डॉ. संजय कुमार1
1एसोसिएट प्रोफेसर, बी.एड्.
विभाग, बी. आर. डी. पी. जी. कालेज देवरिया, उप्र
Email - baudhsk@gmail.com
बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर भारतीय
समाज में शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन, समानता, राष्ट्रीय एकता और लोकतांत्रिक चेतना का मूल आधार मानते थे। उनके विचार
में शिक्षा केवल रोजगार प्राप्ति का साधन नहीं, बल्कि
सामाजिक शोषण, जातिगत असमानता और बौद्धिक दासता से मुक्ति का
प्रभावी उपकरण तो थी ही शिक्षा राष्ट्र प्रेम, राष्ट्रीय
एकता तथा विश्व बंधुत्व की भावना विकसित करती है। प्रस्तुत शोध पत्र का उद्देश्य
डॉ. अंबेडकर की शिक्षा-दृष्टि का सैद्धांतिक एवं दार्शनिक विश्लेषण करना तथा उसकी
तुलना समकालीन भारतीय शिक्षा प्रणाली से करना है। इस अध्ययन में यह स्पष्ट किया
गया है कि वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में विस्तार के बावजूद सामाजिक न्याय, सामाजिक समावेशन और समान अवसर जैसे अंबेडकरवादी मूल्य पूर्णतः साकार नहीं
हो पाए हैं। यह शोध पत्र आलोचनात्मक दृष्टि से यह तर्क प्रस्तुत करता है कि यदि
भारतीय शिक्षा प्रणाली को वास्तव में सामाजिक समता, लोकतांत्रिक
सद्भाव युक्त एवं न्यायपूर्ण बनाना है, तो अंबेडकर की
शिक्षा-दृष्टि को नीतिगत एवं व्यवहारिक स्तर पर पुनः स्थापित करना आवश्यक है।
मुख्य शब्द (Keywords): डॉ. अंबेडकर, शिक्षा-दृष्टि, सामाजिक
न्याय, भारतीय शिक्षा प्रणाली, समानता,
लोकतंत्र।
Dr. B. R. Ambedkar regarded education as
the fundamental basis of social transformation, equality, national integration,
and democratic consciousness in Indian society. In his view, education was not
merely a means of obtaining employment; rather, it was an effective instrument
for liberation from social exploitation, caste-based inequality, and
intellectual subjugation. Education, according to him, also fosters patriotism,
national unity, and the spirit of universal brotherhood. The objective of the
present research paper is to undertake a theoretical and philosophical analysis
of Dr. Ambedkar’s educational vision and to compare it with the contemporary
Indian education system. This study clearly demonstrates that despite the
expansion of the present education system, Ambedkarite values such as social
justice, social inclusion, and equal opportunities have not been fully
realized. From a critical perspective, the paper argues that if the Indian
education system is to be made truly egalitarian, democratically harmonious,
and just, it is essential to re-establish Dr. Ambedkar’s educational vision at
both the policy and practical levels.
Keywords: Dr. B. R. Ambedkar,
Educational Vision, Social Justice, Indian Education System, Equality,
Democracy.
