Book Review
Date : Februeary 08. 2026
समीक्षक : अचल पुलस्तेय
दुर्गा पाण्डेय की कृति अश्वत्थ की छाँव समकालीन हिन्दी साहित्य में जीवन-स्मृति, संवेदना और संघर्ष के त्रिवेणी-संगम के रूप में सामने आती है। यह पुस्तक मात्र आत्मकथात्मक आख्यान नहीं, बल्कि एक स्त्री की दृष्टि से परिवार, समाज, शिक्षा और रचनात्मकता के बीच बने रिश्तों का गहन दस्तावेज है।
पुस्तक का अनुक्रम ही इसके वैचारिक विस्तार का संकेत देता है। प्रथम खण्ड—खुलती परतें से लेकर पंचम खण्ड—ममता की अक्षय निधि तक लेखिका जीवन के विविध स्तरों को परत-दर-परत खोलती चलती हैं। ‘खुलती परतें’ आत्मचिन्तन और स्मृति-उद्घाटन कराता है, जहाँ जीवन के आरम्भिक अनुभव, संघर्ष और आत्मनिर्माण की प्रक्रिया पाठक के सामने आती है। द्वितीय खण्ड—सात बीघा जमीन में भूमि केवल भौतिक सम्पत्ति नहीं, बल्कि जड़ों, श्रम, परिवार और सामाजिक यथार्थ का रूपक बनकर उभरती है। यह खण्ड ग्रामीण जीवन, श्रम-संस्कृति और स्त्री-अनुभवों की सजीव प्रस्तुति का संकेत देता है।
तृतीय खण्ड—मिश्र संसार में लेखिका का दृष्टिकोण और व्यापक होता है। यहाँ परिवार, समाज, शिक्षा-जगत और साहित्यिक परिवेश एक-दूसरे से संवाद करते दिखते हैं। यह खण्ड जीवन की जटिलताओं, विरोधाभासों और सह-अस्तित्व की कथा है। चतुर्थ खण्ड—इन्द्रधनुष के रंग शीर्षक ही संकेत करता है कि यहाँ भावनात्मक विविधता, स्त्री-जीवन के अनेक रंग, आशा-निराशा, सफलता-विफलता—सब एक साथ उपस्थित हैं। अन्ततः पंचम खण्ड—ममता की अक्षय निधि पुस्तक का भावनात्मक शिखर है, जहाँ मातृत्व, करुणा, त्याग और निरन्तर देने वाली स्त्री-शक्ति का मार्मिक चित्र उभरता है।
प्राक्कथन में लेखिका के जीवन-संघर्ष और प्रेरणा-स्रोतों की झलक मिलती है। अपने प्रियजन के जीवनवृत्त को शब्दों में ढालना जितना कठिन कार्य है, उतनी ही संवेदनशीलता और ईमानदारी से दुर्गा पाण्डेय ने इसे सम्भव किया है। प्राक्कथन से स्पष्ट होता है कि यह रचना निजी स्मृतियों से निकलकर सामाजिक अनुभव बनती है। पिता के जीवन, उनके बौद्धिक-सांस्कृतिक योगदान और पारिवारिक परिवेश ने लेखिका की रचनात्मक चेतना को जिस प्रकार आकार दिया है, वह इस पुस्तक की आत्मा है।
शैली की दृष्टि से अश्वत्थ की छाँव सरल, प्रवाहपूर्ण और आत्मीय भाषा में लिखी है। यहाँ न तो अनावश्यक अलंकारिकता है, न ही बौद्धिक दुरूहता। लेखिका का गद्य अनुभव-सिद्ध है—जीया हुआ, भोगा हुआ और सच्च है। शीर्षक में निहित ‘अश्वत्थ’ भारतीय सांस्कृतिक परम्परा में दीर्घायु, आश्रय और निरन्तरता का प्रतीक है; उसी की ‘छाँव’ में यह पुस्तक जीवन को देखने-समझने का आमंत्रण देती है।
समग्रतः अश्वत्थ की छाँव एक संवेदनशील स्त्री-आत्मकथा, पारिवारिक स्मृति-ग्रन्थ और सामाजिक दस्तावेज—तीनों का संतुलित रूप है। यह पुस्तक उन पाठकों के लिए विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है जो स्त्री-अनुभव, ग्रामीण-सांस्कृतिक जीवन और आत्मीय गद्य में रुचि रखते हैं। दुर्गा पाण्डेय की यह कृति निश्चय ही हिन्दी साहित्य में अपनी शांत, गहरी और दीर्घकालिक उपस्थिति दर्ज कराती है।
पुस्तक- अश्वत्थ की छाँव, लेखिका- दुर्गा पाण्डेय
प्रकाशक- श्री दीप प्रकाशन गोरखपुर
मूल्य- 300 रूपये, संस्करण- 2025
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समीक्षक परिचय
डॉ. अचल पुलस्तेय एक समकालीन बहुविषयक विद्वान, सशक्त लेखक, चिंतक, कवि और समीक्षक हैं। उनका लेखन सामाजिक यथार्थ और मानवीय चेतना के गहन विश्लेषण के लिए जाना जाता है।
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