डॉ. आर. अचल पुलस्तेय*
(आयुष मंत्रालय, भारत सरकार के अधीन NEIAH, शिलांग; 22–23 फ़रवरी 2018, "स्वास्थ्य सेवा प्रबंधन में आयुर्वेद एवं योग की भूमिका" विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी, की-नोट प्रस्तुति)
Issue-33 Vol.-IV, Oct.-Dec 2025 Paper ID-33/2
सारांश
यह लेख आयुर्वेद की दार्शनिक पृष्ठभूमि, ऐतिहासिक विकास, समकालीन चुनौतियों तथा भविष्य की संभावनाओं का समग्र विश्लेषण प्रस्तुत करता है। आयुर्वेद का मूल आधार प्रकृति, जलवायु और देशकाल है। पृथ्वी के विभिन्न भूभागों में सूर्य, जल, वायु और ताप के अनुसार जीवन-शैली और चिकित्सा पद्धतियाँ विकसित हुईं। आयुर्वेद ने जलवायु अनुसार जांगल, आनूप और सामान्य देश का वर्गीकरण किया और आहार-विहार तथा रोग प्रवृत्तियों से जोड़ा।
लेख में यह रेखांकित किया गया है कि चिकित्सा विज्ञान आस्था पर नहीं, बल्कि प्रयोग और परिणाम पर आधारित सतत प्रक्रिया है। आचार्य चरक, सुश्रुत, नागार्जुन और अगस्त जैसे आचार्यों ने सामाजिक-प्राकृतिक आवश्यकताओं के अनुसार आयुर्वेद को समृद्ध किया। समकालीन संदर्भ में चुनौतियाँ—एलोपैथी का प्रभुत्व, आयुर्वेद को वैकल्पिक मानना, कौशल आधारित प्रशिक्षण की कमी—उल्लेखनीय हैं। जीवन-शैली जनित रोगों में आयुर्वेद, योग और अन्य आयुष पद्धतियाँ प्रभावी सिद्ध हो रही हैं।
English Abstract
This paper presents a comprehensive analysis of Ayurveda’s philosophical foundations, historical development, contemporary challenges, and future possibilities. Ayurveda is rooted in nature, climate, and desh–kāl (place and time). Variations in sunlight, water, air, and temperature have shaped lifestyles and medical systems. Major challenges include its perception as an “alternative” system and dominance of allopathy. Lifestyle disorders such as diabetes, hypertension, stress, neurological and gynecological conditions respond well to Ayurveda, Yoga, and AYUSH practices. Evidence-based integration, disease-specific specialties, and rural healthcare inclusion can enhance national and global health contributions.
Keywords
Ayurveda, AYUSH, Traditional Medicine, Desh–Kāl (Place and Time), Climate and Health, Lifestyle Diseases, Preventive Healthcare, Integrative Medicine, Evidence-Based Ayurveda, Rural Healthcare, Antibiotic Resistance, Public Health System, Medical Pluralism, Indigenous Knowledge Systems, Sustainable Healthcare
भूमिका
पृथ्वी के विभिन्न भूभाग में सूर्य, जल, वायु और ताप के अनुसार जीव जगत और मानव जीवन-शैली विकसित हुई। जलवायु अनुसार वनस्पति, खान-पान और रहन-सहन की शैली विकसित हुई। इसी प्रयास को जीवन शैली व संस्कृति कहा जाता है। आयुर्वेद का उद्भव भारतीय परिप्रेक्ष्य में हुआ और इसे आचार्यों ने जांगल्यदेश (शुष्क), आनूपदेश (जलीय/पर्वतीय), सामान्य देश में वर्गीकृत किया। वर्तमान जीवन शैली प्राकृतिक क्रम के विपरीत होने के कारण रोग प्रवृत्ति बदल रही है और आयुर्वेद में भी आधुनिक संदर्भानुसार बदलाव आवश्यक है।
आचार्य एवं चिकित्सा परंपरा
- आचार्य चरक: उत्तर भारत, हिमालयी वनौषधियों पर आधारित चिकित्सा।
- आचार्य सुश्रुत: शल्यचिकित्सा विशेषज्ञ, युद्धकालीन घायलों के लिए शल्य विधा।
- आचार्य नागार्जुन: अकाल के समय धातु भस्मों का औषधीय प्रयोग।
- महर्षि अगस्त: दक्षिण भारत, समुद्र तटीय क्षेत्र में सिद्ध चिकित्सा।
- हिप्पोक्रेटिज: यूनानी चिकित्सा, पारंपरिक ज्ञान संग्रह।
- सेमुअल हनीमैन: सूक्ष्म तत्वों द्वारा होम्योपैथी।
आयुर्वेद की चुनौतियाँ
आयुष चिकित्सा वैकल्पिक पद्धति मानी जाती है, जबकि एलोपैथी मुख्यधारा है। जीवन शैली जनित रोगों (मधुमेह, उच्च रक्तचाप, तनाव, स्नायु एवं स्त्री रोग) में आयुर्वेद, योग और अन्य आयुष चिकित्सा प्रभावी हैं। आयुर्वेदिक औषधियाँ त्वरित प्रभाव प्रदान करती हैं (3–5 दिन में लाभ)। स्नातकों को कौशल, अभ्यास और रोग विशेष अध्ययन आवश्यक है। ग्रामीण क्षेत्रों में चिकित्सक अनुपात कम और स्वास्थ्य संस्थानों की कमी प्रमुख चुनौती है। एंटीबायोटिक दवा का अवैध उपयोग और रोगाणुरोधी प्रतिरोध भी आयुर्वेद की प्रासंगिकता बढ़ाते हैं।
आयुर्वेद की संभावनाएँ
देश की आबादी और ग्रामीण–शहरी वितरण के अनुसार, यदि 8.5 लाख आयुष चिकित्सक शामिल हों तो रोगी–चिकित्सक अनुपात WHO मानक से बेहतर हो सकता है। औषधीय वनस्पतियों और रिसर्च आधारित उत्पादों में व्यापक संभावनाएँ हैं। विदेशों में जीवनशैली रोगों के लिए आरोग्य केंद्र स्थापित करना आवश्यक है। समाज में फैली भ्रांतियों को दूर करना, रोग विशेषज्ञ इकाइयाँ विकसित करना और जनविश्वास बढ़ाना आयुर्वेद के विकास के लिए महत्वपूर्ण है। अन्य विज्ञान शाखाओं के सहयोग से आयुर्वेद को वैश्विक स्तर पर प्रभावी बनाया जा सकता है।
संदर्भ
- चरक संहिता
- सुश्रुत संहिता
- आयुष मंत्रालय, भारत सरकार (2022–23)
- NMC, भारत (2023)
- British Journal of Clinical Pharmacology (एंटीबायोटिक प्रतिरोध संबंधी अध्ययन)

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