प्रस्तावना (Introduction):
शिक्षा किसी भी समाज की वैचारिक चेतना
और सामाजिक संरचना को दिशा प्रदान करती है। भारतीय समाज ऐतिहासिक रूप से जाति, वर्ग,
धर्म, क्षेत्र और लिंग आधारित असमानताओं से
ग्रस्त रहा है, जिसमें शिक्षा लंबे समय तक विशेष वर्गों तक
सीमित रही। डॉ. भीमराव अंबेडकर ने इस असमानता को भारतीय समाज की मूल समस्या माना
और शिक्षा को सामाजिक क्रांति का प्रमुख साधन घोषित किया।
समकालीन भारतीय शिक्षा प्रणाली
संविधान के मूल्यों से प्रेरित होने का दावा तो करती है, किंतु
व्यवहार में यह प्रणाली अनेक सामाजिक समूहों को समान अवसर प्रदान करने में असफल
दिखाई देती है। इस पृष्ठभूमि में अंबेडकर की शिक्षा-दृष्टि का पुनर्मूल्यांकन
अत्यंत आवश्यक हो जाता है।
शोध के उद्देश्य (Objectives of the
Study):
प्रस्तुत शोध के निम्नलिखित उद्देश्य
निर्धारित किए गए हैं:
☐ डॉ. अंबेडकर की शिक्षा-दृष्टि का दार्शनिक
विश्लेषण करना।
☐ समकालीन भारतीय शिक्षा प्रणाली की संरचना और
प्रवृत्तियों का अध्ययन करना।
☐ अंबेडकर की शिक्षा-दृष्टि और वर्तमान शिक्षा
व्यवस्था के बीच तुलनात्मक अध्ययन करना।
☐ शिक्षा के क्षेत्र में सामाजिक न्याय की स्थिति
का आलोचनात्मक मूल्यांकन करना।
शोध पद्धति (Research
Methodology):
प्रस्तुत शोध अध्ययन वर्णनात्मक एवं
विश्लेषणात्मक शोध पद्धति पर आधारित है। इसमें प्राथमिक स्रोतों के रूप में डॉ.
अंबेडकर के प्रमुख ग्रंथों, भाषणों और संवैधानिक विचारों तथा द्वितीयक
स्रोतों के रूप में अन्य अम्बेडकरी तथा शिक्षा सम्बन्धी पुस्तकों, शोध पत्रों, सरकारी दस्तावेजों और शिक्षा नीतियों का
उपयोग किया गया है।
डॉ. अंबेडकर की शिक्षा-दृष्टि (Dr Ambedkar's
Vission of Education):
बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर की शिक्षा-दृष्टि
भारतीय समाज की ऐतिहासिक असमानताओं के गहन अनुभव से विकसित हुई थी। उनके लिए
शिक्षा केवल ज्ञानार्जन या रोजगार प्राप्ति का साधन नहीं थी, बल्कि
वह सामाजिक मुक्ति, मानवीय गरिमा, मानवीयता
और लोकतांत्रिक चेतना का आधार थी। अंबेडकर का मानना था कि जिस समाज में शिक्षा कुछ
वर्गों तक सीमित रहती है, वहाँ स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व केवल औपचारिक
शब्द बनकर रह जाते हैं। इसलिए उन्होंने शिक्षा को सामाजिक न्याय की स्थापना का
सबसे प्रभावी माध्यम माना।
अंबेडकर की दृष्टि में शिक्षा व्यक्ति
को आत्म संयम, आत्म सम्मान और आत्मबोध प्रदान करती है। वे मानते थे कि
शोषित और वंचित वर्गों की सबसे बड़ी समस्या आर्थिक अभाव तो है ही, आर्थिक अभाव से अधिक मानसिक गुलामी है, और शिक्षा ही
वह मुख्य साधन है जो व्यक्ति को इस मानसिक दासता से मुक्त कर सकती है। इसी कारण
उन्होंने पिछड़ा वर्ग अर्थात दलितों, पिछड़ों और महिलाओं की
शिक्षा पर विशेष बल दिया। उनके अनुसार जब तक समाज के हाशिए पर खड़े वर्ग शिक्षित
नहीं होंगे, तब तक लोकतंत्र का वास्तविक अर्थ साकार नहीं हो
सकता।
