डॉ. संजय कुमार1
Issue-33 Vol.-IV, Oct.-Dec 2025 Paper ID-33/4
सारांश (Abstract)
बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर भारतीय समाज में शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन, समानता, राष्ट्रीय एकता और लोकतांत्रिक चेतना का मूल आधार मानते थे। उनके विचार में शिक्षा केवल रोजगार प्राप्ति का साधन नहीं, बल्कि सामाजिक शोषण, जातिगत असमानता और बौद्धिक दासता से मुक्ति का प्रभावी उपकरण थी। प्रस्तुत शोध पत्र का उद्देश्य डॉ. अंबेडकर की शिक्षा-दृष्टि का सैद्धांतिक एवं दार्शनिक विश्लेषण करना तथा उसकी तुलना समकालीन भारतीय शिक्षा प्रणाली से करना है। अध्ययन से स्पष्ट होता है कि वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में विस्तार के बावजूद सामाजिक न्याय और समावेशन जैसे अंबेडकरवादी मूल्य पूर्णतः साकार नहीं हो पाए हैं।
मुख्य शब्द (Keywords)
डॉ. अंबेडकर, शिक्षा-दृष्टि, सामाजिक न्याय, भारतीय शिक्षा प्रणाली, समानता, लोकतंत्र
प्रस्तावना (Introduction)
शिक्षा किसी भी समाज की वैचारिक चेतना और सामाजिक संरचना को दिशा प्रदान करती है। भारतीय समाज ऐतिहासिक रूप से जाति, वर्ग, धर्म, क्षेत्र और लिंग आधारित असमानताओं से ग्रस्त रहा है। डॉ. भीमराव अंबेडकर ने शिक्षा को सामाजिक क्रांति का प्रमुख साधन माना।
शोध के उद्देश्य (Objectives of the Study)
- डॉ. अंबेडकर की शिक्षा-दृष्टि का दार्शनिक विश्लेषण करना।
- समकालीन भारतीय शिक्षा प्रणाली की संरचना का अध्ययन करना।
- दोनों के बीच तुलनात्मक अध्ययन करना।
- शिक्षा में सामाजिक न्याय की स्थिति का आलोचनात्मक मूल्यांकन करना।
शोध पद्धति (Research Methodology)
यह अध्ययन वर्णनात्मक एवं विश्लेषणात्मक शोध पद्धति पर आधारित है। प्राथमिक स्रोतों में डॉ. अंबेडकर के ग्रंथ, भाषण एवं संवैधानिक विचार तथा द्वितीयक स्रोतों में शोध-पत्र, पुस्तकें, सरकारी दस्तावेज और शिक्षा नीतियाँ सम्मिलित हैं।
डॉ. अंबेडकर की शिक्षा-दृष्टि
डॉ. अंबेडकर की शिक्षा-दृष्टि सामाजिक मुक्ति, मानवीय गरिमा और लोकतांत्रिक चेतना पर आधारित थी। वे शिक्षा को मानसिक गुलामी से मुक्ति का सबसे प्रभावी साधन मानते थे। उनके अनुसार जब तक वंचित वर्ग शिक्षित नहीं होंगे, तब तक लोकतंत्र का वास्तविक अर्थ साकार नहीं हो सकता।
समकालीन भारतीय शिक्षा प्रणाली का स्वरूप
समकालीन भारतीय शिक्षा प्रणाली बहुस्तरीय और परिवर्तनशील है। डिजिटल तकनीक, कौशल विकास और रोजगारोन्मुख शिक्षा पर बल दिया जा रहा है, किन्तु निजीकरण, क्षेत्रीय असमानता और डिजिटल विभाजन समान अवसर की अवधारणा को चुनौती दे रहे हैं।
अंबेडकर की शिक्षा-दृष्टि और वर्तमान शिक्षा व्यवस्था:
तुलनात्मक विश्लेषण
1. शिक्षा का उद्देश्य
अंबेडकर शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन का साधन मानते थे, जबकि वर्तमान शिक्षा व्यवस्था रोजगारोन्मुख होती जा रही है।
2. समानता बनाम असमानता
संवैधानिक प्रावधानों के बावजूद संसाधनों का असमान वितरण आज भी एक गंभीर समस्या है।
3. समावेशी दृष्टिकोण
अंबेडकर समावेशी शिक्षा के प्रबल समर्थक थे, जबकि व्यवहार में वंचित वर्ग उच्च शिक्षा से बाहर रह जाते हैं।
4. मूल्यपरक बनाम बाज़ारोन्मुखी शिक्षा
वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में बाज़ारोन्मुखता मानवीय मूल्यों को कमजोर कर रही है।
आलोचनात्मक विवेचना (Critical Discussion)
शिक्षा का बढ़ता निजीकरण, परीक्षा-केन्द्रित मूल्यांकन और डिजिटल विभाजन सामाजिक न्याय के लक्ष्य को कमजोर करता है। डॉ. अंबेडकर की शिक्षा-दृष्टि के आलोक में इन प्रवृत्तियों पर पुनर्विचार आवश्यक है।
निष्कर्ष (Conclusion)
भारतीय शिक्षा प्रणाली को संरचनात्मक सुधारों के साथ-साथ मूल्यपरक पुनर्संरचना की आवश्यकता है। डॉ. अंबेडकर की शिक्षा-दृष्टि आज भी समानता, समावेशन और लोकतांत्रिक चेतना के लिए मार्गदर्शक है।
संदर्भ ग्रंथ सूची (References)
- अंबेडकर, भीमराव रामजी (2014). जाति का विनाश. नई दिल्ली: सम्यक प्रकाशन।
- Ambedkar, B.R. (1994). Collected Works. Government of Maharashtra.
- Thorat, S. & Newman, C. (2010). Blocked by Caste. Oxford University Press.
- Government of India (2020). National Education Policy 2020.
- Freire, P. (1970). Pedagogy of the Oppressed. New York.

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