Public Discourse
Date : 23 January 2026
Dr.Achal Pulastey
हमारे देश में बसंत कई चरणों में आता है। जिसकी शुरुआत बसंत पंचमी से सरसो,मटर,तीसी के फूलों से शुरु होता है, अप्रैल में पलास,सेमल,करीर के फूलो से शिखर पर पहुँच जाता है।इसकी खूबसूरती पर प्राचीन कवियों से लेकर वर्तमान तक के कवियों ने बहुत कुछ लिखा है। कोई ऐसा कवि नहीं मिलेगा जिसे बसंत में मोहित न किया हो। लेकिन आज जब जंगल,वन पहाड़ विकास की बलि चढ़ रहे हैं तब बसंत का प्राकृति सौन्दर्य कहाँ रह जायेगा। आने वाली पीढ़ी के पास बसंत किताबों और नेट एआई के दुनिया में मिलेगा।
बसंत पंचमी को लेकर शास्त्रों में जितनी रंगीन कथाएँ हैं, ज़मीन पर उतनी ही फीकी, बिखरी और विरोधाभासी वास्तविकताएँ दिखाई देती हैं। बारीकी से देखें तो आज इस पर्व की स्थिति सांस्कृतिक संक्रमण को रेखांकित करती है—जहाँ परम्पराएँ, मिथक, आधुनिकता और बाज़ार एक-दूसरे में इस तरह गड्डमगड्ड हो चुके हैं कि किसी का मूल स्वरूप पहचान में नहीं आता।
शास्त्रीय परम्परा में बसंत पंचमी केवल एक तिथि नहीं, बल्कि एक ऋतु-चक्र का उत्सव है। पौराणिक परम्परा के अनुसार यह पर्व सरस्वती पूजा से आरम्भ होकर मदनोत्सव में परिणत होता है, जो फाल्गुन पूर्णिमा तक चलता है। बाणभट्ट, कालिदास, दंडी और वात्स्यायन तक के ग्रंथों में बसंत जीवन, प्रेम, संगीत और प्रकृति के उन्मुक्त उत्सव के रूप में उपस्थित है। कालिका पुराण की कथा में कामदेव का पुनर्जन्म बसंत पंचमी के दिन होने बात से यह ऋतु काम और सृजन का प्रतीक बन जाता है।
परन्तु भोजपुरिया गँवईं संस्कृति की बसंत पंचमी शास्त्रीय भव्यता से भिन्न है।
यहाँ बसंत पंचमी किसी देवी के पुनर्जन्म से अधिक खेती-किसानी का संकेतक पर्व है—नवान या नेवान। यह नई फसल के दाने आने का उत्सव है, ऋतु परिवर्तन की सूचना है। भोजपुरी और मिजो संस्कृति में यह समानता उल्लेखनीय है कि दोनों में बसंत का सम्बन्ध कृषि से है, न कि मूर्ति-स्थापना या बाज़ार से। मिजोरम का चपचार कूट हो या भोजपुरी अंचल का नेवान—दोनों सामूहिक श्रम, नृत्य और उत्सव की परम्परा से जुड़े रहे हैं।
फर्क यहाँ से शुरू होता है।
मिजो समाज में—ईसाई धर्म अपनाने के बावजूद—पारम्परिक पर्व आज भी सामूहिक रूप से, समान विधि से और पूरे समाज की भागीदारी के साथ मनाए जाते हैं। वहाँ पर्व टूटे नहीं हैं, बदले नहीं हैं, बेचे नहीं गए हैं। शायद इसी कारण 100 प्रतिशत साक्षरता के आँकड़े किसी देवी की कृपा नहीं, बल्कि सामाजिक प्रतिबद्धता का परिणाम हैं।
इसके विपरीत यहाँ बसंत पंचमी जातीय, आर्थिक और शैक्षणिक विभाजन का दर्पण बन गई है। सबसे अशिक्षित और हाशिये पर पड़े पिछड़ी-दलित जातियों को टोलो में सरस्वती की मूर्तियाँ हैं, डीजे हैं, अश्लील गीत हैं। जबकि अपेक्षाकृत शिक्षित, समृद्ध टोलो में यह पर्व लगभग अनुपस्थित हैं। यह विडंबना केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक है।
सरस्वती—जो कभी केवल विद्यालयों और विद्या-केंद्रों तक सीमित थीं—अब श्रमिक बस्तियों में पहुँची हैं, पर शिक्षा वहाँ नहीं पहुँची। देवी आई है, पर किताब नहीं। मूर्ति है, पर स्कूल बंद हैं। बंगाल से आए मूर्तिकारों ने बाज़ार खड़ा कर लिया है, पर गाँव की लोकधुन फगुआ गायन लगभग समाप्त हो चुका है। हिन्दू कलैण्डर संवत के अंतिम महिने का प्रतीक सम्हत(संवत) गाड़ने की परम्परा भी अब केवल औपचारिकता बन गई है।
यह बदलाव केवल धार्मिक नहीं, मीडिया-प्रेरित सांस्कृतिक उपभोग का परिणाम है, जहाँ लोकपर्व शास्त्रीय मिथकों में डूब गए हैं और शास्त्र बाज़ार में बिकने लगे हैं। सामूहिकता टूट चुकी है; पर्व अब गाँव का नहीं, मोहल्लों का मामला है।
और सबसे तीखा प्रश्न यहीं खड़ा होता है।
यदि सरस्वती विद्या की देवी हैं, तो गरीब छात्रों, महिलाओं और वंचित वर्गों की शिक्षा में उनकी भूमिका कहाँ है? शिक्षा को महँगा कर देने वाली सरकारों को वह शाप क्यों नहीं देतीं? जिन संस्कृतियों में सरस्वती जैसी देवी नहीं हैं, वहाँ साक्षरता अधिक क्यों है?
शायद इसलिए कि शिक्षा देवी की कृपा से नहीं, सामाजिक इच्छाशक्ति से आती है। देवियाँ प्रतीक होती हैं—व्यवस्था का विकल्प नहीं। जब पर्व कर्मकांड बन जाए, और शिक्षा बाज़ार—तो सरस्वती भी मौन हो जाती हैं।
इसलिए बसंत पंचमी को केवल पूजा का दिन नहीं, आत्ममंथन का अवसर होना चाहिए—कि हम ऋतु का उत्सव मना रहे हैं या अपनी सांस्कृतिक स्मृति का श्राद्ध। वास्तविक बसंत तभी आएगा, जब खेत-बाग बागीचो के साथ-साथ स्कूल भी हरे होंगे।
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