यूजीसी समानता विनियमों पर रोक हटाने की मांग तेज, एआईएफआरटीई ने उठाए संवैधानिक सवाल

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 यूजीसी समानता विनियमों पर रोक हटाने की मांग तेज, एआईएफआरटीई ने उठाए संवैधानिक प्रश्न नई दिल्ली। उच्च शिक्षा संस्थानों में भेदभाव-निरोधी ढांचे को लेकर बहस एक बार फिर तेज हो गई है। अखिल भारतीय फ़ेडरेशन ऑफ़ राइट टू एजुकेशन (AIFRTE) ने यूजीसी के *उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता के संवर्धन विनियम, 2026 पर लगी रोक को तत्काल हटाने की मांग की है। ये विनियम 13 जनवरी 2026 को अधिसूचित किए गए थे, किंतु Supreme Court of India ने इनके क्रियान्वयन पर यह कहते हुए अंतरिम रोक लगा दी कि वे “विभाजनकारी” प्रतीत होते हैं। एआईएफआरटीई का तर्क है कि यह रोक उच्च शिक्षा में समानता और सामाजिक न्याय के प्रति संवैधानिक प्रतिबद्धता पर प्रश्नचिह्न लगाती है। संगठन का कहना है कि ये विनियम स्वयं सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व निर्देशों के आधार पर तैयार किए गए थे। यह निर्देश 2019 में दायर उस याचिका के संदर्भ में आया था, जिसे Rohith Vemula और Payal Tadvi की माताओं ने दायर किया था। दोनों मामलों ने उच्च शिक्षा परिसरों में जातिगत और संस्थागत भेदभाव के प्रश्न को राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में ला दिया था। एआईएफआरटीई के अनुसार, देशभर के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में जाति, धर्म, जनजाति, भाषा, लिंग और दिव्यांगता के आधार पर भेदभाव की संरचनात्मक समस्याएँ मौजूद हैं। संगठन का दावा है कि पिछले तीन दशकों में निजीकरण और केंद्रीकरण की प्रवृत्तियों ने असमानताओं को और गहरा किया है। ऐसे में समानता-आधारित नियामक ढांचे की आवश्यकता और भी बढ़ जाती है। हालाँकि संगठन ने विनियमों के कुछ प्रावधानों पर चिंता भी व्यक्त की है। विशेष रूप से “इक्विटी एम्बेसडर” और निगरानी समितियों की नियुक्ति प्रक्रिया पर सवाल उठाए गए हैं। एआईएफआरटीई का कहना है कि यदि इन पदों पर नियुक्ति कुलपति के माध्यम से केंद्रीकृत तरीके से होगी, तो शिकायत-निवारण तंत्र की स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है। संगठन ने लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व—जिसमें छात्र, शिक्षक, गैर-शिक्षण कर्मचारी और वंचित समुदायों के सदस्य शामिल हों—की वकालत की है। एआईएफआरटीई का यह भी कहना है कि नियामक ढांचे में कमियाँ होने पर उसे सुधारने की आवश्यकता है, न कि पूरी व्यवस्था को रोक देने की। संगठन के अनुसार, सर्वोच्च न्यायालय की संवैधानिक जिम्मेदारी समानता और गरिमा की रक्षा करना है। भेदभाव से निपटने के प्रयासों को “विभाजनकारी” बताना, असमानता के अनावरण को ही समस्या के रूप में प्रस्तुत करना हो सकता है। उच्च शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह विवाद केवल एक नियामक दस्तावेज़ तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रश्न उठाता है कि विश्वविद्यालयों में शिकायत-निवारण तंत्र कितना स्वतंत्र, प्रतिनिधिक और जवाबदेह होना चाहिए। सामाजिक न्याय के संवैधानिक लक्ष्य को प्रभावी बनाने के लिए संस्थागत संरचनाओं में पारदर्शिता और सहभागी निगरानी को मजबूत करना आवश्यक माना जा रहा है। वर्तमान बहस इस बात का संकेत है कि उच्च शिक्षा में समानता का प्रश्न केवल नीति निर्माण का विषय नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता से भी जुड़ा है। आने वाले समय में न्यायालय, विश्वविद्यालय प्रशासन और नागरिक संगठनों के बीच इस विषय पर व्यापक विमर्श की संभावना है। — News Desk, Eastern Scientist

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