AI समिट-2026 हमारी नीतिगत खामियों का दस्तावेज

Editor's Desk| Eastern Scientist
 पिछले वर्ष फरवरी में फ्रांस में आयोजित AI समिट-2025 में विश्व के राष्ट्राध्यक्ष आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस की दिशा, नियंत्रण और भविष्य पर गंभीर विमर्श के लिए एकत्र हुए थे। वहाँ AI के उपयोग और दुरुपयोग, उसके सामाजिक-आर्थिक प्रभाव, श्रम बाज़ार पर पड़ने वाले परिणाम, लोकतंत्र और सूचना-प्रणाली पर उसके असर तथा संभावित खतरों पर ठोस चर्चा हो रही थी। विकसित देश इस प्रश्न से जूझ रहे थे कि AI को कैसे विनियमित किया जाए ताकि वह मानवता के लिए उपयोगी बने, विनाशकारी नहीं।
लेकिन  इस समिट में भारत की चर्चा जिस कारण से हुई, वह न तो तकनीकी था और न नीतिगत। चर्चा का केंद्र बन गया एक कूटनीतिक दृश्य, फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों द्वारा नरेंद्र मोदी से हाथ न मिलाने की घटना। उसी क्रम में उर्सुला वॉन डेर लेयेन के हस्तक्षेप की बात सुर्खियों में रही। जबकि दुनिया में AI गवर्नेंस की संरचना उपयोग और खतरे की बात हो रही थी। इसी समय भारत की मीडिया सोसल मीडिया ही नहीं नेता,अफसर,प्रोफेसर,जनता कुम्भ नहा रही थी,धर्म ज्वार में बह रही थी। यह विडंबना मात्र नहीं, हमारी बौद्धिक प्राथमिकताओं का संकेत है।
देश पहले से ही धार्मिक आयोजनों, सांस्कृतिक उत्सवों और राजनीतिक बहसों में उलझा रहता है। कभी मस्जिद के नीचे मंदिर खोजता है, कभी कुम्भ, काँवर, रामनवमी,ईद, दशहरा के जुलूस में व्यस्त रहता है। ऐसे में AI जैसा जटिल और दीर्घकालिक प्रश्न सार्वजनिक विमर्श से बाहर रह जाता है। सच यह है कि भारत की बड़ी आबादी AI को रील बनाने,फोटो एडिट करने,लेख,भाषण तैयार करने,गेम खेलने आदि से अधिक नहीं समझती है। मोबाइल फोन में किसी चैटबॉट या ऐप का उपयोग AI की वास्तविक शक्ति को नहीं है। AI का अर्थ है डेटा पर नियंत्रण, एल्गोरिद्मिक निर्णय-प्रक्रिया, स्वायत्त प्रणालियाँ, रक्षा और अर्थव्यवस्था में रणनीतिक बढ़त है।
आज अमेरिका वैश्विक AI प्लेटफ़ॉर्म, उन्नत चिप निर्माण और क्लाउड अवसंरचना पर प्रभावी नियंत्रण रखता है। चीन राज्य-समर्थित निवेश और स्वदेशी मॉडल के सहारे प्रतिस्पर्धा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। भारत की स्थिति इसके विपरीत उपभोक्ता की है—हम तकनीक का उपयोग करते हैं, पर उसके मूल ढाँचे के निर्माता नहीं हैं। यदि AI की कमान अन्य देशों के पास होगी, तो हमारे डेटा  पर उन्हीं देशों कब्जा होगा। ऐसी स्थिति राष्ट्र की सम्प्रभुता स्वतंत्रता का कोई मतलब नहीं रह जायेगा। हम एडवांस एआई सम्पन्न देशों के उपनिवेश बन कर रह जायेगे।
इसी पृष्ठभूमि में 2026 में भारत में आयोजित होने वाला AI समिट अत्यंत महत्वपूर्ण अवसर हो सकता था। किंतु आयोजन से जुड़ी अव्यवस्थाएँ और निजी संस्थानों द्वारा विदेशी तकनीकों को अपनी खोज के रूप में प्रस्तुत करने की दुष्टता धृष्टता में मटियामेट कर दिया ।


नीजी क्षेत्र के गोलगोटिया यूनिवर्सिटी द्वारा चीनी रोबोडॉग या कोरियाई ड्रोन को अपनी खोज बताना यह केवल संस्थागत त्रुटि नहीं बल्कि वैश्विक मंच पर देश की विश्वसनीयता संकट खड़ा करता है।
वैज्ञानिक सम्मेलन प्रशासनिक प्रबंधन से नहीं, अकादमिक अनुशासन से संचालित होते हैं। किसी भी मॉडल, शोधपत्र या उत्पाद को प्रस्तुत करने से पहले विशेषज्ञ समिति की स्वीकृति आवश्यक होती है। विश्वविद्यालयों और शीर्ष तकनीकी संस्थानों के पास ऐसी प्रक्रियाओं का अनुभव और संरचना होती है। इस महत्वपूर्ण आयोजन का दायित्व शैक्षणिक संस्थानों के बजाय नौकरशाही और निजी ठेकेदार कंपनियों को सौंपना बड़ी नीतिगत भूल थी। जिसका परिणाम सामने है।
इस मामले में स्थिति अधिक गंभीर इसलिए है क्योंकि उच्च शिक्षा और शोध के क्षेत्र में दीर्घकालिक नीतिगत संकट है। अनियंत्रित निजीकरण के कारण शिक्षा मुनाफाखोरी का साधन बन रही है। सरकारी विश्वविद्यालय वैचारिक संघर्षों और संसाधन-संकट से जूझ रहे हैं। शोध-वृत्तियाँ सीमित हो रही हैं, बजट घटाए जा रहे हैं, और शीर्ष संस्थानों-भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, एनबीआरआई, सीडीआर - आई, एम्स,आईआईटी,एनआईटी जैसे संस्थान में वर्षों से फैकल्टी पद रिक्त पड़े हैं। वीसी,निदेशकों की नियुक्तियाँ योग्यता के बजाय विशेष संबंधों पर हो रहे है। जो शोध-अकेडिमिक माहौल के बनाने के बजाय वही काम करते है, जिससे उनकी नियुक्ति में सहयोग करने वाला प्रसन्न रहे।ऐसे वातावरण में AI नेतृत्व का दावा व्यंग बन जाता है
यदि भारत को AI में गंभीरता से भागीदारी करनी है, तो उसे शोध-वित्त, स्वायत्त विश्वविद्यालयी वातावरण, पारदर्शी अकादमिक प्रक्रियाएँ और दीर्घकालिक तकनीकी अवसंरचना पर निवेश बढ़ाना होगा। अन्यथा एआई समिट जैसे आयोजन केवल औपचारिकता बनकर रह जाएँगे, और भारत वैश्विक तकनीकी संरचना का उपभोक्ता बना रहेगा। यह समय प्रतीकों पर बहस का नहीं, संरचनात्मक सुधारों का है। यदि हम अभी भी प्राथमिकताओं को नहीं बदलते, तो AI क्रांति हमारे सामने से गुजर जाएगी—और हम केवल दर्शक बने रह जायेंगे। AI समिट-2026 हमारे लिए उपलब्धि नहीं, बल्कि हमारी नीतिगत खामियों, आधी-अधूरी तैयारी सार्वजनिक दस्तावेज बन जायेगा।

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