Editorial
Date : 30 December 2025
Editor-in-Chief : Dr. R. Achal Pulastey
देहरादून में एक विश्वविद्यालय से एम.बी.ए. कर रहे त्रिपुरा के छात्र ऐजेल चकमा की हत्या केवल इसलिए कर दी गई क्योंकि उसे ‘चीनी’ समझ लिया गया। यह कोई पहली घटना नहीं है। ऐसी घटनाएँ पहले भी होती रही हैं और लगातार होती जा रही हैं।
ये घटनाएँ इस कटु सच्चाई को उजागर करती हैं कि विशेषकर हम उत्तर भारतीयों की देश की वास्तविक समझ बेहद सीमित है। इसके बावजूद विडम्बना यह है कि हम स्वयं को ही ‘देश’ मान लेते हैं। अपनी स्थानीय मान्यताओं और सांस्कृतिक रूढ़ियों को ही हम असली हिन्दू धर्म और भारतीयता का पर्याय समझने लगते हैं।
इस स्थिति के लिए शिक्षा और मीडिया तो जिम्मेदार हैं ही, लेकिन वर्तमान राजनीतिक माहौल ने इस प्रवृत्ति को और अधिक उग्र व खतरनाक बना दिया है। हमारे नेता, मीडिया के चेहरे ही नहीं, बल्कि मंत्री तक खुलेआम किसी न किसी समुदाय, जाति, धर्म या क्षेत्र के विरुद्ध विषाक्त बयानबाज़ी करते रहते हैं। इसका सीधा प्रभाव समाज के उस वर्ग पर पड़ता है जो अल्पशिक्षित, बेरोज़गार और हताश है। ऐसे युवाओं के मन में घृणा और आक्रोश भर दिया जाता है, जो फिर अपने ही देशवासियों के ख़िलाफ़ धर्म, जाति और नस्ल के नाम पर हिंसा में बदल जाता है।
वर्तमान समय का सबसे खतरनाक शब्द है— ‘घुसपैठिया’। इस शब्द का प्रयोग प्रधानमंत्री, गृह मंत्री से लेकर असम के मुख्यमंत्री तक बार-बार करते हैं, जबकि इस शब्द की कोई स्पष्ट परिभाषा नहीं है। परिणामस्वरूप, इससे प्रभावित लोग किसी की शक्ल, रंग, पहनावे या भाषा के आधार पर ही उसे विदेशी या घुसपैठिया मान लेने लगते हैं।
इससे भी अधिक भयावह बात यह है कि ऐसे लोग पुलिस या न्यायालय की शरण लेने के बजाय स्वयं ही न्यायाधीश, जूरी और जल्लाद बन बैठते हैं। दुर्भाग्य यह भी है कि पुलिस प्रशासन में भी इतनी संवेदनशीलता और समझ का अभाव है कि वह नॉर्थ-ईस्ट या दक्षिण भारत के लोगों की पहचान और सामाजिक विविधता को समझ सके।
आज न्यायालयों की विश्वसनीयता भी प्रश्नों के घेरे में है। यह किसी से छिपा नहीं है कि न्यायिक प्रक्रिया की विफलताओं के कारण अनेक निर्दोष नौजवान और छात्र वर्षों से जेलों में बंद हैं।
राष्ट्रवाद और हिन्दुत्व के उफान के इस दौर में भारत और हिन्दुत्व—दोनों की विविधता को समझना अत्यंत आवश्यक है। साथ ही मीडिया और राजनीतिक नेतृत्व की घृणास्पद व विषैली बयानबाज़ी पर कठोर लगाम लगनी चाहिए। ऐसी बयानबाज़ी के बल पर बहुसंख्यक वोटों से सरकार तो बनाई जा सकती है, लेकिन देश को नहीं बचाया जा सकता। ऐसी घटनाओं पर सभी जागरूक संवेदनशील उत्तर भारतीय लोगों नार्थ ईस्ट से माफी मांगनी चाहिए, दोषियों को जल्द सजा के आंदोलित होना चाहिए। जो हम नहीं कर पा रहे है।
नॉर्थ-ईस्ट के लोगों के प्रति होने वाले इस भेदभाव और हिंसा की पृष्ठभूमि का उल्लेख मैंने वर्ष 2022 में प्रकाशित अपने उपन्यास “रिसर्च इन तप्पा डोमागढ़” में भी किया है। इस उपन्यास के बारे में लोक अध्ययन के अंतरराष्ट्रीय विद्वान प्रो. राजेन्द्र रंजन चतुर्वेदी लिखते हैं-
