रति सक्सेना
के. पी. 9/624, वैजयन्त, चेट्टिकुन्नु, मेडिकल कॉलेज पी.ओ., तिरुवनन्तपुरम् – 695011
सारांश (Abstract)
प्रस्तुत शोधपत्र अथर्ववेद की वैदिक परंपरा में स्थिति, उसके नामकरण (अथर्ववेद/अथर्वांगिरस) तथा उसे
चतुर्थ वेद के रूप में स्वीकार किए जाने में आई ऐतिहासिक, सामाजिक
और मानसिक झिझक का विश्लेषण करता है। ऋग्वेद, यास्क के
निरुक्त, महाभारत, मनुस्मृति आदि
ग्रंथों के साक्ष्यों के आधार पर यह स्पष्ट किया गया है कि अथर्वन और अंगिरस ऋषि
अत्यंत प्राचीन, शक्तिशाली तथा बौद्धिक रूप से समृद्ध परंपरा
के प्रतिनिधि थे। शोधपत्र यह तर्क प्रस्तुत करता है कि अथर्ववेद को ‘लौकिक’,
‘अभिचारपरक’ या ‘जादू-टोना प्रधान’ कहकर निम्नतर ठहराने के कारण
मूलतः सामाजिक-राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक रहे हैं, न कि वैदिक
या दार्शनिक। अथर्ववेद की विषयवस्तु—चिकित्सा, गृहस्थ जीवन,
सामाजिक समन्वय, काम, मृत्यु,
भय और प्रकृति—उसे लोकजीवन के अत्यंत निकट स्थापित करती है। यही
लोकनिष्ठा, अभिजात वैदिक वर्ग की असहजता का कारण बनी।
निष्कर्षतः शोध यह प्रतिपादित करता है कि अथर्ववेद वैदिक संस्कृति की परिपक्व,
मानवीय और लोकमूलक चेतना का प्रतिनिधि ग्रंथ है, जिसकी उपेक्षा ऐतिहासिक वर्चस्ववादी मानसिकता का परिणाम रही है।
मुख्य शब्द- अथर्ववेद, अथर्वांगिरस, अंगिरस ऋषि, वैदिक परंपरा, लोक-संस्कृति, सामाजिक मनोविज्ञान, व्रात्य, अभिचार मंत्र, वैदिक समाज, चतुर्वेद
Abstract
The present research paper examines the position of the
Atharvaveda within the Vedic corpus and critically analyzes the historical
hesitation in accepting it as the fourth Veda. Drawing upon references from the
Rigveda, Atharvaveda, Yāska’s Nirukta, the Mahabharata, Manusmriti, and later
Sanskrit literature, the study explores the meanings of the terms Atharvan and
Angiras and their association with ritual, healing, and so-called magical
practices. The paper argues that the marginalization of the Atharvaveda was not
due to any philosophical or literary inferiority but stemmed from
socio-political hierarchies, tribal conflicts, and an elitist Brahmanical
mindset that viewed folk-oriented knowledge with suspicion. Unlike the Rigvedic
focus on warfare and cosmic order, the Atharvaveda reflects a more settled and
mature society concerned with health, domestic life, social harmony, fear,
desire, and human suffering. Its strong association with folk culture, medical
knowledge, and everyday rituals made it deeply rooted in popular consciousness,
even when it remained undervalued in canonical discourse. The study concludes
that the Atharvaveda represents a highly developed, humane, and socially
responsive stream of Vedic thought and deserves recognition as a central,
rather than peripheral, component of Indian intellectual tradition.