डॉ. अंबेडकर की शिक्षा-दृष्टि समानता, बंधुत्व
और समावेशन के सिद्धांत पर आधारित थी। वे ऐसी शिक्षा प्रणाली के समर्थक थे जो जाति,
धर्म, लिंग, क्षेत्र और
वर्ग के आधार पर भेदभाव को समाप्त करे। उनका स्पष्ट मत था कि असमान शिक्षा
व्यवस्था सामाजिक विषमता की खाईं को और गहरा करती है। इसी संदर्भ में उन्होंने
समान अवसर सुनिश्चित करने के लिए राज्य की सक्रिय भूमिका और सकारात्मक हस्तक्षेप
की आवश्यकता पर बल दिया। शिक्षा में आरक्षण को वे सामाजिक न्याय की अनिवार्य शर्त
मानते थे, न कि किसी प्रकार का विशेषाधिकार।
डॉ. अंबेडकर वैज्ञानिक दृष्टिकोण और
तर्कशीलता के प्रबल समर्थक थे। वे शिक्षा को अंधविश्वास, रूढ़ियों,
सामाजिक कुरीतियों और अवैज्ञानिक सोच के विरुद्ध संघर्ष का माध्यम
मानते थे। उनकी दृष्टि में सच्ची शिक्षा वही है जो व्यक्ति में प्रश्न पूछने,
तर्क करने और स्थापित सत्ता-संरचनाओं की आलोचना करने का साहस
उत्पन्न करे। इसीलिए उन्होंने नैतिकता, विवेक और आलोचनात्मक
चेतना को शिक्षा का केंद्रीय तत्व माना।
डॉ. अंबेडकर के लिए शिक्षा और
लोकतंत्र परस्पर पूरक थे। वे मानते थे कि लोकतंत्र केवल राजनीतिक व्यवस्था नहीं, बल्कि
सामाजिक जीवन-पद्धति है, और इस जीवन-पद्धति को जीवंत बनाए
रखने के लिए शिक्षित नागरिकों की आवश्यकता होती है। बिना शिक्षित और जागरूक
नागरिकों के लोकतंत्र खोखला हो जाता है। इस दृष्टि से उनकी शिक्षा-दृष्टि संविधान
में निहित स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व
और न्याय के मूल्यों से गहराई से जुड़ी
हुई है।
समग्र रूप से देखा जाए तो डॉ. अंबेडकर
की शिक्षा-दृष्टि एक मानवीय, लोकतांत्रिक और सामाजिक न्याय-आधारित
दृष्टि है, जो आज भी भारतीय शिक्षा व्यवस्था के लिए
मार्गदर्शक सिद्धांत प्रदान करती है। उनकी दृष्टि शिक्षा को व्यक्ति के निजी विकास
तक सीमित न रखकर उसे समाज के समग्र परिवर्तन से जोड़ती है, और
यही कारण है कि उनकी शिक्षा-दृष्टि समकालीन संदर्भों में भी उतनी ही प्रासंगिक और
आवश्यक प्रतीत होती है।
समकालीन
भारतीय शिक्षा प्रणाली का स्वरूप:(Nature of Contemporary Indian Education System):
समकालीन भारतीय शिक्षा प्रणाली
बहुस्तरीय, विविधतापूर्ण और निरंतर परिवर्तनशील स्वरूप में
विकसित हो रही है। स्वतंत्रता के बाद
भारतीय संविधान ने शिक्षा को समानता, सामाजिक न्याय और
लोकतांत्रिक मूल्यों से जोड़ने का प्रयास किया, जिसके
परिणामस्वरूप शिक्षा के प्रसार में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। प्राथमिक से लेकर उच्च
शिक्षा तक संस्थानों की संख्या बढ़ी है और शिक्षा तक पहुँच पहले की तुलना में
व्यापक हुई है। हाल के वर्षों में डिजिटल तकनीक के समावेश ने शिक्षा के नए माध्यम
उपलब्ध कराए हैं, जिससे भौगोलिक सीमाएँ आंशिक रूप से कम हुई
हैं।
वर्तमान शिक्षा प्रणाली में कौशल
विकास,
रोजगारोन्मुखता और वैश्विक प्रतिस्पर्धा पर विशेष बल दिया जा रहा
है। पाठ्यक्रमों को व्यावहारिक बनाने, तकनीकी दक्षता बढ़ाने
