अथर्ववेद अथवा अथर्वांगिरस : वैदिक परंपरा, सामाजिक मनोविज्ञान और लोक-संस्कृति का अध्ययन


रति सक्सेना
के. पी. 9/624, वैजयन्त, चेट्टिकुन्नु,
मेडिकल कॉलेज पी.ओ., तिरुवनन्तपुरम् – 695011

 Issue-33 Vol.-IV, Oct.-Dec 2025 Paper ID-33/3 


सारांश

प्रस्तुत शोधपत्र अथर्ववेद की वैदिक परंपरा में स्थिति, उसके नामकरण (अथर्ववेद/अथर्वांगिरस) तथा उसे चतुर्थ वेद के रूप में स्वीकार किए जाने में आई ऐतिहासिक, सामाजिक और मानसिक झिझक का विश्लेषण करता है। ऋग्वेद, यास्क के निरुक्त, महाभारत, मनुस्मृति आदि ग्रंथों के साक्ष्यों के आधार पर यह स्पष्ट किया गया है कि अथर्वन और अंगिरस ऋषि अत्यंत प्राचीन, शक्तिशाली तथा बौद्धिक रूप से समृद्ध परंपरा के प्रतिनिधि थे। अथर्ववेद की विषयवस्तु—चिकित्सा, गृहस्थ जीवन, सामाजिक समन्वय, काम, मृत्यु, भय और प्रकृति—उसे लोकजीवन के अत्यंत निकट स्थापित करती है। निष्कर्षतः यह शोध प्रतिपादित करता है कि अथर्ववेद वैदिक संस्कृति की परिपक्व, मानवीय और लोकमूलक चेतना का प्रतिनिधि ग्रंथ है।

Keywords

अथर्ववेद, अथर्वांगिरस, अंगिरस ऋषि, वैदिक परंपरा, लोक-संस्कृति, सामाजिक मनोविज्ञान, व्रात्य, अभिचार मंत्र, वैदिक समाज, चतुर्वेद


Abstract

The present research paper examines the position of the Atharvaveda within the Vedic corpus and critically analyzes the historical hesitation in accepting it as the fourth Veda. Drawing upon references from the Rigveda, Yāska’s Nirukta, the Mahabharata, Manusmriti, and later Sanskrit literature, the study argues that the marginalization of the Atharvaveda stemmed from socio-political hierarchies and elitist attitudes rather than philosophical inferiority. The Atharvaveda reflects a mature society concerned with health, domestic life, fear, desire, and social harmony, representing a humane and folk-oriented stream of Vedic thought.

Keywords

Atharvaveda; Atharvangiras; Vedic Tradition; Folk Culture; Social Psychology; Angiras Rishis; Vratya; Ancient Indian Society


शोधपत्र

संयुक्त रूप से चार वेद माने जाते हैं, किंतु अधिकांश शास्त्रों में तीन वेदों का ही उल्लेख मिलता है। ऋग्वेद के पुरुष सूक्त में भी अथर्ववेद के स्थान पर ‘छन्दांसि’ शब्द का प्रयोग हुआ है। परवर्ती साहित्य में अथर्ववेद के लिए ‘अथर्वांगिरस’ शब्द का प्रयोग मिलता है।

ऋग्वेद और यास्क के निरुक्त से यह स्पष्ट होता है कि अथर्वन और अंगिरस ऋषियों को मानव समाज का पितर माना गया है। वे अग्नि-विद्या, चिकित्सा, वनस्पति-ज्ञान और तांत्रिक परंपरा के ज्ञाता थे।

ऋग्वेद में अथर्वन और अंगिरसों का सम्मानपूर्वक उल्लेख मिलता है, जिससे स्पष्ट होता है कि यह परंपरा अत्यंत प्राचीन और शक्तिशाली थी। इसके बावजूद अथर्ववेद को चतुर्थ वेद के रूप में स्वीकार करने में दीर्घकालीन झिझक बनी रही।

इस शोध का तर्क है कि यह झिझक जादू-टोना या अभिचार मंत्रों के कारण नहीं, बल्कि सामाजिक वर्चस्व, कबिलाई संघर्ष और अभिजात्य मानसिकता का परिणाम थी। अथर्ववेद की लोकनिष्ठा, उसकी विषयवस्तु की मानवीय संवेदना और गृहस्थ जीवन से निकटता ने उसे लोकसंस्कृति का ग्रंथ बना दिया।

व्रात्य की स्तुति, रुद्र-प्रधान दृष्टि और लोकाचारों का समावेश अथर्ववेद को ऋग्वैदिक परंपरा से भिन्न, किंतु अधिक मानवीय बनाता है। लोक में इसकी निरंतर उपस्थिति इस तथ्य का प्रमाण है कि अथर्ववेद को समाज ने कभी त्यागा नहीं।


निष्कर्ष

इस अध्ययन से स्पष्ट होता है कि अथर्ववेद को हाशिये पर रखने के पीछे शास्त्रीय नहीं, बल्कि सामाजिक और मनोवैज्ञानिक कारण रहे हैं। अथर्ववेद वैदिक संस्कृति की परिपक्व, लोकमूलक और मानवीय चेतना का प्रतिनिधि है। अतः उसे वैदिक साहित्य की केंद्रीय धारा के रूप में पुनर्मूल्यांकन किए जाने की आवश्यकता है।


संदर्भ (References)

  1. ऋग्वेद संहिता
  2. अथर्ववेद संहिता
  3. यास्क — निरुक्त
  4. महाभारत, उद्योग पर्व
  5. मनुस्मृति
  6. याज्ञवल्क्य स्मृति
  7. Monier Williams — A Sanskrit-English Dictionary
  8. Max Müller — Sacred Books of the East
  9. शर्मा, रामशरण — प्राचीन भारतीय समाज
  10. चट्टोपाध्याय, डी.डी. — लोकायत : प्राचीन भारत में भौतिकवाद

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