Current Affairs
Date : 24 January 2026
Author : Dr. R. Achal Pulastey
भारतीय विश्वविद्यालय अब ज्ञान -विमर्श, विस्तार, विकास के केन्द्र नहीं, बल्कि वैचारिक गुंडागर्दी के अखाड़े बनते जा रहे हैं।
(कार्टून- एआई निर्मित)
भारतीय विश्वविद्यालय अब ज्ञान -विमर्श, विस्तार, विकास के केन्द्र नहीं, बल्कि वैचारिक गुंडागर्दी के अखाड़े बनते जा रहे हैं। हालिया घटनाएँ—दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय और हैदराबाद विश्वविद्यालय में—इस सड़ांध को उजागर करने के लिए काफी हैं। यह केवल दो कार्यक्रमों का बाधित होना नहीं है; यह उस बौद्धिक पतन का सार्वजनिक प्रदर्शन है, जिसमें तर्क की जगह नारे, संवाद की जगह धमकी और असहमति की जगह दमन ने ले ली है।
गोरखपुर विश्वविद्यालय के भौतिकी विभाग में ब्रह्मांड विज्ञान जैसे शुद्ध वैज्ञानिक विषय पर आयोजित व्याख्यान का हंगामे के कारण स्थगित हो जाना अपने-आप में एक व्यंग्य है। विज्ञान, जो संदेह, प्रश्न और प्रमाण पर खड़ा होता है, वही आज विश्वविद्यालय में “अनुमति-प्राप्त विचार” का मोहताज हो गया है। प्रो. शिबेश कुमार जस जैसे विज्ञान संप्रेषक का विरोध यह साबित करता है कि अब आपत्ति विचार से नहीं, व्यक्ति और उसकी कथित वैचारिक पहचान से है। यह अकादमिक असहमति नहीं, वैचारिक लिंचिंग है।
हैदराबाद विश्वविद्यालय में लेखिका नीरजा माधव के साथ जो हुआ, वह और भी शर्मनाक है। सनातन संस्कृति और थर्ड जेंडर जैसे संवेदनशील और बहुआयामी विषयों पर विचार रखने के लिए उन्हें घेरना, नारे लगाना और डराने की कोशिश करना उस तथाकथित “प्रगतिशील” मानसिकता का असली चेहरा दिखाता है, जो बोलने की आज़ादी का सबसे ज़्यादा शोर मचाती है लेकिन उसे सबसे पहले कुचलती भी है। यहाँ असहमति नहीं, बल्कि वैचारिक शुद्धिकरण (ideological cleansing) की कोशिश दिखाई देती है।
इन दोनों घटनाओं में एक साझा बीमारी है—असहिष्णुता पर एकाधिकार की राजनीति। हर समूह स्वयं को सहिष्णु घोषित करता है और दूसरे को असहिष्णु बताकर चुप कराने का लाइसेंस ले लेता है। विडंबना यह है कि जो स्वयं नारा लगाकर कार्यक्रम बंद कराता है, वही लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की आज़ादी का स्वयंभू रक्षक बना घूमता है। यह बौद्धिक पाखंड नहीं तो और क्या है?
सबसे चिंताजनक भूमिका विश्वविद्यालय प्रशासन की है। कार्यक्रम बंद कर देना, “स्थिति संभालना” और बाद में चुप्पी साध लेना अब एक स्थापित पैटर्न बन चुका है। यह प्रशासनिक कायरता उपद्रवियों को यह स्पष्ट संदेश देती है कि तर्क नहीं, हंगामा जीतेगा। जब शिक्षक और प्रशासन ही अकादमिक स्वतंत्रता की रक्षा नहीं करेंगे, तो विश्वविद्यालय और सड़क के चौराहे में फर्क ही क्या रह जाएगा?
छात्र राजनीति का अर्थ सवाल उठाना है, सवाल दबाना नहीं। विरोध का अधिकार लोकतंत्र की आत्मा है, लेकिन विरोध के नाम पर सुनने से इनकार करना लोकतंत्र की हत्या है। विश्वविद्यालय यदि केवल “सही विचारधारा” के मंच बनेंगे, तो वे शिक्षा संस्थान नहीं, वैचारिक प्रशिक्षण शिविर बनकर रह जाएंगे।
आज भारतीय विश्वविद्यालय एक खतरनाक मोड़ पर खड़े हैं। यहाँ तय किया जा रहा है कि भविष्य का छात्र तर्क करेगा या नारा लगाएगा, बहस करेगा या भीड़ का हिस्सा बनेगा। यदि यह सिलसिला नहीं रुका, तो विश्वविद्यालयों से विद्वान नहीं, केवल शोर पैदा होगा—और शोर कभी भी ज्ञान का विकल्प नहीं हो सकता।
यह समय है कि हम साफ शब्दों में कहें—कैंपस में विचारों की हत्या किसी भी झंडे के नीचे हो, वह अपराध है। यदि विश्वविद्यालयों को बचाना है, तो सबसे पहले इस वैचारिक दादागिरी को बाहर का रास्ता दिखाना होगा। अन्यथा इतिहास हमें ज्ञान के रक्षक के रूप में नहीं, उसके मौन हत्यारों के रूप में याद रखेगा।
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2 Comments
कुछ लोग सुनियोजित तरीके से विश्व विद्यालय को अपनी जागीर बना लिये है। अपने अनुसार, अपनी विचारधारा के लोगों के द्वारा चला रहे हैं। जब परिवार का मुखिया ही विपक्ष विहीन देश का नारा दे तो कार्यकर्ता भी उसी हिसाब से चलेंगे।
दशकों से विश्व विद्यालय में दबंगई और जातिवाद हावी है। आदर्श परिस्थिति, बातें, व्यवहार, व्यवस्था और विचार अब सिर्फ किताबी ज्ञान है।
जय हो