धर्म का राजनीतिकरण: साधना से भक्ति तक की यात्रा

अचल पुलस्तेय (स्वतंत्र विचारक,लेखक,कवि,कथाकार)

यह लेख धर्म के उस समकालीन स्वरूप का आलोचनात्मक विश्लेषण करता है, जिसमें कर्मकाण्ड और भक्ति को धर्म का केंद्रीय तत्त्व बना दिया गया है, जबकि साधना और आध्यात्मिक चेतना को व्यवस्थित रूप से हाशिये पर धकेल दिया गया है। लेख का तर्क है कि धर्म का यह भक्तिपरक और कर्मकाण्डीय रूप सत्ता तथा बाज़ार के लिए एक प्रभावी वैचारिक उपकरण में परिवर्तित हो चुका है, जो आज्ञाकारिता, हीनता-बोध और सामाजिक अनुकूलन को प्रोत्साहित करता है। भक्ति के माध्यम से अवतारवाद और पैग़म्बरवाद जैसी संरचनाएँ विकसित होती हैं, जो धार्मिक आस्था को राजनीतिक वैधता में रूपांतरित करती हैं और उत्पीड़न को नैतिक तथा दैवी औचित्य प्रदान करती हैं। इसके विपरीत साधना को एक ऐसी आध्यात्मिक प्रक्रिया के रूप में स्थापित किया गया है, जो व्यक्ति के स्वत्व, विवेक और स्वतंत्रता को विकसित करती है तथा ऐतिहासिक रूप से सत्ता-विरोधी चेतना के रूप में उभरती रही है। लेख यह निष्कर्ष प्रस्तुत करता है कि समकालीन धर्म, साधना से कटकर, मुक्ति की प्रक्रिया न रहकर आज्ञाकारिता के उत्पादन की संरचना में बदलता जा रहा है।-संपादक

धर्म–सत्ता–भक्ति और साधना

धर्म को सामान्यतः एक स्थिर, पवित्र और निर्विवाद संरचना के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, जबकि ऐतिहासिक यथार्थ यह है कि सभी धर्म बहुस्तरीय, परिवर्तनशील और सामाजिक शक्तियों से गहरे प्रभावित रहे हैं। धर्म का सबसे प्रत्यक्ष और संगठित पक्ष—कर्मकाण्ड—समय, भूगोल और संस्कृति के साथ निरंतर रूप बदलता रहा है। इसी कारण एक धर्म के कर्मकाण्ड दूसरे धर्मों में स्थानांतरित होते दिखाई देते हैं। इसके बावजूद कर्मकाण्ड को ही धर्म का केन्द्रीय और निर्णायक स्वरूप मान लिया गया है।

कर्मकाण्ड के समानांतर प्रत्येक धर्म में एक आध्यात्मिक आयाम भी विद्यमान रहता है, जो बाह्य आचरण से अधिक आंतरिक अनुशासन, नैतिक विवेक और मानवीय संवेदना पर आधारित होता है। यह वह साझा बिंदु है जहाँ विभिन्न धर्मों की सीमाएँ धुँधली हो जाती हैं। किंतु यही आध्यात्मिक चेतना सत्ता और बाज़ार के लिए सबसे अधिक असुविधाजनक सिद्ध होती है, क्योंकि वह व्यक्ति को बाहरी नियंत्रण से मुक्त करने की संभावना रखती है।

कर्मकाण्ड सत्ता के लिए उपयोगी इसलिए होते हैं क्योंकि वे सामूहिक पहचान, अनुशासन और आज्ञाकारिता का निर्माण करते हैं। राजनीति इन्हीं के माध्यम से धर्म को एक प्रभावी औज़ार में बदलती है। कर्मकाण्ड धार्मिक प्रतीकों, उत्सवों और भय-आस्था के मिश्रण से जनसमूह को नियंत्रित करने का साधन बन जाते हैं। इसके विपरीत आध्यात्मिक चेतना व्यक्ति को भीतर की ओर मोड़ती है और सत्ता, परंपरा तथा संस्थाओं पर निर्भरता को कम करती है। इसलिए सत्ता और बाज़ार कर्मकाण्ड के प्रसार को संरक्षण देते हैं, जबकि आध्यात्मिक चेतना के विस्तार से स्वाभाविक रूप से भयभीत रहते हैं।