और विद्यार्थियों को बाज़ार की आवश्यकताओं के अनुरूप तैयार करने की प्रवृत्ति
स्पष्ट दिखाई देती है। इस दृष्टिकोण से शिक्षा को आर्थिक विकास से जोड़ने का
प्रयास किया जा रहा है, जिससे मानव संसाधन निर्माण को
प्राथमिकता मिलती है। नई शिक्षा नीतियाँ बहुविषयक अध्ययन, लचीलापन
और नवाचार की बात करती हैं, जो शिक्षा के पारंपरिक ढाँचे में
परिवर्तन का संकेत देती हैं।
इसके साथ ही समकालीन भारतीय शिक्षा
प्रणाली में अनेक संरचनात्मक चुनौतियाँ भी विद्यमान हैं। सरकारी और निजी शिक्षा
संस्थानों के बीच गुणवत्ता और संसाधनों का अंतर लगातार बढ़ रहा है। निजीकरण और
बाज़ारीकरण के कारण शिक्षा धीरे-धीरे सार्वजनिक अधिकार की बजाय सेवा या वस्तु के
रूप में देखी जाने लगी है। इसका प्रतिकूल प्रभाव आर्थिक और सामाजिक रूप से वंचित
वर्गों की शिक्षा तक पहुँच पर पड़ा है, जिससे समान अवसर का सिद्धांत
व्यवहार में कमजोर होता नज़र आता है।
ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच
शैक्षिक सुविधाओं की असमानता आज भी एक प्रमुख समस्या बनी हुई है। उच्च शिक्षा में
दलित, आदिवासी, पिछड़े वर्गों एवं महिलाओं की भागीदारी
अपेक्षाकृत सीमित है और ड्रॉप-आउट दर चिंता का विषय बनी हुई है। डिजिटल शिक्षा के
विस्तार के बावजूद डिजिटल विभाजन ने नई प्रकार की असमानता को जन्म दिया है,
जहाँ तकनीक तक पहुँच न होने के कारण अनेक विद्यार्थी शिक्षा की
मुख्यधारा से बाहर रहने पर मजबूर हैं।
समकालीन शिक्षा प्रणाली में
परीक्षा-केन्द्रित और अंकों-आधारित मूल्यांकन प्रणाली का प्रभाव भी जगजाहिर है, जिसके
कारण आलोचनात्मक चिंतन, नैतिक शिक्षा और सामाजिक संवेदनशीलता
जैसे पक्ष अपेक्षाकृत उपेक्षित रह जाते हैं। शिक्षा का दबाव और प्रतिस्पर्धा
विद्यार्थियों में मानसिक तनाव और असुरक्षा की भावना को भी जन्म दे रही है। इस
प्रकार वर्तमान भारतीय शिक्षा प्रणाली एक ओर विस्तार, नवाचार
और तकनीकी प्रगति का प्रतीक है, तो दूसरी ओर वह सामाजिक
न्याय, समानता और समावेशन जैसे मूलभूत उद्देश्यों को पूर्णतः
साकार करने के लिए अभी भी संघर्षरत दिखाई दे रही है।
अंबेडकर की शिक्षा-दृष्टि और वर्तमान
शिक्षा व्यवस्था:
तुलनात्मक विश्लेषण (Ambedkar's Vision
of Education and
the Contemporary Indian Education System:
A Comparative Analysis):
डॉ. भीमराव रामजी अंबेडकर की
शिक्षा-दृष्टि भारतीय समाज की ऐतिहासिक असमानताओं के संदर्भ में विकसित हुई थी।
उनका मानना था कि शिक्षा सामाजिक न्याय, समानता और लोकतांत्रिक चेतना
की स्थापना का सबसे प्रभावी माध्यम है। इसके विपरीत, वर्तमान
भारतीय शिक्षा व्यवस्था वैश्वीकरण, बाज़ारीकरण और
प्रतिस्पर्धा से प्रभावित दिखाई देती है। दोनों के बीच का अंतर निम्नलिखित बिंदुओं
के माध्यम से स्पष्ट किया जा सकता है—
1. शिक्षा का उद्देश्य (Aims
of Education):
अंबेडकर के अनुसार शिक्षा का मूल
उद्देश्य वंचित वर्गों को सामाजिक शोषण से मुक्त करना और उन्हें आत्मसम्मान तथा