“आज की राजनीति अपने स्वार्थ के लिए विविधता को ‘भेद की नीति’ का आधार बनाकर आगे बढ़ रही है। लोक संस्कृति का अध्ययन करने पर स्पष्ट होता है कि समाज समुद्र की लहरों की तरह है—जो आता है, जाता है, मिलता है, बिछुड़ता है, झगड़ता है, तूफ़ान बनता है और अंततः उसी समुद्र में समा जाता है। द्वंद्व, समायोजन और अंतर्भुक्ति की प्रक्रिया एक क्षण के लिए भी नहीं रुकती। राष्ट्र की एकता की प्रक्रिया को प्रत्यक्ष पहचानने के लिए विविधता को जानना आवश्यक है और इसके लिए ‘रिसर्च इन तप्पा डोमागढ़’ को पढ़ना ज़रूरी है।”http://https://amzn.in/d/cIJnEqW
अब आइए, नॉर्थ-ईस्ट के लोगों की इसी पीड़ा को उपन्यास के उस अंश में देखें, जहाँ मिज़ो समुदाय की एक युवती शोध छात्रा के रूप में भोजपुरिया इलाके में आती है और वहाँ के अनुभवों से गुजरते हुए अपने अस्तित्व, पहचान और भय को महसूस करती है—
“ई नैपाली जइसे लागति बा? संयोग से यह कानाफूसी लल्लीम पुई के कानों तक पहुँच गयी,जिसे समझने के लिए वह संजय की ओर देखने लगी।
पुई की सवालिया नजरे देखकर संजय ने कहा- ये लोग तुम्हें नेपाली समझ रहे हैं।
यह सुनते ही पुई का चेहरा उतर गया। संजय की ओर देखकर उदास स्वर बोली-संजय! यह सवाल मुझे अन्दर तक बींध देता है। पता नहीं कब भारत के लोग हमें भारतीय मानेंगे। ये गाँव के लोग बेचारे क्या समझेंगे,ये क्षम्य हैं,परन्तु जब दिल्ली के पढ़े लिखे लोग भी हमें चाइनीज कहते हैं,मसाज वाली थाई लड़कियाँ समझते हैं,तो हमारी अन्तरात्मा तार-तार हो जाती है,क्रोध से देह काँपने लगती है।पिछले साल लाकडाउन में नागालैंड की एक लड़की को चाइनीज समझ कर एक दुकानदार उबलता पानी फेंक दिया था। सरे बाजार आते-जाते लोगों ने भद्दी गालियाँ दी थी । एक मणिपुरी लड़की को चाइनीज के भ्रम में जॉब से निकाल दिया गया, किरायेदार ने कमरा खाली करा दिया,पूरी रात उसे सड़क पर गुजारनी पड़ी थी।
संजय! हम भी उतने ही भारतीय हैं,जितने तुम हो,दोनों की एक समस्या यह है,कि हम भारत की समग्रता से अनभिज्ञ हैं। हमें भी भारतीय होने पर उतना ही गर्व है जितना तुम्हें,पर हिन्दी भाषी हमारी भारतीयता को स्वीकार नहीं करते है, इसीलिए रिसर्च के लिए मैंने नार्थईस्ट के बजाय हिन्दी भाषी प्रदेश के गाँव को चुना है। जिससे विशाल भारत को समझ सकूँ,भारतीय होने की सार्थकता सिद्ध कर सकूँ।
पुई की विषादमय बातें सुनकर संजय खेदपूर्ण स्वर में बोला-पुई यह हमारी शिक्षा और संचार माध्यमों का दोष है। शिक्षा से अधिक मीडिया की पहुँच है,जो बन्दर के हाथ में उस्तरा साबित हो रही है। राष्ट्रीय मीडिया में नार्थईस्ट की चर्चा किसी दुर्घटना के समय ही देखने को मिलती है। राष्ट्रीय प्रवाह में नार्थ ईस्ट के लोगों की बहुत कम भागीदारी है। जिससे उस क्षेत्र के लोगों से शेष भारत वाकिफ नहीं हो पाता है।यहाँ तो अपने ड्राइंग रूम को ही लोग भारत समझ बैठे हैं।देश के बँटवारे की बात करते हर चाक-चौराहे लोग मिल जायेंगे,परन्तु जो वर्तमान भारत है,उसके विविध हिस्सों के बारे नहीं जानना चाहते हैं, इसलिए अपनी संस्कृति को ही पूरे भारत की संस्कृति समझते हैं।
(लेखक विचारक,कथाकार,कवि नार्थईस्ट व लोकसंस्कृति के अध्येता हैं।)
नॉर्थ ईस्ट भारत,नस्ली हिंसा,भीड़ हिंसा,घुसपैठिया शब्द,ऐजेल चकमा हत्या,क्षेत्रीय भेदभाव,भारतीय विविधता,राष्ट्रवाद की राजनीति,हिन्दुत्व विमर्श,मीडिया की भूमिका,राजनीतिक विषाक्तता,अल्पसंख्यक असुरक्षा https://share.google/lfNX0BsmyLNrebxih
#शक़का_राष्ट्रवाद #नॉर्थईस्टभारत #नस्लीहिंसा #भीड़हिंसा
#भारतीयविविधता #लोकतंत्र #संविधान #DrAchalPulastey #AnzielChakama
Editorial Archive
Related Editorials
Related Articles

0 Comments