Keywords-Atharvaveda; Atharvangiras; Vedic Tradition; Folk
Culture; Social Psychology; Angiras Rishis; Vratya; Ancient Indian Society
शोधपत्र
संयुक्त रूप से चार वेद माने जाते हैं किन्तु अधिकतर शास्त्रों
में तीन वेदों का ही उल्लेख है। यहाँ तक
ऋग्वेद के प्रसिद्ध पुरुष सूक्त में भी अथर्ववेद के स्थान पर छन्दासि शब्द
का प्रयोग है। (इस बात में पूर्णतया सन्देह है कि पुरुष सूक्त मूल ऋचाओं का अंग है, इसमे निहित विभिन्न उपादान इसे प्रक्षिप्त
मानने को विवश करते हैं, जिस पर बाद में चर्चा की जाएगी।
) परवर्ती साहित्य में अथर्ववेद के लिए
अथर्वांगिरस शब्द का प्रयोग किया गया है। (अवे. 9.7.20,महाभारत-त्त्त्,305,20,17066 और ध्त्त्त्, 4033,1848,याज्ञवल्क्य स,त्,312, मनु स्मृतिन्त्,33 ) मैक्समूलर आदि विद्वानों का
विचार है कि अथर्वन द्वारा भेषज सम्बन्धित मंत्रों की सूचना मिलती है और अंगिरस
द्वारा अभिचारिक मंत्रों की। किन्तु वे
स्वयं स्वीकार करते हैं कि ऋग्वेद में और अथर्ववेद में अंगीरस का प्रयोग विशिष्ट
ऋषियों के अर्थ में हुआ है। यास्क के निरुक्तम में ऋग्वेद से उदाहरण देते हुए
अङ्गिरस तथा अथर्वन को मानव का पितर माना गया है। ( अङ्गिरसो नः पितरो नवम्वा
अथर्वाणो भृगवः सोम्यास। तेषां वयं सुमतौ यज्ञिमानामपि भद्रे सौमनसे स्याम।। ऋ. स.
7.6.15 तथा यामथर्वा च मनुश्च पिता मानवाना दध्यङ् च धियमतनिम्। तस्मिन्ब्रह्माणि
कर्माणि पूर्वेन्द्र उक्थासमग्मतार्चन्ननु स्वाराज्यम्।। ऋ.स. 1.5.31-- मंत्र
संख्या यास्क के निरुक्त के अनुरूप है।) यास्क ने अन्य उल्लेख देते हुए अङ्गिरस को
अग्नि का पुत्र माना है। जिसका व्यंग्यार्थ हो सकता है कि अग्नि के समान तेज व
क्रोध वाले। ( विरुपास इदृषयस्त इद्गम्भीरवेपसः। ते अङ्गिरसः पुत्रास्ते अग्नेः
परिजज्ञिरेः।। ऋ स, 8.2.21) ऋग्वेद में अथर्वन और अंगिरस ऋषियों का
साथ-साथ उल्लेख भी हुआ है-- " जो सुकर्म करने वाले वाले क्षमावान जन अंगिरा
हैं उन्होंने सबसे पहले आयु प्राप्त की है, वे सभी पणियों
द्वारा पूजित हैं, उनके पास भोजन हैं, अश्व
हैं, और पशु भी हैं, वे पशुवान नर हैं।
-- आदङ्गिराः प्रथममं दधिरे वय इद्धाघ्नयः शम्या ये सुकृत्यया। सर्वं पणेः
समविन्दन्त भोजनमश्वावन्तं गोमन्तमा पशुं नरः।। ऋ 1.83.4।। अन्य स्थान पर कहा गया
है कि " यज्ञों में अथर्वा प्रथम हैं, उनके पथों को
व्रत का पालन करने वाले सूर्य और वेन प्रकट करता है, वे अपने
काव्य से समस्त गोचरों को प्रकाशित (प्रसन्न करते हैं, हम यम
से उत्पन्न अमृत की पूजा करते हैं। " यज्ञैरथर्वाप्रथमः पथस्तते ततः सूर्यों
व्रतपा वेन आजनि। आ गा आजदुशना काव्यः सचा यमस्य जातमतृतं यजामहे।। ऋ.1.83.5।। इसी
तरह जब इन्द्र की दूती सरमा पणियों के पास जाती है तो वह उन्हें धमकी देती है कि
वह घोर अङ्गिरसों को जानती है। मोनियर विलियम ने उन ऋषियों को अङ्गिरस बताया है
जिन्होंने अथर्वन से ब्रह्मविद्या प्राप्त की थी और जो तांत्रिक मंत्रों को जानने
वाले हैं। उनके अनुसार अथर्वन ही प्रथम पुरोहत था जिसने सोम और
अग्नि को पूजने
की प्रथा चलाई। वे ब्रह्मविद्या के प्रथम ज्ञाता भी माने जाते
