की सबसे सशक्त सामाजिक क्रांति है।
अम्बेडकर का बौद्ध धर्म स्वीकार करना किसी धार्मिक भावना से प्रेरित नहीं था,
बल्कि यह सामाजिक मुक्ति और मानवीय गरिमा की पुनर्स्थापना का एक
सोचा-समझा निर्णय था।
नवबौद्धवाद के संदर्भ में
पुस्तक यह स्पष्ट करती है कि यह आंदोलन केवल धर्म परिवर्तन की प्रक्रिया नहीं है।
यह समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व जैसे लोकतांत्रिक मूल्यों पर आधारित एक आधुनिक
मानवतावादी दृष्टि है। हिन्दू, ईसाई और इस्लाम धर्म-दीक्षा
की तुलना में नवबौद्धवाद को लेखक एक ऐसे वैकल्पिक मार्ग के रूप में देखते हैं,
जो व्यक्ति को आत्मसम्मान और सामाजिक बराबरी का बोध कराता है।
डॉ. संजय कुमार की भाषा सरल, प्रवाहपूर्ण
और विचारोत्तेजक है, जिससे यह पुस्तक केवल शोधार्थियों तक
सीमित नहीं रहती, बल्कि सामान्य पाठकों के लिए भी सहज रूप से
पठनीय बन जाती है। यद्यपि समकालीन नवबौद्ध आंदोलनों के जमीनी अनुभवों पर और
विस्तार की गुंजाइश बनी रहती है, फिर भी यह पुस्तक अपने मूल
उद्देश्य में सफल प्रतीत होती है।
कुल मिलाकर, ‘बुद्ध,
अम्बेडकर और नवबौद्धवाद’ सामाजिक न्याय,
समता और मानवीय गरिमा में विश्वास रखने वाले पाठकों के लिए एक
महत्वपूर्ण और विचारोत्तेजक कृति है। यह पुस्तक हमें यह सोचने के लिए प्रेरित करती
है कि सामाजिक बदलाव केवल राजनीतिक या धार्मिक नहीं, बल्कि
गहरे नैतिक और वैचारिक परिवर्तन से ही संभव है।
प्रकाशक-समदर्शी प्रकाशन,गाजियाबाद उ.प्र.
संस्करण- प्रथम 2025
आईएसबीएन-978-93-48073-61-7
मूल्य-340 रूपये

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