सूर्योपासना नहीं शक्ति उपासना है छठ पर्व

Culture

Date : 24 October 2025

Author : Dr. R. Achal Pulastey


About the Section

Culture reflects the collective memory, traditions and creative expressions of society. It includes literature, art, folklore, knowledge systems and everyday practices that shape human identity and social values.

संस्कृति समाज की सामूहिक स्मृति, परम्पराओं और सृजनात्मक अभिव्यक्तियों का प्रतिबिम्ब होती है। इसमें साहित्य, कला, लोकपरम्पराएँ, ज्ञान प्रणालियाँ तथा दैनिक जीवन की वे सभी प्रथाएँ शामिल होती हैं, जो मानव की पहचान और सामाजिक मूल्यों को आकार देती हैं।


शाक्त सम्प्रदाय ही एक ऐसा सम्प्रदाय हैजो सैंधव सभ्यता से लेकर शास्त्र के बजाय लोकपरम्परा में आज तक लोकप्रिय है।बिहार से निकल कर छठी पूजा अब राष्ट्रीय ही नहीं अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आ चुका है। 40 साल पहले के इस विशुद्ध लोक पर्व को अब विद्वत जनों द्वारा सूर्योपासना निश्चित कर दिया गया है पर इसके बावजूद लोक में छठी मैया की ही पूजा होती है। इस पूजा में सूर्य को अर्ध्य देने के कारण सूर्योपासना का भ्रम होना स्वभाविक ही है।

 डॉ. आर अचल पुलस्तेय




भारत में सूर्य पूजा की परम्परा वैदिक काल से ही मिलती है। वैदिक काल में आदित्य को ब्रह्म का स्थान प्राप्त था। सूर्य को सर्वशक्तिमान मानकर उपासना का सौर्य सम्प्रदाय भी बन गयी। परन्तु कालान्तर में वैष्णवशैव सम्प्रदायों के प्रसार व विकास के कारण सूर्य की गणना देवगण में होने लगी। इसी तथ्य को आधार बना कर इस पर्व को सूर्योपासना पर्व कहा जाने लगा है। 

इस क्रम में आने वाले दिनों में यह पर्व मात्र सूर्योपासना पर्व ही रह जायेगा। आज भी विद्वानों के समुदाय के लिये यह है हीजबकि सूर्य का कार्तिक शुक्ल षष्टी तिथि से किसी संबंध का कोई साक्ष्य नहीं मिलता है। परन्तु लोकविश्वास इतना प्रबल होता है कि वह तमाम वाद-विवादोंक्रान्तियोंपरिभाषाओं के बावजूद अपनी मौलिकता को बनाये रखती है।

 कुछ विद्वानों ने छठपर्व की जड़ में पहुंचने के प्रयास में यह भी विचार दे दिया है कि यूरेशिया या शाक द्विप के आये ब्राह्मणों से यह पूजा शुरु की गयी पर यह बात इसलिए सटीक नही लगती है कि छठी पूजा में पुरोहितो की कोई भूमिका होती ही नहीं हैइसमें महिलायें या व्रत करने वाले सभी परम्पराओं को स्वयं या स्वैच्छिक रूप से करते है।

इसी संस्कृति मंत्र की भी कोई जरूरत नहीं होती हैलोकगीत ही मंत्र की तरह प्रयुक्त होते हैं। पूजन सामग्री या पूजन विधि सब लोक परम्परा द्वारा निर्धारित हैन कि किसी शास्त्र के अनुसार। यही वह कारण भी हैजो इस पर्व को खासकर महिलाओं व अवर्ण जातियों में लोकप्रिय करता जा रहा है। भारत की उपासना पद्धतियों में शाक्त सम्प्रदाय ही एक ऐसा सम्प्रदाय हैजो सैंधव सभ्यता से लेकर आज तक शास्त्र के बजाय लोकपरम्परा में लोकप्रिय है।

