एपस्टीन फ़ाइल्स: सत्ता,दौलत, विज्ञान और न्याय के सवाल

Editor Desk| Eastern Scientist

 एपस्टीन फ़ाइल्स का प्रसंग केवल एक बहुचर्चित आपराधिक मुक़दमे का विस्तार नहीं है; यह आधुनिक सत्ता-संरचनाओं की नैतिक संरचना का परीक्षण है। अमेरिकी वित्तीय कारोबारी Jeffrey Epstein के विरुद्ध लगे आरोप, 2005 से 2019 तक की न्यायिक प्रक्रियाएँ, 2008 का विवादास्पद दलील-समझौता और बाद की पुनः गिरफ़्तारी—ये सभी घटनाएँ मिलकर एक ऐसे तंत्र की ओर संकेत करती हैं जहाँ धन, संपर्क और प्रतिष्ठा न्याय की गति और दिशा को प्रभावित कर सकते हैं।

कानूनी सिद्धांत स्पष्ट है—दोष सिद्धि से पूर्व कोई अपराधी नहीं। परंतु वैज्ञानिक और संस्थागत दृष्टि से प्रश्न यह है कि क्या जाँच की संरचना शक्ति-निरपेक्ष थी? यदि अभियोजन के स्तर पर ही समझौते जाँच की सीमा निर्धारित कर दें, यदि संभावित सह-अभियुक्तों की भूमिका पर व्यवस्थित पड़ताल न हो, तो न्याय की प्रक्रिया औपचारिक तो रहती है, किंतु उसके परिणामों पर भरोसा कमज़ोर पड़ता है।

एपस्टीन प्रकरण का एक महत्त्वपूर्ण आयाम खोजी पत्रकारिता का पुनरुत्थान है। विशेषकर Julie K. Brown की रिपोर्टिंग ने उन महिलाओं की गवाही को सार्वजनिक विमर्श में स्थान दिलाया जो वर्षों तक भय, सामाजिक कलंक और संस्थागत उदासीनता के कारण मौन रहीं। आघात-विज्ञान (trauma studies) यह स्थापित कर चुका है कि यौन हिंसा के बाद बोलने में देरी असामान्य नहीं है; स्मृति, भय और आत्म-सुरक्षा की जटिल प्रक्रियाएँ पीड़िताओं को लंबे समय तक चुप रख सकती हैं। अतः देरी को असत्य का प्रमाण मानना न तो वैज्ञानिक है, न न्यायसंगत।

इस पूरे प्रकरण ने पितृसत्तात्मक शक्ति-संरचना की एक परत भी उजागर की। जब सत्ता, पद और आर्थिक संसाधन पुरुष वर्चस्व के साथ संलयित होते हैं, तब स्त्री की स्वायत्तता को सीमित करने की प्रवृत्ति प्रकट होती है। सामाजिक मनोविज्ञान इसे शक्ति-असंतुलन (power asymmetry) की स्थिति कहता है, जहाँ प्रभावशाली पक्ष के विरुद्ध प्रतिरोध का जोखिम असमान रूप से अधिक होता है।

चिंताजनक यह भी है कि इस तंत्र में कुछ महिलाएँ भी सहभागी रहीं। एपस्टीन की सहयोगी Ghislaine Maxwell को 2021 में नाबालिग लड़कियों को फुसलाने और शोषण में सहयोग के अपराध में दोषी ठहराया गया। यह तथ्य इस बात की पुष्टि करता है कि पितृसत्ता केवल जैविक लिंग का प्रश्न नहीं, बल्कि सत्ता-संबंधों की सामाजिक संरचना है, जिसमें अवसर और लाभ की राजनीति कई स्तरों पर काम करती है।

एपस्टीन फ़ाइल्स का वैश्विक प्रभाव इस कारण भी महत्वपूर्ण है कि यह प्रश्न केवल अमेरिका तक सीमित नहीं है। किसी भी लोकतंत्र की विश्वसनीयता इस बात से मापी जानी चाहिए कि वह वंचितों—विशेषकर महिलाओं और बच्चों—के अधिकारों की रक्षा कितनी प्रभावशीलता से करता है। यदि शक्तिशाली व्यक्तियों के विरुद्ध जाँच पारदर्शी न हो, यदि संस्थाएँ प्रभाव से मुक्त न हों, तो न्याय की अवधारणा सैद्धांतिक रह जाती है।

एक वैज्ञानिक समाज के निर्माण के लिए आवश्यक है कि संस्थाएँ व्यक्ति-निरपेक्ष और डेटा-आधारित निर्णय लें। यौन हिंसा के मामलों में स्वतंत्र जाँच, साक्ष्य-संरक्षण, पीड़ित संरक्षण और सार्वजनिक पारदर्शिता—ये चार स्तंभ किसी भी उत्तरदायी व्यवस्था के आधार हैं। एपस्टीन प्रकरण ने दिखाया कि इन स्तंभों में किसी एक की भी कमजोरी पूरे ढाँचे को संदिग्ध बना देती है।

आधुनिकता का वास्तविक मापदंड आर्थिक प्रगति नहीं, बल्कि नैतिक साहस है—यह साहस कि कोई भी व्यक्ति कानून से ऊपर नहीं। एपस्टीन फ़ाइल्स से उठी माँग—पूर्ण दस्तावेज़ीय पारदर्शिता और संस्थागत जवाबदेही—दरअसल भविष्य के लिए एक संरचनात्मक सुधार का आह्वान है।

चुप्पी तोड़ने वाली महिलाओं का साहस हमें यह स्मरण कराता है कि न्याय केवल अदालतों में नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना में भी निर्मित होता है। यदि लोकतांत्रिक संस्थाएँ इस चुनौती को स्वीकार करती हैं और स्वयं को सुधारती हैं, तभी एक गरिमामय, समान और वैज्ञानिक समाज की परिकल्पना साकार हो सकती है।

— Editor’s Desk, Eastern Scientist

Post a Comment

0 Comments