संख्या की सियासत बनाम संघीय न्याय: किसके पक्ष में है नया परिसीमन ?

Public Discourse
Published: April 17, 2026 डाँ.चतुरानन ओझा

Politics of Numbers vs Federal Justice: Who Does the New Delimitation Favor?

The article argues that India’s democracy, traditionally rooted in diversity and balanced representation, is at risk of shifting toward majoritarianism. The proposed delimitation based on the 2011 Census—especially when linked with women’s reservation—raises concerns about political power being increasingly determined by population size alone. It highlights a structural imbalance: states that have performed better in economic development, human development, and population control may lose political influence, while less developed but more populous states could gain greater dominance in Parliament. This, the article suggests, could distort federal balance and weaken the principle of equitable representation. The piece also questions the logic of increasing parliamentary seats, arguing that the issue is not the number of representatives but their accountability and effectiveness. Ultimately, it warns that if democracy becomes purely number-driven, it risks losing its foundational values of justice, balance, and inclusivity, and may slide into institutionalized majoritarianism.

भारत का लोकतंत्र इस भ्रम में नहीं जीता था कि संख्या ही सत्य है। वह संतुलन से चलता था—संख्या, संवैधानिकता और सामाजिक न्याय के बीच एक नाजुक समझौता। लेकिन अब यह संतुलन टूट रहा है। और इसे तोड़ने का औजार भी बड़ा चतुर है—महिला आरक्षण के नाम पर प्रस्तावित परिसीमन।

यहाँ सवाल महिला आरक्षण का नहीं है। उस पर तो कोई बहस ही नहीं होनी चाहिए—वह ऐतिहासिक अन्याय का देर से दिया गया उत्तर है। असली सवाल यह है कि क्या इस न्याय को एक ऐसे राजनीतिक गणित में बदला जा रहा है, जहाँ लोकतंत्र की आत्मा को संख्या के नीचे दबा दिया जाए? 2011 की जनगणना के आधार पर सीटों का पुनर्निर्धारण सुनने में जितना तकनीकी लगता है, असल में उतना ही राजनीतिक है। यह सिर्फ सीटों का बँटवारा नहीं, सत्ता के नक्शे का पुनर्लेखन है। और इस नक्शे में एक बात साफ दिखती है—जो जितना अधिक, वही उतना शक्तिशाली। तो क्या अब लोकतंत्र का अर्थ यह रह जाएगा कि जिसने जनसंख्या बढ़ाई, वही सत्ता पर दावा मजबूत करेगा? और जिन्होंने शिक्षा, स्वास्थ्य और जनसंख्या नियंत्रण में निवेश किया, वे अपने ही अनुशासन की सज़ा भुगतेंगे? यह विडंबना नहीं, एक खतरनाक संकेत है। आज जिन राज्यों ने देश की अर्थव्यवस्था को थाम रखा है, जो कर राजस्व का बड़ा हिस्सा देते हैं, जो मानव विकास के पैमानों पर आगे हैं—उन्हीं को राजनीतिक रूप से कमजोर करने की जमीन तैयार हो रही है। दूसरी ओर, जिन क्षेत्रों में विकास की रफ्तार धीमी रही है, वहाँ संख्या के सहारे सत्ता का वजन और बढ़ेगा।

क्या यही संघीय न्याय है? या यह संघीय ढांचे को संख्या की राजनीति के हवाले करने की शुरुआत है? सच तो यह है कि संसद में सीटें बढ़ाने का यह पूरा तर्क ही खोखला है। देश को अधिक सांसद नहीं, अधिक जवाबदेह सांसद चाहिए। आज की संसद में कितने प्रतिनिधि हैं जो अपनी पार्टी लाइन से हटकर अपने क्षेत्र की वास्तविक समस्याएँ उठा पाते हैं? कितने हैं जिनकी आवाज़ सत्ता के शोर में दबती नहीं?

संसद बहस का मंच कम, निर्देशों का मंच अधिक बन चुकी है। ऐसे में 300 नए सांसद जोड़ देने से क्या बदलेगा—सिर्फ खर्च बढ़ेगा, या लोकतंत्र मजबूत होगा? जनता के पैसे से लोकतंत्र का विस्तार नहीं, उसका प्रदर्शन किया जा रहा है। गाँव गोद लेने जैसी योजनाएँ इसका जीता-जागता उदाहरण हैं—घोषणाएँ बड़ी, परिणाम नगण्य। यदि मौजूदा प्रतिनिधि ही जवाबदेही नहीं निभा पा रहे, तो संख्या बढ़ाने का तर्क किसके हित में है?

दरअसल, यह पूरा खेल “प्रतिनिधित्व” का नहीं, “वर्चस्व” का है। यह लोकतंत्र के भीतर बहुसंख्यावाद को संस्थागत रूप देने की प्रक्रिया है। और यह प्रक्रिया जितनी शांत दिखती है, उतनी ही गहरी है। हालाँकि जरूरी नहीं है इसका फायदा एक ही दल को हो, दूसरा दल भी इसका फायदा उठा सकता है। पर कोई उठाये,नुकासान तो लोकतंत्र और लोक का ही होना है। बहुमत लोकतंत्र की शर्त है, लेकिन बहुसंख्यावाद उसका विकृति रूप है। जब संख्या ही नीति तय करने लगे, और संतुलन, न्याय, विविधता—ये सब हाशिये पर चले जाएँ, तब लोकतंत्र धीरे-धीरे अपना अर्थ खो देता है। यह बहस सीटों की नहीं, चरित्र की है। यह तय करेगी कि भारत एक संतुलित संघीय लोकतंत्र बना रहेगा या संख्या-प्रधान सत्ता संरचना में बदल जाएगा। अगर आज यह सवाल नहीं पूछा गया, तो कल पूछने का अधिकार भी शायद संख्या के अनुपात में बाँट दिया जाएगा।

Cite as:
Ojha,C. (2026). Politics of Numbers vs Federal Justice: Who Does the New Delimitation Favor?. Eastern Scientist, II(34). Available at: https://www.easternscientist.in/2026/04/blog-post_17.html

Dr. Chaturanand Ojha

डॉ. चतुरानन ओझा

सामाजिक-राजनैतिक कार्यकर्ता, लेखक, विचारक, सह-संयोजक — समान शिक्षा अधिकार मंच, उत्तर प्रदेश यूनिट


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