दुनिया के देशों में गरीबी को मुख्यतः आर्थिक अभाव के रूप में समझा जाता है—आय की कमी, रोज़गार का संकट और बुनियादी सुविधाओं तक सीमित पहुँच। लेकिन भारत में गरीबी का अर्थ इससे कहीं अधिक व्यापक और जटिल है। यहाँ गरीबी केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक और धार्मिक भी है। यह वह संरचनात्मक यथार्थ है, जो सदियों से भारतीय समाज को आकार देता आया है और आज़ादी के बाद भी पूरी तरह समाप्त नहीं हो सका।
भारतीय सामाजिक व्यवस्था में प्राचीन काल से स्त्रियों तथा समाज के बहुसंख्यक वर्गों—दलित, आदिवासी और पिछड़े समुदायों—को शिक्षा, ज्ञान, सम्मान और सत्ता से व्यवस्थित रूप से दूर रखा गया। यह वंचना किसी व्यक्तिगत असफलता का परिणाम नहीं, बल्कि सामाजिक नियमों और धार्मिक मान्यताओं द्वारा वैध ठहराई गई व्यवस्था थी। इसी ऐतिहासिक अन्याय की पृष्ठभूमि में स्वतंत्र भारत के संविधान ने समानता को केवल औपचारिक अधिकार न मानकर, वास्तविक भागीदारी का लक्ष्य बनाया। आरक्षण इसी दृष्टि से एक सुधारात्मक और लोकतांत्रिक व्यवस्था है, न कि कोई अस्थायी रियायत।
आरक्षण को केवल आर्थिक कसौटी पर सीमित करने की
माँग दरअसल भारतीय समाज की सामाजिक सच्चाइयों से मुँह मोड़ने जैसा है। यदि गरीबी
केवल आर्थिक होती, तो आर्थिक समृद्धि के साथ सामाजिक सम्मान
स्वतः प्राप्त हो जाता। पर भारत का अनुभव इसके ठीक उलट है। यहाँ अनेक बार आर्थिक
रूप से सक्षम होने के बावजूद व्यक्ति को उसकी जाति या धार्मिक पहचान के कारण
सामाजिक स्वीकार्यता और सम्मान नहीं मिलता। सार्वजनिक जीवन में घटित अपमानजनक
घटनाएँ इस तथ्य को उजागर करती हैं कि सामाजिक और धार्मिक भेदभाव आज भी गहरे पैठे
हुए हैं।
इस व्यापक संदर्भ में प्रस्तावित यूजीसी एक्ट पर चल रही बहस को देखना आवश्यक है। यह कानून केवल विश्वविद्यालयों के प्रशासनिक ढाँचे या वित्तीय व्यवस्था तक सीमित मामला नहीं है, बल्कि उच्च शिक्षा में सामाजिक न्याय, स्वायत्तता और प्रतिनिधित्व के भविष्य से सीधे जुड़ा हुआ प्रश्न है। यूजीसी के बढ़ते केंद्रीकरण, नियुक्ति प्रक्रियाओं पर नियंत्रण और अनुदान को शर्तों से जोड़ने जैसे प्रावधान इस आशंका को जन्म देते हैं कि विश्वविद्यालय धीरे-धीरे लोकतांत्रिक और समावेशी चरित्र खो सकते हैं।
भारतीय समाज में उच्च शिक्षा हमेशा से वंचित समुदायों के लिए सामाजिक गतिशीलता का सबसे सशक्त माध्यम रही है। विश्वविद्यालय केवल ज्ञान उत्पादन के केंद्र नहीं, बल्कि बराबरी और आत्मसम्मान के निर्माण की जगह भी होते हैं। यदि यूजीसी एक्ट के माध्यम से शिक्षा को अधिक बाज़ारोन्मुख, सत्ता-निर्भर और केंद्रीकृत बनाया गया, तो इसका सबसे बड़ा नुकसान उन्हीं समुदायों को होगा, जिनके लिए शिक्षा ऐतिहासिक बहिष्करण से बाहर निकलने का रास्ता रही है।
विडंबना यह है कि आज़ादी के 77 वर्षों बाद भी शासन-प्रशासन, न्यायपालिका, शिक्षा, व्यापार और मीडिया जैसे प्रभावशाली
क्षेत्रों में सामाजिक और धार्मिक विविधता पर्याप्त रूप से दिखाई नहीं देती। यह
स्थिति किसी संयोग का परिणाम नहीं, बल्कि संरचनात्मक असमानता
का संकेत है। यदि उच्च शिक्षा नीति भी इसी असंतुलन को मज़बूत करती है, तो लोकतंत्र का आधार ही कमज़ोर पड़ता है।
भारत को आज केवल आर्थिक सुधारों की नहीं,
बल्कि सामाजिक चेतना और नीति-नियामक संकल्प की आवश्यकता है। शिक्षा
नीतियों में स्वायत्तता, विविधता और सामाजिक न्याय को
केंद्रीय मूल्य बनाना होगा। यूजीसी एक्ट पर बहस दरअसल इस बड़े प्रश्न की परीक्षा
है कि क्या भारतीय लोकतंत्र बहुलता और समान भागीदारी की दिशा में आगे बढ़ेगा,
या ऐतिहासिक असमानताओं को नए क़ानूनी ढाँचों में सुरक्षित करेगा।
सच्ची समानता वही है, जहाँ
अवसर के साथ सम्मान भी सुनिश्चित हो। जब तक गरीबी को उसके सामाजिक और धार्मिक
संदर्भों में समझकर उससे निपटने का साहस नहीं किया जाएगा, तब
तक आज़ादी का वादा अधूरा ही रहेगा।
ंमुख्य संपादक

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