हैं। कहीं-कहीं पर शिव के लिए भी अथर्वन
का प्रयोग हुआ है। अंगिरस को विष्णु का शत्रु भी बताया गया
है। (मोनियर विलियम) महाभारत के
उद्योग पर्व में भी
अथर्वन व अंगिरस ऋषियों का उल्लेख हैं जिसमें उन्हे तंत्र- मंत्र विद्या के ज्ञाता
माना
गया है।
ऋग्वेद में प्राप्त
उल्लेख से एक बात तो स्पष्ट है कि अथर्वन व अङ्गिरसों की स्थिति काफी प्राचीन काल
से रही होगी। ऋग्वेद की रचना काल में इस वर्ग के कबीले को सम्मान की दृष्टि से
देखा जाता था ( संभवतः उनकी शक्ति के कारण)। इस कबीले ने अग्नि के उत्पादन को समझ
लिया था। वनस्पतियों का जीवनोपयोगी उपयोग करना समझ
लिया था। ऐसी स्थिति
में अब यब प्रश्न उठता है कि ऋग्वेद ही नहीं अनेक शास्त्र भी अथर्ववेद को चतुर्थ
वेद मानने से क्यों हिचकिचाते रहे,
क्यों वेद त्रय की मान्यता प्रचलित हुई? इसलिए
तो नहीं कि ये ऋषि उस कबीले या वर्ग के थे जिनसे आक्रमणकारी कबीलों को हमेशा
संघर्ष करना पड़ा? हो सकता है कि वे पराजित हो गए हो, यह भी हो सकता है कि वे दूसरे स्थानों पर चले गए हों, किन्तु उनसे युद्ध का खतरा हमेशा बना रहता हो। यह भी हो सकता है कि वे
पराजित हुए बिना अपने अस्तित्व को विशिष्ट परिस्थितियों में बनाए रखने में समर्थ
हो गए। यह तो निश्चित है कि यह वर्ग
शक्तिशाली ही नहीं बुद्धिशाली भी था, इनके गीत मात्र
भावनात्मक प्रस्तुतियाँ ही नहीं अपितु सारगर्भित भी थे। यह भी हो सकता है ये उस मूलजाति वर्ग का
प्रतिनिधित्व करते हों जो सिन्धुघाटी की सभ्यता के काल से परिपक्व संस्कृति युक्त
थी, जिनके पास पर्याप्त पशुधन था, जिनका
बौद्धिक विकास अभूतपूर्व था, जिन्होंने चिकित्सा आदि पर भी
महारत हासिल कर ली थी। ऐसे वर्ग द्वारा रचित अभिव्यक्तियों को चतुर्थ वेद मानने
में क्या झिझक हो सकती है यह प्रमुख सवाल है। कुछ सामान्य जवाब इस तरह हो सकते हैं
जैसे कि - 1-अथर्ववेद में जादूटोने के मंत्रों की बहुतायत हैं ( जैसा कि अधिकतर
विद्वानों का भी अभिप्राय है)2- इन मंत्रों
की भाषा ऋग्वेद के समान साहित्यिक नहीं है। ( यह भी कुछ विचारकों का मत है,
लेखक की इसमे सहमति नहीं है।) 3-अथर्ववेद की रचना ऋग्वेद के बहुत
बाद हुई । काफी वक्त तक लोक में तीन वेदों की स्थिति ही बनी रही, संभवतः यही कारण है कि वेदत्रय की स्मृति लोक में ज्यादा प्रभावशाली रही।
4- अथर्ववेद की विषयवस्तु इतनी लौकिक थी कि ब्राह्मणों को इसे वेद मानने में
हिचकिचाहट होती रही। किन्तु इन सभी कारणों पर चिन्तन किया जाए तो किसी को भी
पूर्णतया उचित नहीं माना जा सकता हैं। जादूटोने आदि विषयों पर आगे चिन्तन
होगा। यहाँ पर सामाजिक मनोविज्ञान के
द्वारा इस गुत्थी को समझने का प्रयत्न किया जाएगा। ऋग्वेद में युद्ध गीतों की
बहुलता से यह तो कल्पना की जा सकती है कि ऋग्वेद के रचनाकाल में समाज के सामने
अपने को स्थापित करने की समस्या प्रमुख रूप से थी, समाज अपने
निर्माण स्तर पर पहुँच कर भी विभिन्न लोक संस्कृतियों से एक मूल संस्कृति बुनने की
अवस्था तक पहुँच चुका था। अथर्ववेद कालीन समाज युद्ध से ज्यादा भयभीत नहीं,