 आज भले ही यह लोक परम्परा भी शास्त्रीय कर्मकाण्डों में उलझती दिख रही होफिर भी गाँव की काली माईडीह बाबाशीतला मातासमय माताबंजारी मातागंगा माईसरजू माईभैरव बाबायोगीवीर बाबादानोवीर बाबा आदि-आदि की पूजा लोकपरम्परा के अनुसार ही होती हैन कि किसी शास्त्रीय विधि-विधान के अन्तर्गत।

 शक्ति लोकउपासना है छठ पर्व

छठ उपासना इसी परम्परा का पर्व है। शक्ति उपासना मूलतः दश महाविद्याओं के उपासना पर आधारित हैजो प्राचीनतम् व मौलिक शक्तियाँ हैंजिन्हें क्रमशः 1.काली 2.तारा 3.भुवनेश्वरी 4.त्रिपुरसुन्दरी 5.त्रिपुरभैरवी 6.छिन्नमस्ता 7.धूमावती 8.बगलामुखी 9.मातंगी 10.कमला कहा गया है। ये शक्तियाँ प्रथम शक्ति काली की ही काल भेद है।





उपासक स्वयं अपनी रीति-नीतिश्रद्धा-विश्वास के अनुसार पूजा कर लेता है। इस लोक परम्परा के उपासना पद्धति पर अभिजात विद्वानों द्वारा अंधविश्वास कहकर आलोचना भी की जाती हैपर लोक है कि मानता नहीं। अपने विश्वास व आस्था को सैधव काल से लेकर आज तक सामयिक बदलाओं के साथ टिका हुआ है।छठ उपासना इसी परम्परा का पर्व है। शक्ति उपासना मूलतः दश महाविद्याओं के उपासना पर आधारित हैजो प्राचीनतम् व मौलिक शक्तियाँ हैंजिन्हें क्रमशः 1.काली 2.तारा 3.भुवनेश्वरी 4.त्रिपुरसुन्दरी 5.त्रिपुरभैरवी 6.छिन्नमस्ता 7.धूमावती 8.बगलामुखी 9.मातंगी 10.कमला कहा गया है। ये शक्तियाँ प्रथम शक्ति काली की ही काल भेद है। शक्ति उपासकों के अनुसार काली ही शून्य का विस्तार कर जगत् के रूप में स्वयं का विस्तार करती है। यह पृथक व विस्तृत विषय है पर यहाँ छठ पर्व पर बात की जा रही है। यह सर्वविदित है कि बिहारबंगालअसमउड़िसा शक्ति उपासना की भूमि रही है। इस संदर्भ में देखे तो दीपावली दिन प्रथम शक्ति काली के पूजा का आरम्भ किया जाता है जो छठवीं शक्ति छिन्नमस्ता की पूजा कर उपासना का समापन किया जाता है।

 कालान्तर में दीपावली को भगवान राम व बुद्धजैन से जोड़ दिया गयाजिससे शाक्त साम्प्रदाय की उपासना परम्परा नेपथ्य में चली गयी। इसके बावजूद निश्चित क्षेत्रोंबंगालबिहारउड़िसाअसमकाली पूजा व छठ पूजा परम्पराओं मे जीवित हैजो समय के साथ आज विस्तार की ओर अग्रसर है। कालान्तर में दीपावली को भगवान राम व बुद्धजैन से जोड़ दिया गयाजिससे शाक्त साम्प्रदाय की उपासना परम्परा नेपथ्य में चली गयी। 

इसके बावजूद निश्चित क्षेत्रोंबंगालबिहारउड़िसाअसमकाली पूजा व छठ पूजा परम्पराओं मे जीवित हैजो समय के साथ आज विस्तार की ओर अग्रसर है।

