संपादकीय विमर्श -1/ 2025 : विकास का उत्सव या वैश्विक असमानताओं का विस्तार ?


 Issue-33 Vol.-IV, Oct.-Dec 2025 

प्रगति का प्रश्न और सत्ता की छाया


वर्ष 2025 को यदि केवल उपलब्धियों और आँकड़ों की सूची के रूप में देखा जाए, तो यह विज्ञान, प्रौद्योगिकी और रचनात्मकता का एक असाधारण वर्ष प्रतीत होता है। अंतरिक्ष विज्ञान ने ब्रह्मांड की आरंभिक गहराइयों तक झाँकने का साहस किया, जीवन विज्ञान ने जीन-संपादन को प्रयोगशालाओं से बाहर लाकर मानव उपचार तक पहुँचाया, कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने ज्ञान-उत्पादन की गति और दिशा दोनों को बदल दिया, और साहित्य ने भाषाई तथा सांस्कृतिक सीमाओं को लांघते हुए वैश्विक मंच पर नए संवाद रचे।

जहाँ वैज्ञानिक उपलब्धियाँ मानव के सुखद भविष्य का दावा करती हैं, वहीं सत्ता, युद्ध और बाज़ार नई असमानताओं की  संरचना रचते दिखाई देते हैं। 

-अचल पुलस्तेय   

इन सबके बीच “विकास” एक उत्सवधर्मी शब्द के रूप में बार-बार दोहराया गया—सरकारी घोषणाओं में, कॉरपोरेट रिपोर्टों में, और अंतरराष्ट्रीय मंचों के भाषणों में। परंतु आलोचनात्मक दृष्टि से प्रश्न यह नहीं है कि विकास हुआ या नहीं, बल्कि यह है कि यह विकास किसके लिए हुआ, किसके नियंत्रण में रहा, और इसके सामाजिक–राजनीतिक परिणाम क्या रहे।

क्या 2025 की वैज्ञानिक और सांस्कृतिक प्रगति मानवता को अधिक समता मूलक, न्यायपूर्ण और संवेदनशील विश्व की ओर ले जाती है? या फिर यह नई प्रकार की वैश्विक असमानताओं, तकनीकी वर्चस्व, और सांस्कृतिक प्रभुत्व को और गहरा करती है?

यह लेख 2025 को केवल उपलब्धियों का वर्ष मानने से इनकार करता है। यह उसे ज्ञान, सत्ता और समाज के जटिल अंतर्संबंधों के संदर्भ में परखने का प्रयास है—जहाँ हर प्रगति अपने साथ एक नया प्रश्न भी लेकर आती है।

1. विज्ञान और प्रौद्योगिकी : उपलब्धि बनाम पहुँच

1.1 अंतरिक्ष विज्ञान : ब्रह्मांड की खोज, पृथ्वी की अनदेखी?

James Webb Space Telescope द्वारा अत्यंत प्राचीन गैलेक्सी MoM z14 की खोज और Vera C. Rubin Observatory की ‘First Light’ उपलब्धियाँ मानव जिज्ञासा और तकनीकी क्षमता की पराकाष्ठा हैं। ये खोजें न केवल ब्रह्मांड की उत्पत्ति और संरचना को समझने में सहायक हैं, बल्कि यह भी दिखाती हैं कि मानव ज्ञान किस स्तर तक विस्तारित हो चुका है।परंतु यहाँ एक बुनियादी विरोधाभास उभरता है। जब अरबों डॉलर अंतरिक्ष अभियानों में निवेश किए जा रहे हैं, उसी समय पृथ्वी पर जलवायु संकट, खाद्य असुरक्षा, जल संकट और स्वास्थ्य असमानताएँ और गहरी होती जा रही हैं। अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका के बड़े हिस्से आज भी बुनियादी वैज्ञानिक सुविधाओं से वंचित हैं।

यह प्रश्न इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह विज्ञान की दिशा और प्राथमिकताओं को लेकर है। क्या विज्ञान केवल जिज्ञासा-प्रेरित अन्वेषण है, या उसे मानवीय संकटों के प्रति उत्तरदायी भी होना चाहिए?

2025 में अंतरिक्ष विज्ञान की उपलब्धियाँ जितनी चमकदार हैं, उतनी ही वे इस प्रश्न को भी तीखा बनाती हैं कि पृथ्वी की समस्याएँ अब भी “द्वितीयक” क्यों मानी जा रही हैं।

 1.2 जीवन विज्ञान और चिकित्सा : उपचार की क्रांति या जैव-विशेषाधिकार?