बल्कि यहाँ तक राष्ट्र की कल्पना का भी उदय हो गया था। हालाँकि
छुटपुट युद्धों की सूचना अथर्ववेद में भी मिलती है। सामाजिक समन्वय के बारम्बार
आह्वान से लगता है कि पूर्ण स्थिरता आने पर भी समुदाय बाह्य आक्रमणों से आतंकित
था। प्राकृतिक सम्पदाओं के प्रति विशेष आग्रह, जन सामान्य के
दुख -सुख से सहानुभूति, शारीरिक सुख के प्रति जागरुकता और
सामान्य से ऊपर उठ कर ब्रह्माण्ड को जानने की प्रवृत्ति आदि की भावना अथर्ववेद में
विशेष बलवती है। निसन्देह ऐसी स्थिति तभी आती है जब प्राथमिक समस्याओं का निवारण
होने लगता है और जीवन परिपक्वता और स्थिरता की ओर अग्रसर होने लगता है। इस
संस्कृति को श्रेष्ठ माना जाना चाहिए। अतः यह सन्देह जाग्रत होना स्वाभाविक है कि
अभिचारपरक और चिकित्सा सम्बन्धी मंत्रों की अधिकता मात्र अथर्ववेद को निम्न मानने
को क्यो विवश हुई? क्या इस समस्या के कोई अन्य कारण हो सकते
हैं? कहीं ऐसा तो नहीं कि ऋग्वेद के रचियेताओं में अधिकतर उस
वर्ग के ऋषि या जन थे जिनका समाज में उच्च स्थान निहित हो चुका था, जबकि अथर्ववेद लोक की थाती ही बना रहा था। अंगिरस आदि कबीले के लोग
परिष्कृत बुद्धि के होते हुए भी लोक जीवन को ही अपनाए हुए थे। यह भी हो सकता है
घोर अंगिरसों की शक्ति से सभ्य -अभिजात्य को भय तो था, किन्तु
उन्हें अपने बराबर मानने में वे मानसिक रूप से तैयार नहीं थे। यह भी सकता है कि
मूलजनजाति के प्रति मन में अवहेलना का भाव कम नही हुआ।
सामवेद और यजुर्वेद के समान अथर्ववेद में ऋग्वेद के सभी
मंत्रों को ज्यों कि त्यों अपनाया तो नहीं गया है,
किन्तु कुछ प्रमुख मंत्रों को अवश्य लिया गया है। अथर्ववेद की एक
विशेषता यह है कि उसने ऋग्वेद के मंत्रों को लौकिक विस्तार दिया। उदाहरण के लिए
विवाह सम्बन्धी मंत्रों में प्रथम चरण जिसमे सोम और सूर्या के विवाह का प्रकरण है,
अथर्ववेद में ज्यों कि त्यों है किन्तु इसके बाद विवाह सम्बन्धी
लोकाचारों का विशद वर्णन किया गया है। मृत्यु सम्बन्धी मंत्रों की भी यही
विशेषता है। यही नहीं " काम" सम्बन्धी प्रथम मंत्र
तो ऋग्वेद से लिया गया है , किन्तु
काम की लौकिक व्याख्या अथर्ववेद की अपनी विशेषता है। यह भी संभव है कि कि अथर्वन
और अङ्गिरसों की जीवन पद्धत्ति ऋग्वैदिक ऋषियों से भिन्न हो, उनके समाज में वह खुलापन और सामंजस्य हो जिसे मूलवासियों की या
"लोक" की धरोहर माना जाता है। ध्यातव्य है कि मात्र अथर्ववेद में "व्रात्य" जिसे बाद के शास्त्रों ने
च्युत ब्राह्मण माना है की स्तुति हुई है। "व्रात्य" को शिव का पुरातन
स्वरूप माना जा सकता है ( इस विषय पर विशद चर्चा अन्य की जाएगी) मोनियर विलियम के
अनुसार अंगिरस विष्णु के शत्रु थे। वैष्णवों और शैवों के मतभेद पौराणिक काल से
इतने अधिक बढ़ गए थे कि लगता है वैदिक युग में भी उस मतभेद के कुछ बीज अवश्य रहे
हों। ऋग्वेद में विष्णु की स्तुति विशेष रूप से उल्लेखनीय है, जबकि अथर्ववेद में विष्णु का वह स्थान नहीं है जो रुद्र या व्रात्य का है।
विष्णु और शिव कबिलाई मतभेद के परिचायक भी हो सकते हैं। संभव है कि इसी कबिलाई मतभेद की नींव पर स्थित
अभिजात्य वर्ग को , जिसके हाथ में साहित्य व इतिहास अनायास आ