 छठ पूजा के संदर्भ में चतुर्थ शक्ति त्रिपूरसुन्दरी द्वारा हाथ में ईखगन्ना का धनुष धारण करना छठी माता की ओर संकेत करता है क्योंकि छठ पूजा में गन्ने का विशेष महत्व है। अन्य किसी देवी-देवता के ईख का कोई संबंध नहीं मिलता है। इस प्रकार यह पर्व चतुर्थी से षष्ठीछठ तक पूरा होने का तात्पर्य 4.त्रिपुरसुन्दरी 5.त्रिपुर भैरवी 6.छिन्नमस्ता की पूजा की जाती है। इन तीनों शक्तियों का स्वरूप सूर्य के तेज के जैसे ही वर्णित हैजैसे त्रिपुरसुन्दरी का बालार्करुणतेजसांबाल अरुण के तेज जैसे त्रिपुरभैरवी का उद्दभानु सहस्रकांतिम्हजारों उगते सूर्य की कांति व छिन्नमस्ता… भास्वद्भास्करमंडलम्… तरुणार्ककोटिविलसतेजः (उगते हुए सूर्यमंडल में करोड़ो तरुणसूर्यों के तेज से युक्त) यह सिद्ध करता है कि सूर्य मंडल में इन्हीं शक्तियों की उपासना छठीछठवीं छिन्नमस्ता) मईया के रूप में की जाती है।

 छिन्नमस्ता… भास्वद्भास्करमंडलम् (उगते हुए सूर्यमंडल में… करोड़ों तरुणसूर्यों के तेज से युक्त) यह सिद्ध करता है कि सूर्य मंडल में इन्हीं शक्तियों की उपासना छठी (छठवीं-छिन्नमस्ता) मईया के रूप में की जाती है। पूरे देश में झारखण्ड के हजारीबाग (पूर्व में बिहार) जिले में रजरप्पा नामक स्थान पर छठवीं महाविद्या छिन्नमस्ता का इकलौता मूल पीठ है। यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि छठ पूजा के लिए जो वेदी बनायी जाती हैवह महाविद्याओं की उपासना में प्रयुक्त श्रीयंत्र की ही आकृति का होता है। अंततः छठ पूजा सूर्य पूजा न होकर मूलतः महाविद्याओं के रुप में शक्तिउपासना का लोकपर्व है। लोक व्यवहार ही क्रमबद्ध-लिपिबद्ध होकर शास्त्र बन जाता है।

 छठ मईया को सूर्य पूजा कहते रहोविवेचना-आलोचना करते रहो पर लोकमानस को कोई फर्क नहीं पड़तावह अपनी उत्सवधर्मिता बनाये रखेगाछठ मईया के गीत गा गा कर प्रकृति ने जो कुछ उसे दिया हैउसे प्रकृति को समर्पित करता रहेगाअनिश्चित जीवन में जीजिविषा बनाये रखेगाआनन्दित होने के कुछ क्षण खोज ही लेगा।

छठ मईया को सूर्य पूजा कहते रहोविवेचना-आलोचना करते रहो पर लोकमानस को कोई फर्क नहीं पड़तावह अपनी उत्सवधर्मिता बनाये रखेगाछठ मईया के गीत गा गा कर प्रकृति ने जो कुछ उसे दिया हैउसे प्रकृति को समर्पित करता रहेगाअनिश्चित जीवन में जीजिविषा बनाये रखेगाआनन्दित होने के कुछ क्षण खोज ही लेगा। पर अरुणाचल प्रदेश की आपातानी जनजाति के लोग सूर्य को माँ ही कहते हैचन्द्रमा को पिता उनकी भाषा में सूरज दोन्यी (माँ) चन्द्रमा (पोलो) पिता है। बात पते की हैधरती पर जीवन सूरज से ही प्रसवित है माँ है छठि मईया है। बिहार का यह विश्वास अब अखिल भारतीय ही नही वैश्वविक होने की ओर है …छठि मईया की जय हो !!!

 संदर्भ : प्राचीन भारतीय- धर्म और दर्शन -डॉ श्रीकान्त पाठकऋग्वेदशाक्तप्रमोदकुलार्णवतंत्र

(*लेखक-लोकअध्येता,कवि,विचारक,कथाकार एवं ईस्टर्न साइंटिस्ट के मुख्य संपादक है।)

#छठव्रत,


Culture Archive
Related Articles
 


Post a Comment

0 Comments