बौद्धिक स्वायत्तता प्रदान करना है। वे शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन का साधन मानते
थे।
वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में शिक्षा
का उद्देश्य मुख्यतः रोजगार प्राप्ति, कौशल विकास और आर्थिक
उत्पादकता तक सीमित होता जा रहा है। सामाजिक चेतना और नैतिक मूल्यों का पक्ष
अपेक्षाकृत कमजोर पड़ गया है। जो कमजोर वर्गों के लिए अभिशाप साबित हो रही है।
2. समानता बनाम असमानता ( Equality
vs. Inequality):
अंबेडकर की शिक्षा-दृष्टि समान अवसरों
पर आधारित थी। वे ऐसी शिक्षा प्रणाली के पक्षधर थे जिसमें जाति, वर्ग,
लिंग, धर्म या क्षेत्र के आधार पर कोई भेदभाव
न हो।
वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में
संवैधानिक प्रावधानों के बावजूद संसाधनों का असमान वितरण स्पष्ट रूप से दिखाई देता
है। निजी और सरकारी शिक्षा संस्थानों के बीच बढ़ती खाई सामाजिक विषमता को और गहरा
कर रही है।
3. समावेशी दृष्टिकोण (Inclusive
Approach):
डॉ. अंबेडकर समावेशी शिक्षा के प्रबल
समर्थक थे। उनका मानना था कि यदि दलित, आदिवासी, पिछड़े वर्गों और महिलाओं को शिक्षा से वंचित रखा गया, तो लोकतंत्र अर्थहीन हो जाएगा।
वर्तमान शिक्षा प्रणाली में समावेशन
की बात तो की जाती है, किंतु व्यवहार में अनेक वंचित समूह उच्च
शिक्षा से बाहर रह जाते हैं। ड्रॉप-आउट दर और डिजिटल विभाजन इसकी प्रमुख समस्याएँ
हैं।
4. मूल्यपरक बनाम
बाज़ारोन्मुखी शिक्षा (Valuable vs. Market-Oriented Education):
डॉ. अंबेडकर की शिक्षा-दृष्टि नैतिकता, सामाजिक
उत्तरदायित्व और संवैधानिक मूल्यों पर आधारित थी।
इसके विपरीत, वर्तमान
शिक्षा व्यवस्था में बाज़ारोन्मुखता और प्रतिस्पर्धा हावी होती जा रही है, जिससे शिक्षा का मानवीय और सामाजिक पक्ष कमजोर होता जा रहा है।
5. लोकतंत्र और आलोचनात्मक
चेतना (Democracy and Critical Consciousness):
डॉ. अंबेडकर ऐसी शिक्षा के समर्थक थे
जो प्रश्न पूछने, तर्क करने और सत्ता की आलोचना करने की क्षमता
विकसित करे।
वर्तमान शिक्षा व्यवस्था प्रायः
परीक्षा-केन्द्रित और अंकों-आधारित है, जिससे आलोचनात्मक चिंतन के
लिए अपेक्षित स्थान सीमित हो गया है।
6.राज्य की भूमिका (Role
of State):
डॉ. अंबेडकर शिक्षा को राज्य की
प्रमुख जिम्मेदारी मानते थे और इसके व्यापक सार्वजनिक निवेश के पक्षधर थे।
वर्तमान परिदृश्य में शिक्षा के
क्षेत्र में निजीकरण बढ़ रहा है, जिससे शिक्षा का अधिकार धीरे-धीरे सेवा
या वस्तु के रूप में परिवर्तित होता दिखाई देता है।
यह तुलनात्मक विश्लेषण स्पष्ट करता है
कि वर्तमान भारतीय शिक्षा व्यवस्था और डॉ. अंबेडकर की शिक्षा-दृष्टि के बीच
वैचारिक अंतर गहरा है। यदि शिक्षा को वास्तव में सामाजिक न्याय और लोकतांत्रिक
सशक्तिकरण का माध्यम बनाना है, तो डॉ. अंबेडकर की शिक्षा-दृष्टि को
नीतिगत एवं व्यावहारिक स्तर
पर पुनः स्थापित करना अनिवार्य होगा।
आलोचनात्मक विवेचना (Critical
Discussion):
समकालीन भारतीय शिक्षा प्रणाली की