जाता है- अथर्ववेद को स्वीकार करने में काफी समय लगा। स्वीकार भी किया तो वर्ग
विशेष इसे तिरस्कार से ही देखता रहा।
ध्यान देने वाली बात यह है कि अथर्ववेद के कुछ मंत्रों में ऋक् और साम का
उल्लेख है, यजुर्वेद को भी यज्ञ करने में महत्वपूर्ण माना
जाने लगा था, किन्तु अथर्ववेद का अलग से उल्लेख नहीं है। इन
मंत्रों में ऋक् और साम के साथ देवों
द्वारा दिए गए यज्ञ करते हुए सुखपूर्वक सदनों में रहने की कामना है। इस तरह ऋक् ,
साम के साथ यजु की शक्ति के साथ यज्ञ करने से कोई हानी या बुरा नहीं
होता, शचीपति पीठ पर रहते हैं। ( ऋचं साम यजामहे याभ्यां
कर्माणि कुर्वुते। एते सदसि राजतो यज्ञं देवेषु यच्छतः।। अथर्ववेद 7.54.1।। ऋचं
साम यदप्राक्षं हविरोजो यजुर्बलम्। एष मा तस्मान्मा हिंसीद् वेदः पृष्ठः शचीपते।।
अथर्ववेद-7.54.2।।) इससे यह तो पता चलता है कि तब घर- घर में शान्ति हेतु ऋक्,
व साम की ऋचाओ के साथ यज्ञों का प्रचलन हो गया था। संभवतः ये मंत्र
उस काल में रचे हो जब अथर्ववेद के मंत्रो का संकलन चल ही रहा था अथवा अथर्ववेदीय
गीत व मान्यता सामान्य समाज का अंग थीं, उन्हें विशिष्ट नहीं
बनाया गया था। बाद में यज्ञों में अथर्वेदीय ब्रह्मा को होता का स्थान मिलने लगा
तो इसे नकारना कठिन हो गया। इसलिए
चतुर्वेदों में उसकी गणना होती रही। विशेष बात यह रही कि यद्यपि कालान्तर
में अन्य वेदों के समान अथर्ववेद को भी शूद्रो और स्त्रियों के लिए वर्जित मान
लिया गया, फिर भी अथर्ववेद की अनेक धारणाएँ, उक्तियाँ और लोक मान्यताएँ लोक में प्रचलित रहीं। परिणामतः अथर्ववेद जिस
समाज से छीन कर लिया गया था , उसी के गीतों, कहावतों और विचारों के साथ रह गया। यही संस्कृति पर लोक की मनोवैज्ञानिक
विजय रही।
निष्कर्ष
इस अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि अथर्ववेद को चतुर्थ वेद के
रूप में स्वीकार न किए जाने के पीछे
शास्त्रीय कमियाँ नहीं, बल्कि सामाजिक वर्चस्व, कबिलाई संघर्ष और अभिजात्य मानसिकता प्रमुख कारण रहे हैं। अथर्ववेद का लोकजीवन से गहरा संबंध, उसकी विषयवस्तु की लौकिकता और मानवीय संवेदना उसे ऋग्वैदिक परंपरा से भिन्न अवश्य बनाती है, किंतु निम्न नहीं। चिकित्सा, सामाजिक समन्वय, गृहस्थ जीवन और प्रकृति के प्रति उसकी दृष्टि वैदिक संस्कृति के विकास का उन्नत चरण दर्शाती है। यह भी स्पष्ट होता है कि लोक में अथर्ववेद की निरंतर उपस्थिति उसकी सांस्कृतिक शक्ति और स्वीकार्यता का प्रमाण है। अतः अथर्ववेद को वैदिक साहित्य की ‘हाशिये की रचना’ नहीं, बल्कि उसकी मानवीय चेतना की केंद्रीय अभिव्यक्ति के रूप में पुनर्मूल्यांकन की आवश्यकता है।
संदर्भ (References)
1. ऋग्वेद
संहिता
2. अथर्ववेद
संहिता
3. यास्क
— निरुक्त
4. महाभारत, उद्योग पर्व
5. मनुस्मृति
6. याज्ञवल्क्य
स्मृति
7. मोनियर
विलियम्स — A Sanskrit-English Dictionary
8. मैक्स
मूलर — Sacred Books of the East
9. शर्मा, रामशरण — प्राचीन भारतीय समाज
10. चट्टोपाध्याय, डी.डी. — लोकायत : प्राचीन भारत में भौतिकवाद
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