2025 में जीवन विज्ञान ने जिस तेज़ी से प्रगति की, उसने चिकित्सा की पारंपरिक सीमाओं को तोड़ दिया। CRISPR आधारित व्यक्तिगत जीन थेरेपी द्वारा दुर्लभ आनुवंशिक रोगों के उपचार, HIV के छिपे वायरस को निष्क्रिय करने की नई तकनीकें, और नैनो-स्तरीय चिकित्सा उपकरण—ये सभी मानव जीवन को लंबा और बेहतर बनाने का दावा करते हैं। परंतु इस “उपचार की क्रांति” के भीतर एक गहरी असमानता छिपी हुई है। ये उपचार अत्यंत महंगे हैं, उच्च तकनीकी अवसंरचना पर निर्भर हैं और कुछ चुनिंदा देशों तथा संस्थानों तक सीमित हैं। विकासशील देशों की विशाल आबादी के लिए ये उपलब्धियाँ अभी भी दूर का सपना हैं।

इससे एक मूलभूत प्रश्न उभरता है—क्या भविष्य की चिकित्सा ‘सार्वभौमिक स्वास्थ्य’ की अवधारणा को मजबूत करेगी, या यह ‘जैव-विशेषाधिकार’ का नया रूप बनेगीयहाँ विकास जीवन-रक्षा का साधन तो है, पर सामाजिक समानता का नहीं।

1.3 कृत्रिम बुद्धिमत्ता और क्वांटम तकनीक : नवाचार या नया वर्चस्व?

2025 में कृत्रिम बुद्धिमत्ता और क्वांटम कंप्यूटिंग ने अनुसंधान, सुरक्षा, वित्त और संचार के क्षेत्र में निर्णायक हस्तक्षेप किया। AI आधारित खगोलिकी ने लाखों छिपे तारों की पहचान की, क्वांटम चिप्स ने डेटा प्रसंस्करण की सीमाएँ बदलीं, और नैनो AI प्रणालियों ने कम ऊर्जा में अधिक कार्यक्षमता का वादा किया। परंतु इन तकनीकों पर नियंत्रण कुछ गिने-चुने वैश्विक कॉरपोरेट समूहों और शक्तिशाली राष्ट्रों के हाथों में सिमटता जा रहा है। डेटा, एल्गोरिदम और कंप्यूटिंग शक्ति—तीनों का केंद्रीकरण एक नए प्रकार के वर्चस्व को जन्म देता है, जिसे कई विद्वान डिजिटल उपनिवेशवाद कहते हैं। यहाँ विकास तकनीकी है, पर सत्ता अत्यंत असमान। तकनीक का लाभ वैश्विक है, पर नियंत्रण सीमित हाथों में।

2. वैश्विक राजनीति : शक्ति-संतुलन और असमानताओं का विस्तार

2.1 सत्ता की पुनर्रचना और वैश्विक अस्थिरता

2025 की वैश्विक राजनीति स्थिरता का नहीं, बल्कि अस्थिरता और पुनर्संरचना का संकेत देती है। अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप की वापसी ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति को फिर से टकराव की भाषा की ओर मोड़ा। NATO और G20 जैसे मंचों पर वैचारिक विभाजन गहराए, और बहुपक्षीय सहयोग की जगह राष्ट्रीय हितों की संकीर्ण परिभाषाएँ उभरने लगीं। यूक्रेन, गाज़ा, सूडान और म्यांमार जैसे संघर्ष क्षेत्रों में युद्ध और हिंसा जारी रही। इन संघर्षों में विकास की भाषा लगभग अनुपस्थित रही—वहाँ केवल सुरक्षा, हथियार और भू-राजनीतिक हितों की चर्चा थी। मानवीय संकट, विस्थापन और नागरिक जीवन की क्षति वैश्विक राजनीति के हाशिए पर चली गई। यह स्थिति बताती है कि विकास की अवधारणा राजनीतिक शक्ति-संतुलन के अधीन हो चुकी है।

