ऊर्जा संप्रभुता का शंखनाद: जीवाश्म ईंधन की गुलामी से मुक्ति का मार्ग

Editorial Analysis
Published: April 19, 2026 | Editor in Chief

Energy Transition: A Strategic Imperative for India and the Developing World

The global debate surrounding renewable energy often centers on the issue of "reliability," with critics arguing that the intermittency of solar and wind necessitates a permanent reliance on fossil fuels. However, current geopolitical upheavals—most notably the escalating conflict in the Gulf region—reveal that fossil fuels are themselves fundamentally unreliable. The phenomenon of "Fossilflation" demonstrates how dependence on oil and gas exposes developing economies like India to severe inflationary shocks and fiscal instability whenever regional tensions arise.

Unlike the oil crisis of the 1970s, the world now possesses mature alternatives. Solar energy costs have plummeted 500-fold, and technologies like EVs, green hydrogen, and advanced battery storage are no longer pipe dreams but market realities. For India, transitioning to clean energy is not merely an environmental goal but a cornerstone of strategic autonomy. With initiatives like the National Green Hydrogen Mission and decentralized solar schemes, India is positioning itself to move from an energy importer to a global production hub.

We are currently in a volatile "Mid-Transition" phase, navigating through "Greenflation" (rising costs of green tech due to demand) and "Climateflation" (economic costs of extreme weather). Yet, the path forward is clear. By scaling up climate technologies, developing nations can shield themselves from the whims of global oil markets. For the Global South, the shift toward renewables is the only viable route to decoupling economic growth from geopolitical vulnerability, ensuring a secure, carbon-neutral, and self-reliant future.

अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि सौर और पवन ऊर्जा जैसे विकल्प जलवायु परिवर्तन का स्थायी समाधान नहीं हो सकते क्योंकि उनकी प्रकृति निरंतर नहीं है। ऊर्जा विमर्श के वैश्विक मंचों पर आलोचकों का एक वर्ग निरंतर यह दावा करता है कि चूंकि सूर्य रात में नहीं चमकता और हवा सदैव प्रवाहित नहीं होती, इसलिए मानवता को अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए अंततः जीवाश्म ईंधन (Fossil Fuels) के भरोसे ही रहना होगा। किंतु, वर्तमान वैश्विक भू-राजनीतिक घटनाक्रम और बदलता पर्यावरण इस धारणा पर एक गंभीर प्रश्नचिह्न लगाते हैं कि जीवाश्म ईंधन वास्तव में कितने विश्वसनीय और सुरक्षित हैं। हाल के महीनों में ईरान और खाड़ी क्षेत्र में बढ़ते सैन्य संघर्ष ने एक बार फिर वैश्विक ऊर्जा परिदृश्य को अस्थिर कर दिया है, जिससे कच्चे तेल की कीमतों में अभूतपूर्व उछाल आया है। यह अस्थिरता सिद्ध करती है कि जीवाश्म ईंधन पर हमारी निर्भरता न केवल पर्यावरणीय संकट पैदा कर रही है, बल्कि यह हमारी आर्थिक संप्रभुता को भी गंभीर जोखिम में डाल रही है।

28 फरवरी की घटनाओं के बाद उत्पन्न ऊर्जा संकट ने 'फॉसिलफ्लेशन' (Fossilflation) की अवधारणा को पुन: रेखांकित किया है। यह शब्द उस स्थिति को स्पष्ट करता है जहाँ जीवाश्म ईंधन की आपूर्ति में आने वाली बाधाएं और उनकी अस्थिर कीमतें सीधे तौर पर वैश्विक मुद्रास्फीति को बढ़ाती हैं। भारत जैसे विकासशील देशों के लिए, जो अपनी तेल आवश्यकताओं का लगभग 80 प्रतिशत से अधिक आयात करते हैं, यह संकट सीधा आर्थिक प्रहार है। जब भी खाड़ी क्षेत्र में तनाव बढ़ता है, भारत का राजकोषीय घाटा और घरेलू बाजार में वस्तुओं की कीमतें अनियंत्रित होने लगती हैं। ऐसे में यह प्रश्न प्रासंगिक हो जाता है कि क्या हम वास्तव में एक ऐसे ऊर्जा स्रोत को 'विश्वसनीय' कह सकते हैं, जिसकी उपलब्धता और कीमत किसी दूसरे क्षेत्र के युद्ध या राजनीतिक अस्थिरता पर टिकी हो?