उपर्युक्त स्थिति का आलोचनात्मक विवेचन किया जाए तो यह स्पष्ट होता है कि शिक्षा
के क्षेत्र में मात्र संरचनात्मक विस्तार और नीतिगत सुधार अपने आप में पर्याप्त
नहीं हैं। यद्यपि विद्यालयों और विश्वविद्यालयों की संख्या में वृद्धि, डिजिटल
माध्यमों का प्रसार तथा पाठ्यक्रमों में आधुनिक विषयों का समावेश सकारात्मक पहलू
हैं, फिर भी ये परिवर्तन शिक्षा के मूल सामाजिक उद्देश्य को
पूरी तरह संबोधित नहीं कर पा रहे हैं। शिक्षा का झुकाव तेजी से बाज़ारोन्मुख होता
जा रहा है, जिससे उसका सार्वजनिक और मानवीय चरित्र कमजोर
पड़ता दिखाई देता है।
शिक्षा के बढ़ते निजीकरण ने समान अवसर
की अवधारणा को गंभीर चुनौती दी है। उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा अब बड़े पैमाने पर
आर्थिक क्षमता से जुड़ती जा रही है, जिसके परिणामस्वरूप वंचित और
हाशिए के वर्ग प्रतिस्पर्धा में पीछे छूटते जा रहे हैं। संवैधानिक प्रावधानों और
आरक्षण जैसी व्यवस्थाओं के बावजूद सामाजिक पृष्ठभूमि, आर्थिक
स्थिति और क्षेत्रीय असमानताएँ विद्यार्थियों की शैक्षिक उपलब्धियों को निर्णायक
रूप से प्रभावित कर रही हैं। इससे यह प्रश्न उठता है कि क्या वर्तमान शिक्षा
प्रणाली वास्तव में सामाजिक न्याय के लक्ष्य को साध रही है या केवल औपचारिक रूप से
उसे स्वीकार कर रही है।
परीक्षा-केन्द्रित और अंकों-आधारित
मूल्यांकन प्रणाली शिक्षा की गुणवत्ता पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालती है। इस
व्यवस्था में रचनात्मकता, आलोचनात्मक सोच और नैतिक विवेक के विकास के
लिए अपेक्षित स्थान नहीं मिल पा रहा है। विद्यार्थी ज्ञान को समझने और समाज से
जुड़ने के बजाय उसे केवल परीक्षा उत्तीर्ण करने के साधन के रूप में देखने लगते
हैं। यह प्रवृत्ति शिक्षा को जीवन और समाज से काटकर एक यांत्रिक प्रक्रिया में बदल
देती है।
डिजिटल शिक्षा को समावेशन का साधन
माना जा रहा है, किंतु वास्तविकता में डिजिटल विभाजन ने नई असमानताओं को
जन्म दिया है। तकनीक तक असमान पहुँच ने ग्रामीण, गरीब और
सामाजिक रूप से वंचित वर्गों के विद्यार्थियों को और अधिक हाशिए पर धकेलने का खतरा
उत्पन्न किया है। इस संदर्भ में यह कहना समीचीन होगा कि तकनीकी नवाचार तब तक
सार्थक नहीं हो सकते, जब तक वे सामाजिक समानता के ढाँचे के
साथ समन्वित न हो सकें।
समग्र रूप से देखा जाए तो समकालीन
भारतीय शिक्षा प्रणाली एक द्वंद्वात्मक स्थिति में दिखाई देती है। एक ओर वह
आधुनिकता,
कौशल और वैश्विक प्रतिस्पर्धा की भाषा बोलती है, वहीं दूसरी ओर सामाजिक न्याय, समावेशन और
लोकतांत्रिक चेतना जैसे मूल उद्देश्यों को व्यवहार में पूरी तरह साकार नहीं कर पा
रही है। यह स्थिति शिक्षा के मूल दर्शन पर पुनर्विचार की आवश्यकता को रेखांकित
करती है, जिससे शिक्षा को केवल आर्थिक विकास का उपकरण न
मानकर सामाजिक परिवर्तन और मानवीय उत्थान का माध्यम बनाया जा सके।
वर्तमान भारतीय शिक्षा प्रणाली में
संरचनात्मक सुधारों के बावजूद सामाजिक न्याय का लक्ष्य पूर्णतः प्राप्त नहीं हो