2.2 आर्थिक विकास और नई खाइयाँ

भारत का 2025 में विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनना ऐतिहासिक उपलब्धि है। यह आर्थिक वृद्धि वैश्विक मंच पर भारत की भूमिका को मजबूत करती है। परंतु इसके समानांतर बेरोज़गारी, असंगठित श्रम, ग्रामीण संकट और सामाजिक विषमता भी बनी हुई है। वैश्विक स्तर पर भी, चीन–अमेरिका व्यापार तनाव, आपूर्ति शृंखला संघर्ष और संसाधनों पर प्रतिस्पर्धा यह स्पष्ट करती है कि आर्थिक विकास अब सहयोग की नहीं, बल्कि प्रतिस्पर्धा और प्रभुत्व की भाषा बोलता है। विकास यहाँ वृद्धि (growth) है, पर न्याय नहीं।

3. समाज और जनआंदोलन : प्रतिरोध की नई चेतना

2025 में दुनिया भर में उभरे Gen Z आधारित, नेतृत्वहीन सामाजिक आंदोलनों ने यह स्पष्ट कर दिया कि युवा पीढ़ी विकास के आधिकारिक आख्यान से संतुष्ट नहीं है। बेरोज़गारी, भ्रष्टाचार, जलवायु संकट और सामाजिक असमानता के विरुद्ध ये आंदोलन केवल विरोध नहीं, बल्कि विकास की वैकल्पिक कल्पना प्रस्तुत करते हैं।ये आंदोलन बताते हैं कि विकास का अर्थ केवल GDP या तकनीकी प्रगति नहीं, बल्कि मानवीय गरिमा, सहभागिता और न्याय है।

4. साहित्य : विकास के विरुद्ध मानवीय प्रश्न

जहाँ विज्ञान और राजनीति अक्सर शक्ति और नियंत्रण की भाषा बोलते हैं, वहीं साहित्य 2025 में संवेदना, स्मृति और प्रतिरोध की भाषा बनकर उभरा।नोबेल साहित्य पुरस्कार से लेकर International Booker Prize तक, क्षेत्रीय भाषाओं और अनुवाद साहित्य की वैश्विक स्वीकृति यह संकेत देती है कि साहित्य वैश्विक असमानताओं के विरुद्ध एक वैचारिक मंच बन रहा है। साहित्य ने 2025 में बार-बार यह प्रश्न उठाया— क्या विकास मनुष्य को केंद्र में रखता है, या मनुष्य को विकास के लिए बलिदान करता है?

समग्र मूल्यांकन : उत्सव और संकट के बीच 2025

2025 एक साथ दो विरोधी प्रवृत्तियों का वर्ष है—

 एक ओर वैज्ञानिक और रचनात्मक उपलब्धियों का उत्सव,

 दूसरी ओर सत्ता, तकनीक और पूँजी के माध्यम से गहराती असमानताएँ।

यह वर्ष स्पष्ट करता है कि विकास अब मूल्य-निरपेक्ष नहीं रहा। वह राजनीतिक है, वैचारिक है और सत्ता-संरचनाओं से गहराई से जुड़ा है।

भविष्य की दिशा : विकास की नैतिक पुनर्परिभाषा

2025 हमें यह सोचने के लिए बाध्य करता है कि आने वाला दशक केवल तकनीकी प्रगति का नहीं, बल्कि विकास की नैतिक पुनर्परिभाषा का दशक होना चाहिए। यदि विज्ञान मानवता से कटता है, राजनीति न्याय से और विकास समानता से—तो यह उत्सव नहीं, संकट होगा। इसलिए 2025 को केवल “विकास का वर्ष” नहीं, बल्कि विकास पर प्रश्न उठाने का वर्ष के रूप में याद किया जाना चाहिए। 

विकास, वैश्विक असमानता, विज्ञान और समाज, तकनीक और सत्ता, वैश्विक राजनीति, नव-उपनिवेशवाद, ज्ञान-उत्पादन, पूँजी और विज्ञान, युद्ध और अर्थव्यवस्था, साहित्यिक प्रतिरोध, सामाजिक न्याय, वर्षांत समीक्षा 2025 

#जहाँ प्रगति चमकती है, वहीं असमानताएँ गहरी होती जाती हैं। # विकास की भाषा में छिपी सत्ता और बहिष्करण की संरचनाएँ।# तकनीक, राजनीति और साहित्य—प्रगति के तीन चेहरे, एक सवाल।”#क्या 21वीं सदी का विकास सबके लिए है?”#उपलब्धियों के शोर में दबती मानवीय असमानताएँ।”

 


 

 

 

 

 






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