यूजीसी एक्ट में दलितों, आदिवासियों,
पिछड़ों के साथ सभी वर्गों के दिव्यांगों और महिलाओं की सुरक्षा का
प्रश्न उठा तो केवल उत्तर भारत के सवर्ण विरोध में आंदोलित हो गये इसमें कुछ सवर्ण दिव्यांग
व महिलायें भी थी। न्यायालय के आदेश पर एक्ट
आया था, न्यायलय ने स्टे दे दिया। अब स्टे के खिलाफ दलित, आदिवासी, पिछड़े, वामपंथी,सामाजिक
न्यायवादी छात्र संगठन सड़कों पर आये,जिसमें सवर्ण दिव्यांग
और महिलायें भी शामिल रहीं। सोशल मीडिया पर बहसें तेज हुईं। एक यूट्यूबर पत्रकार
रुचि तिवारी ने एक्ट समर्थकों से जातीय सवाल किया। उसके साथ बदसलूकी हुई,वामपंथी
छात्र संगठन आइसा की नेता नेहा मिश्रा, अंजलि शर्मा पर रुचि तिवारी को धक्का देने
के आरोप में थाने ले जाया गया,जहाँ कुछ एक्ट विरोधी युवाओं
में पुलिस की उपस्थिति में नेहा और अंजलि को गालियाँ दी बदसलूकी की। देखते ही
देखते समाज दो धड़ों में बँट गया। एक पक्ष केवल रुचि तिवारी के साथ खड़ा दिखाई
दिया, दूसरा नेहा मिश्रा और अंजलि शर्मा के साथ। दोनों
पक्षों में से शायद ही कोई ऐसा दिखा जो सिद्धांततः यह कह सके कि किसी भी महिला के
साथ दुर्व्यवहार अस्वीकार्य है—चाहे वह किसी भी विचारधारा की हो। न्याय का प्रश्न
व्यक्ति की विचार और पहचान से छोटा हो गया।
इसी समय जगदलपुर में एक नक्सली कमांडर हिड़मा
मारा जाता है। राज्य की दृष्टि में वह एक हिंसक अपराधी था; कुछ
स्थानीय समुदायों की दृष्टि में वह जल-जंगल-जमीन की लड़ाई का प्रतीक। भूमकाल जैसे
ऐतिहासिक स्मरणोत्सव में उसके सम्मान में गीत गाया जाना प्रशासनिक दृष्टि से
आपत्तिजनक हो सकता है, पर वह इस तथ्य की भी ओर संकेत करता है
कि भारत के भीतर विकास, संसाधन और अधिकार को लेकर गंभीर
असंतोष मौजूद है। किंतु दिल्ली की बहसों में हिड़मा अनुपस्थित है, और बस्तर की पहाड़ियों में रुचि-नेहा-अंजलि के विवाद का कोई अर्थ नहीं।
मानो हम एक देश में रहते हुए भी अनेक समानांतर देशों में विभाजित हो चुके हों।
सबसे अधिक चिंताजनक तथ्य यह है कि हमारे समय का नैतिक विवेक ‘समान संवेदना’ से वंचित होता जा रहा है। जो लोग पत्रकार की स्वतंत्रता और गरिमा की बात करते हैं, वे कभी-कभी राज्य या भीड़ द्वारा की गयी दूसरी ज्यादतियों पर मौन हो जाते हैं। जो लोग वंचित समुदायों की लड़ाई के पक्षधर हैं, वे कभी-कभी असहमति रखने वालों के प्रति असहिष्णु दिखते हैं। यह चयनात्मक आक्रोश लोकतंत्र की आत्मा को कमजोर करता है। लोकतंत्र केवल अपने पक्ष की रक्षा का नाम नहीं है; वह अपने विरोधी के अधिकार की भी रक्षा का नाम है।
सोशल मीडिया ने इस विखंडन को तीव्र कर दिया है। वहाँ एल्गोरिद्म उत्तेजना को पुरस्कृत करते हैं, जटिलता को नहीं। जो कथन अधिक तीखा, अधिक आक्रामक और अधिक विभाजनकारी हो, वही अधिक प्रसारित होता है। परिणामतः बहसें तथ्य पर नहीं, पहचान पर केंद्रित हो जाती हैं। कोई ‘सवर्ण’ है, कोई ‘दलित’, कोई ‘वामपंथी’, कोई ‘राष्ट्रवादी’, कोई ‘शहरी नक्सल’, कोई ‘भाजपाई’—इन लेबलों के बीच व्यक्ति और समस्या दोनों खो जाते हैं। हर समूह अपने-अपने सत्य के भीतर बंद हो जाता है। संवाद की जगह शोर ले लेता है।
प्रश्न यह भी है कि जब शिक्षा और रोजगार का संकट
गहराता जा रहा है, पर्यावरण असंतुलन बढ़ रहा है, कृषि और उद्योग दोनों चुनौतियों से जूझ रहे हैं, अंतरराष्ट्रीय
संबंध जटिल हो रहे हैं, तब समाज का इतना बड़ा हिस्सा
प्रतीकात्मक और तात्कालिक विवादों में क्यों उलझा रहता है? क्या
यह केवल स्वाभाविक भावनात्मक प्रतिक्रिया है, या यह किसी
व्यापक राजनीतिक-सामाजिक संरचना का परिणाम है जो जनता की ऊर्जा को मूल प्रश्नों से
हटाकर पहचान-आधारित संघर्षों में व्यस्त रखती है? विभाजित
समाज कम प्रश्न पूछता है; वह अपने-अपने खेमों में आश्वस्त
रहता है कि उसका पक्ष ही अंतिम सत्य है।
दिशाहीनता तब पैदा होती है जब समाज सामूहिक
उद्देश्य खो देता है। यदि विकास की अवधारणा पर सहमति नहीं, न्याय
की परिभाषा पर विश्वास नहीं, और संवाद की संस्कृति पर भरोसा
नहीं, तो स्वाभाविक है कि हर समूह अपना-अपना देश गढ़ ले।
अपनी-अपनी सभ्यता, अपना-अपना लोकतंत्र, अपनी-अपनी नैतिकता। किंतु राष्ट्र केवल भूगोल का नाम नहीं; वह साझा संवेदना का नाम है। जब यह साझा संवेदना टूटती है, तो घटनाएँ बहस का विषय तो बनती हैं, समाधान का नहीं।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम व्यक्ति-आधारित
प्रतिक्रियाओं से आगे बढ़कर संरचनात्मक प्रश्न पूछें। किसी भी महिला के साथ
दुर्व्यवहार हो,उसका निष्पक्ष प्रतिकार हो। किसी भी समुदाय में असंतोष हो, उसके
कारणों पर गंभीर विमर्श हो। सुरक्षा और अधिकार, विकास और
पर्यावरण, अभिव्यक्ति और उत्तरदायित्व—इन सबके बीच संतुलन
स्थापित करना ही लोकतांत्रिक परिपक्वता है। यदि हम यह संतुलन साधने में असफल रहे,
तो हमारे समय की सबसे बड़ी त्रासदी यह होगी कि हम मुद्दों से नहीं,
एक-दूसरे से लड़ते रहेंगे; और वास्तविक संकट
चुपचाप हमारे भविष्य को निगलता रहेगा।

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