आज की स्थिति 1970 के दशक के तेल संकट से बुनियादी रूप से भिन्न है। उस दौर में नवीकरणीय ऊर्जा की तकनीकें अपने प्रारंभिक चरण में थीं और सौर ऊर्जा की लागत आज की तुलना में 500 गुना अधिक थी। वर्तमान में हमारे पास न केवल परिपक्व सौर और पवन तकनीकें हैं, बल्कि बैटरी स्टोरेज, हीट पंप और इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs) का एक सशक्त पारिस्थितिकी तंत्र भी तैयार हो चुका है। यद्यपि जीवाश्म ईंधन से पूर्णतः विमुख होने की यात्रा में 'ग्रीनफ्लेशन' (Greenflation) जैसी चुनौतियां आ रही हैं—जहाँ हरित उपकरणों की भारी मांग के कारण उनकी कीमतों में अस्थायी वृद्धि देखी जाती है—तथापि यह जीवाश्म ईंधन के स्थायी संकट की तुलना में कहीं अधिक प्रबंधनीय है। इसके अतिरिक्त, 'क्लाइमेटफ्लेशन' (Climateflation) के रूप में हमें मौसम की उन मारों को भी झेलना पड़ रहा है जो सीधे तौर पर हमारी खाद्य सुरक्षा और अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर रही हैं।

भारत के संदर्भ में यह ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) केवल एक पर्यावरणीय प्रतिबद्धता नहीं, बल्कि एक रणनीतिक अनिवार्यता है। भारत ने 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता हासिल करने का जो महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है, वह इसी दिशा में एक बड़ा कदम है। भारत सरकार की 'पीएम सूर्य घर: मुफ़्त बिजली योजना' जैसे प्रयास ऊर्जा उत्पादन के विकेंद्रीकरण का बेहतरीन उदाहरण हैं। जब ऊर्जा का उत्पादन नागरिक के अपने घर की छत पर होगा, तो वह न केवल ग्रिड पर दबाव कम करेगा बल्कि अंतरराष्ट्रीय तेल संकटों के प्रभाव से भी मुक्त रहेगा। यह आत्मनिर्भरता ही भारत के आर्थिक भविष्य की नींव है।

तकनीकी नवाचार के क्षेत्र में 'राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन' (National Green Hydrogen Mission) भारत की सबसे बड़ी उम्मीद बनकर उभरा है। हरित हाइड्रोजन के माध्यम से उन भारी उद्योगों को कार्बन-मुक्त करना संभव होगा, जिन्हें अब तक बिजली से सीधे जोड़ना एक चुनौती थी। यदि भारत हरित हाइड्रोजन के उत्पादन और वैश्विक निर्यात का केंद्र बनने में सफल रहता है, तो यह सदियों पुरानी उस व्यवस्था को बदल देगा जहाँ ऊर्जा के लिए दुनिया केवल कुछ चुनिंदा 'तेल संपन्न' देशों पर निर्भर थी। भारत के लिए यह अवसर है कि वह 'ग्लोबल साउथ' (Global South) का नेतृत्व करे और एक ऐसा विकास मॉडल प्रस्तुत करे जो न केवल प्रगतिशील हो बल्कि स्थायी भी हो। हम इस समय ऊर्जा संक्रमण के एक जटिल दौर यानी 'मिड-ट्रांजिशन' से गुजर रहे हैं। यह वह समय है जहाँ पुरानी व्यवस्था ढह रही है और नई व्यवस्था अभी पूरी तरह स्थापित नहीं हुई है। यद्यपि परिवहन क्षेत्र में आज भी तेल का बड़ा हिस्सा खर्च होता है, लेकिन नॉर्वे जैसे देशों का अनुभव और भारत में बढ़ती इलेक्ट्रिक वाहनों की पैठ यह बताती है कि यह बदलाव अब अपरिहार्य है। 'ईस्टर्न साइंटिस्ट' का यह सुदृढ़ मानना है कि जीवाश्म ईंधन की युग-संधि अब निकट है। विकासशील देशों के लिए यह समय नीतिगत साहस दिखाने का है। हमें यह समझना होगा कि भविष्य उन राष्ट्रों का है जो अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं के लिए प्रकृति के शाश्वत स्रोतों का दोहन करने में सक्षम होंगे। अंततः, जलवायु अनुकूल तकनीकों में निवेश ही वह एकमात्र मार्ग है, जो हमें वैश्विक संघर्षों के आर्थिक झटकों से बचा सकता है और एक स्थिर व समृद्ध भविष्य की गारंटी दे सकता है।

Cite as:
Achal, R. (2026). Energy Transition: A Strategic Imperative for India and the Developing World. Eastern Scientist, 1(34). Available at: https://www.easternscientist.in/2026/04/_19.html

Dr. R. Achal

डॉ. आर. अचल पुलस्तेय

Editor-in-Chief, Eastern Scientist

Multidisciplinary scholar focusing on socio-economic transitions and geopolitical shifts in the Eastern hemisphere.

ORCID iD: 0009-0002-8240-2689

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