कवि इन्द्र कुमार दीक्षित का ग़ज़ल संग्रह ‘आइना’ हिंदी ग़ज़ल जगत में एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप की तरह सामने आता है। यह संग्रह केवल भावुकता या शब्दों के खेल का संसार नहीं रचता, बल्कि समय, समाज और मनुष्य की अनुभूतियों को इतने संयत और पारदर्शी ढंग से अभिव्यक्त करता है कि पाठक अनायास ही उससे जुड़ता चला जाता है। इन्द्र कुमार दीक्षित की ग़ज़लें आधुनिक संवेदनशीलता और शास्त्रीय शिल्प के संतुलन का उत्कृष्ट उदाहरण हैं।
शिल्प और भाषा की नजर से दीक्षित की रचनाओं का सबसे बड़ा गुण—उनकी भाषा—सहज, स्वाभाविक और संप्रेषणीय है। ग़ज़लों में वे अनावश्यक कठिन शब्दों या अलंकारों से बचते हैं। उनकी पंक्तियाँ अनुभव से उपजती हैं, और इसलिए बिना किसी दुरूहता के सीधे पाठक के मन तक पहुँचती हैं।
उदाहरण के रूप में उनकी अभिव्यक्ति अक्सर कुछ इस तरह
होती है—
“चमन में फूल मुस्करायें है
ख्वाब आँखों में उतर आयें हैं।
जिन्दगी बेहतरीन लगने लगी है
महकती संदली हवायें हैं।”
यहाँ हम देखते हैं कि कवि दर्शन भी देता है, और प्रेरणा भी। यह शैली संग्रह में बार-बार
दिखाई देती है—सरल शब्दों में गहरी बात।
‘आईना’ की ग़ज़लों में प्रेम, विरह, आशा-निराशा, जीवन-दर्शन, सामाजिक, राजनैतिक
विडंबनाएँ—इन सबका स्वाभाविक विस्तार है। विशेष बात यह है कि कवि किसी भी भाव को
‘नाटकीय’ नहीं बनाते। भावनाएँ वस्तुतः जीवन की सच्चाइयों से जुड़ी लगती हैं।
कई ग़ज़लों में समाज की विसंगतियाँ और व्यक्ति का
संघर्ष मुखर रूप से सामने आता है। कवि समय के प्रश्नों से मुँह नहीं मोड़ते—
महँगाई ने मारा हमे इतना लपेटकर
मजबूर हैं जीने को चादर समेट कर।
ऐसी पंक्तियाँ यह साबित करती हैं कि दीक्षित केवल
प्रेम के कवि नहीं हैं, बल्कि
यथार्थ के भी सशक्त सर्जक हैं।
भाव-संचालन में संतुलन की दृष्टि से
ग़ज़लें पढ़ते समय यह स्पष्ट होता है कि कवि भावनाओं
को उछालकर पाठक को ‘प्रभावित’ नहीं करना चाहते। वे अनुभवों को ठहराव के साथ
प्रस्तुत करते हैं, जिससे
भाव सहजता से उतरते हैं।
उनकी कई ग़ज़लें पढ़कर लगता है कि कवि जीवन के बहुत
पास खड़ा है, उसे
देखता भी है और समझता भी—
आँधी ये कैसी चल रही है गाँधी के देश में,
जलती अमन की रूह है गाँधी के देश में।
यह सरलता ही कवि के लेखन को ‘जीवन से जुड़ा’ बनाती है।
इन्द्र कुमार दीक्षित की ग़ज़लों में एक विशेष
आत्मीयता है। वे प्रेम में विनम्र हैं, पीड़ा
में धैर्यपूर्ण, और
जीवन-दृष्टि में प्रौढ़। उनकी ग़ज़लों में भावुकता है, पर भावुकतावाद नहीं; संवेदना है, पर सजावटी नहीं।
कवि अपने पाठक के भीतर ‘आह’ नहीं जगाता, बल्कि ‘वाह’ की संभावना रचता है।
‘आईना’ ग़ज़ल लेखन की उस यात्रा का हिस्सा है, जिसमें हिंदी ग़ज़ल अपनी मौलिकता और विशिष्टता स्थापित कर रही है। इन्द्र कुमार दीक्षित इस संग्रह में न केवल अपनी काव्य-प्रतिभा का प्रमाण देते हैं, बल्कि यह भी दिखाते हैं कि ग़ज़ल केवल उर्दू की परंपरा से नहीं आती—यह मनुष्य की संवेदनाओं से उपजती है।यह संग्रह उन लोगों के लिए अनिवार्य पठन है जो ग़ज़ल में भाव, जीवन और भाषा — तीनों की तलाश करते हैं।

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