आध्यात्मिकता के भीतर भी दो प्रवृत्तियाँ स्पष्ट रूप से देखी जा सकती हैं—भक्ति और साधना। भक्ति प्रायः आत्म-विसर्जन की प्रक्रिया के रूप में प्रस्तुत की जाती है, किंतु व्यवहार में वह अनेक बार हीनता-बोध में परिवर्तित हो जाती है। यह हीनता केवल किसी अदृश्य ईश्वर तक सीमित नहीं रहती, बल्कि मूर्त, सांसारिक और राजनीतिक सत्ता तक विस्तृत हो जाती है। इसी बिंदु पर अवतारवाद और पैग़म्बरवाद का उदय होता है, जहाँ विशिष्ट व्यक्तियों को दैवी मध्यस्थ के रूप में स्थापित कर दिया जाता है। आगे चलकर इन्हीं के नाम पर धार्मिक और राजनीतिक सत्ताएँ खड़ी होती हैं।

अवतारों और पैग़म्बरों के प्रति अंधभक्ति समाज को आलोचनात्मक विवेक से वंचित कर देती है। प्रजा आज्ञाकारिता को धर्म मानने लगती है और उत्पीड़न को भी दैवी योजना या ऐतिहासिक अनिवार्यता के रूप में स्वीकार कर लेती है। इस अवस्था में अन्याय के विरुद्ध प्रतिरोध न केवल कमजोर पड़ता है, बल्कि उसे अधार्मिक या राष्ट्रविरोधी तक घोषित कर दिया जाता है। भक्ति, जो मूलतः प्रेम और समर्पण का भाव थी, सत्ता के हाथों में नियंत्रण का उपकरण बन जाती है।

इसके विपरीत साधना आत्म-विकास की वह प्रक्रिया है, जो व्यक्ति के स्वत्व, विवेक और स्वतंत्रता को केन्द्रीय महत्व देती है। साधना किसी बाहरी सत्ता या मध्यस्थ को अंतिम सत्य के रूप में स्वीकार नहीं करती। वह अनुभव, आत्मानुशासन और सतत प्रश्नाकुलता पर आधारित होती है। यही कारण है कि साधना परंपराएँ इतिहास में बार-बार सत्ता से टकराती रही हैं—चाहे वे धार्मिक संस्थाएँ हों या राजनीतिक शासन। साधना व्यक्ति को प्रजा नहीं, नागरिक बनाती है; अनुयायी नहीं, प्रश्नकर्ता।

समकालीन विश्व में धर्म का जो स्वरूप अधिक प्रचलित है, वह साधना का नहीं, बल्कि भक्ति का है। धर्म मुक्ति की प्रक्रिया बनने के बजाय अनुकूलन और समर्पण की संरचना में बदलता जा रहा है। संभवतः यही कारण है कि आज उत्पीड़न केवल सहन ही नहीं किया जाता, बल्कि उसे धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक गौरव के आवरण में स्वीकार भी किया जा रहा है। जब धर्म साधना से कटकर भक्ति तक सीमित हो जाता है, तब वह मनुष्य को स्वतंत्र नहीं, बल्कि आज्ञाकारी बनाता है।


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Politics-धर्म और सत्ता, धार्मिक राजनीति, वैचारिक वर्चस्व, आज्ञाकारिता, राजनीतिक वैधता, उत्पीड़न

Sociology-कर्मकाण्ड, सामूहिक पहचान, हीनता-बोध, सामाजिक नियंत्रण, जनसमूह, सांस्कृतिक अनुकूलन

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