पाया है। नई शिक्षा नीतियाँ कौशल विकास और तकनीकी दक्षता पर बल देती हैं, किंतु
सामाजिक असमानताओं के मूल कारणों को पर्याप्त रूप से संबोधित नहीं करतीं। यह
स्थिति डॉ. अंबेडकर की समावेशी और मानवीय शिक्षा-दृष्टि के विपरीत है।
निष्कर्ष (Conclusion):
उपर्युक्त विवेचना के निष्कर्षस्वरूप
यह कहा जा सकता है कि समकालीन भारतीय शिक्षा प्रणाली में विस्तार, नवाचार
और नीतिगत सुधारों के बावजूद उसके मूल सामाजिक उद्देश्यों की पूर्ति अभी अधूरी है।
शिक्षा तक पहुँच बढ़ी है और संरचनात्मक स्तर पर अनेक परिवर्तन हुए हैं, किंतु ये परिवर्तन समानता, सामाजिक न्याय, बंधुत्व और लोकतांत्रिक चेतना को व्यवहारिक रूप से सुदृढ़ करने में
पर्याप्त सिद्ध नहीं हो पाए हैं। शिक्षा का बढ़ता निजीकरण, बाज़ारीकरण
और प्रतिस्पर्धात्मक स्वरूप उसके सार्वजनिक तथा मानवीय चरित्र को कमजोर करता दिखाई
देता है।
वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में अवसरों
की असमानता, संसाधनों का असंतुलित वितरण और परीक्षा-केन्द्रित
दृष्टिकोण ऐसी समस्याएँ हैं जो शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन के माध्यम के बजाय
व्यक्तिगत उपलब्धि तक सीमित कर देती हैं। तकनीकी और डिजिटल प्रगति के बावजूद
डिजिटल विभाजन ने यह स्पष्ट कर दिया है कि बिना सामाजिक संदर्भ को ध्यान में रखे
किए गए सुधार नई प्रकार की विषमताओं को जन्म दे सकते हैं। इस स्थिति में शिक्षा का
उद्देश्य ज्ञान, विवेक और सामाजिक संवेदनशीलता के विकास के
बजाय केवल रोजगारोन्मुख कौशल तक सिमटता जा रहा है।
अतः यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि
भारतीय शिक्षा प्रणाली को मात्र संरचनात्मक सुधारों से आगे बढ़कर वैचारिक और
मूल्यपरक पुनर्संरचना की आवश्यकता है। शिक्षा को समानता, समावेशन
और सामाजिक न्याय के मूल सिद्धांतों से पुनः जोड़ना अनिवार्य है। जब तक शिक्षा
व्यवस्था समाज के हाशिए पर खड़े वर्गों को केंद्र में रखकर नीति और व्यवहार दोनों
स्तरों पर कार्य नहीं करेगी, तब तक वह लोकतांत्रिक और
न्यायपूर्ण समाज के निर्माण में अपनी पूर्ण भूमिका निभाने में असमर्थ रहेगी।
संदर्भ ग्रंथ सूची :
1.अंबेडकर, भीमराव रामजी. (2014). जाति का विनाश. नई दिल्ली;
सम्यक प्रकाशन।
2.अंबेडकर, भीमराव रामजी. (2011). शिक्षा और समाज. नई दिल्ली;
समता प्रकाशन।
3.अंबेडकर, भीमराव रामजी. (1994). डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर:
संपूर्ण वाङ्मय (खंड 1–17). मुंबई: महाराष्ट्र शासन, सामाजिक न्याय विभाग।
4.कीर, धनंजय.
(2010). डॉ. अंबेडकर: जीवन और मिशन. मुंबई; पॉपुलर प्रकाशन।
5.Thorat, Sukhdev and Newman, Catherine
S.(2010). Blocked by Caste: Economic Discrimination in Modern India. New Delhi;
Oxford University Press.
6.Kumar, Krishna. (2005). Political Agenda
of Education: A Study of Colonialist and Nationalist Ideas. New Delhi; SAGE
Publications.
7.कुमार, कृष्ण. (2014). भारतीय शिक्षा का समाजशास्त्र. नई
दिल्ली; ओरिएंट ब्लैकस्वान।
8.सरकार, सुमित. (2012). आधुनिक भारत (1885–1947). नई दिल्ली; मैकमिलन इंडिया।
9.फुले, ज्योतिबा.
(2009). गुलामगिरी. पुणे; कॉन्टिनेंटल
प्रकाशन।
10.शाह, घनश्याम.
(2004). दलित और राज्य. नई दिल्ली; सेज
पब्लिकेशंस।
11.भारत सरकार. (2020).
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020. नई दिल्ली;
शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार।
12.Government of India. (2019). All India
Survey on Higher Education (AISHE). New Delhi; Ministry of Human Resource
Development (MHRD).
13.NCERT. (2018). भारतीय
शिक्षा का इतिहास. नई दिल्ली; राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और
प्रशिक्षण परिषद।
14.Sen, Amartya. (2000). Development as
Freedom. New Delhi; Oxford University Press.
15.Freire, Paulo. (1970). Pedagogy of the
Oppressed. New York; Continuum International Publishing Group।
16.Dewey, John. (1916). Democracy and
Education. New York; Macmillan Company।
17.Beteille, Andre. (2002). Inequality and
Social Change. New Delhi; Oxford University Press.
18.Nayak, J. P. (1983). Education and
National Development. New Delhi; Asian Publishing House.
19.UNESCO. (2015). Education 2030: Incheon
Declaration and Framework for Action. Paris; UNESCO Publishing.
20.Tiwari, Ramesh Chandra. (2011).
Philosophy of Education. New Delhi; Atlantic Publishers & Distributors.
2.अंबेडकर, भीमराव रामजी. (2011). शिक्षा और समाज. नई दिल्ली; समता प्रकाशन।
3.अंबेडकर, भीमराव रामजी. (1994). डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर: संपूर्ण वाङ्मय (खंड 1–17). मुंबई: महाराष्ट्र शासन, सामाजिक न्याय विभाग।
4.कीर, धनंजय. (2010). डॉ. अंबेडकर: जीवन और मिशन. मुंबई; पॉपुलर प्रकाशन।
5.Thorat, Sukhdev and Newman, Catherine S.(2010). Blocked by Caste: Economic Discrimination in Modern India. New Delhi; Oxford University Press.
6.Kumar, Krishna. (2005). Political Agenda of Education: A Study of Colonialist and Nationalist Ideas. New Delhi; SAGE Publications.
7.कुमार, कृष्ण. (2014). भारतीय शिक्षा का समाजशास्त्र. नई दिल्ली; ओरिएंट ब्लैकस्वान।
8.सरकार, सुमित. (2012). आधुनिक भारत (1885–1947). नई दिल्ली; मैकमिलन इंडिया।
9.फुले, ज्योतिबा. (2009). गुलामगिरी. पुणे; कॉन्टिनेंटल प्रकाशन।
10.शाह, घनश्याम. (2004). दलित और राज्य. नई दिल्ली; सेज पब्लिकेशंस।
11.भारत सरकार. (2020). राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020. नई दिल्ली; शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार।
12.Government of India. (2019). All India Survey on Higher Education (AISHE). New Delhi; Ministry of Human Resource Development (MHRD).
13.NCERT. (2018). भारतीय शिक्षा का इतिहास. नई दिल्ली; राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद।
14.Sen, Amartya. (2000). Development as Freedom. New Delhi; Oxford University Press.
15.Freire, Paulo. (1970). Pedagogy of the Oppressed. New York; Continuum International Publishing Group।
16.Dewey, John. (1916). Democracy and Education. New York; Macmillan Company।
17.Beteille, Andre. (2002). Inequality and Social Change. New Delhi; Oxford University Press.
18.Nayak, J. P. (1983). Education and National Development. New Delhi; Asian Publishing House.
19.UNESCO. (2015). Education 2030: Incheon Declaration and Framework for Action. Paris; UNESCO Publishing.
20.Tiwari, Ramesh Chandra. (2011). Philosophy of Education. New Delhi; Atlantic Publishers & Distributors.
0 Comments