भोजपुरी संस्कृति में बासंतिक नवरात्रि : शास्त्रीय कर्म काण्ड नहीं. लोक आस्था, प्रकृति और जीवन का उत्सव

Culture | संस्कृति

Date : 25 January 2026   |   Author : अचल पुलस्तेय


Basantik Navratri: A Vibrant Tapestry of Bhojpuri Folk Culture and Faith

In the Bhojpuri region, Basantik Navratri is not merely a religious ritual but a vibrant cultural expression of folk life. Far from the confines of grand temples and complex classical doctrines, this festival is rooted in the spontaneous harmony of nature, rural landscapes, and human relationships. Here, the worship of the Goddess is inherently democratic and naturalistic, where earthen mounds (*pindis*) and trees are revered as the epicenters of divine power. A significant aspect of this festival is the tradition of *Bhikhiya*, where young village girls, personifying the Goddess, visit homes to seek offerings. This practice reinforces the respect for feminine power and strengthens communal harmony. Through folk songs, knowledge of natural cycles and flora is passed down, reflecting a profound bond between humanity and the environment. Economically, the festival is unique; the grain collected by the girls funds the collective celebrations, serving as a prime example of a self-reliant, folk-based economy. The fairs held on Navami showcase social integration, with active participation from both Hindu and Muslim communities across various castes. While practices like exorcism by *Sokhas* may appear as superstition to the modern eye, they function as a form of psychological healing for a marginalized populace. Ultimately, the narrative distinguishes between institutionalized religion and independent folk faith. While institutional religion is often governed by authority and rigid rules, folk faith remains free, intuitive, and deeply human. In an era of market-driven changes and political distortions, these folk traditions act as a resilient shield, preserving the fundamental soul and vitality of society.


भोजपुरी अंचल में मनाया जाने वाला बासंतिक नवरात्रि केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि लोकजीवन की जीवंत सांस्कृतिक अभिव्यक्ति है। यह उत्सव खेत-खलिहानों, बाग-बगीचों, नदी-तालाबों और ग्राम्य जीवन की सामूहिक चेतना से गहराई से जुड़ा हुआ है। प्रस्तुत प्रसंग में यह स्पष्ट रूप से दिखाई देता है कि यहाँ देवी-उपासना किसी भव्य मंदिर या शास्त्रीय कर्मकाण्ड तक सीमित नहीं, बल्कि लोक की सहज आस्था, प्रकृति के साथ सहजीवन और सामुदायिक सहभागिता का प्रतीक है। बासंतिक नवरात्रि की शुरुआत के साथ ही गाँव की कुँवारी कन्याओं को देवी का स्वरूप माना जाता है। वे भोर में घर-घर जाकर “भिखिया” माँगती हैं—पर यह भिक्षा मात्र अनाज संग्रह नहीं, बल्कि आशीर्वाद देने और लेने की एक सांस्कृतिक प्रक्रिया है। गीतों में वर्णित “शीतला मइया माँगेली भिखिया” इस विश्वास को पुष्ट करता है कि देवी स्वयं बालिका रूप में गाँव-गाँव विचरण करती हैं। यह परम्परा स्त्री-शक्ति के सम्मान, बालिका के पवित्र रूप और सामुदायिक समरसता को स्थापित करती है। पूरे अनुष्ठान में लोकगीतों की केंद्रीय भूमिका है। “कवन फूल फूले सँझवरिया…” जैसे गीत केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि प्रकृति के चक्र, फूलों के खिलने के समय और देवी को अर्पण की परंपरा का सांस्कृतिक ज्ञान भी देते हैं। फूल चुनने की प्रक्रिया में लड़कियाँ खेतों, बागों, नदी किनारों से गुजरती हैं—यह मनुष्य और प्रकृति के गहरे संबंध का प्रतीक है।

कन्याओं द्वारा एकत्रित अनाज को बाद में बेचकर पूजा का आयोजन किया जाता है। यह एक प्रकार की लोक-आधारित अर्थव्यवस्था है, जहाँ बिना किसी औपचारिक संस्था के पूरा आयोजन सम्पन्न होता है। यह परंपरा आत्मनिर्भरता, सहयोग और सामूहिक उत्तरदायित्व की भावना को विकसित करती है। वामति माई, शीतला माई, काली थान जैसे स्थान किसी भव्य स्थापत्य के बजाय प्राकृतिक परिवेश—पेड़, मिट्टी की पिण्डी और खुले आकाश—में स्थित होते हैं। यहाँ पूजा में कोई कठोर नियम नहीं—न शुद्धि-अशुद्धि का आग्रह, न जाति-वर्ण का भेद। हर व्यक्ति अपनी भाषा, अपने गीत और अपनी शैली में देवी से संवाद करता है। यह लोकधर्म की उस उदार परंपरा को दर्शाता है, जहाँ आस्था व्यक्तिगत और स्वतंत्र है।

समय देवी थान-ग्राम पड़ौली,जिला-गोरखपुर उप्र

नवमी के दिन लगने वाला मेला इस उत्सव का चरम होता है। यह मेला केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि ग्रामीण जीवन का बहुआयामी उत्सव है—व्यापार, मनोरंजन और सामाजिक मेलजोल का संगम। यहाँ हिन्दू-मुस्लिम, विभिन्न जातियों और समुदायों की समान भागीदारी दिखाई देती है, जो सामाजिक समरसता का प्रतीक है।

देवरिया (उप्र) ग्राम तिवई में बासंतिक नवरात्रि का बलिदान मेला

मेले में सोखा, तांत्रिक, गुनी द्वारा “भूत-प्रेत उतारने” की प्रक्रिया भी देखी जाती है। आधुनिक दृष्टि से इसे अंधविश्वास कहा जा सकता है, परन्तु सामाजिक-मानसिक स्तर पर यह लोक-चिकित्सा का एक रूप है। यह उन लोगों के लिए मनोवैज्ञानिक सहारा बनता है, जो अभाव, असुरक्षा और मानसिक तनाव से जूझ रहे होते हैं। कुछ स्थानों पर पशु-बलि की परंपरा भी दिखाई देती है, जो शक्ति-उपासना से जुड़ी प्राचीन मान्यता का हिस्सा है। यह पहलू विवादास्पद होते हुए भी लोकविश्वास की जटिलता और विविधता को दर्शाता है, जहाँ जीवन, मृत्यु और शक्ति की अवधारणाएँ एक साथ उपस्थित रहती हैं।
देवरिया (उप्र) में वामति माई थान पर भूत प्रेत निवारण करता एक सोखा

इस पूरे परिदृश्य में एक महत्वपूर्ण बात उभरकर आती है—लोकधर्म और औपचारिक, संस्थागत धर्म के बीच का अंतर। जहाँ बड़े मंदिर, ट्रस्ट और धार्मिक संस्थाएँ नियमों, व्यवस्थाओं और कभी-कभी सत्ता से संचालित होती हैं, वहीं यह लोक आस्था पूरी तरह स्वतंत्र, सहज और मानवीय है। यहाँ कोई मध्यस्थ नहीं—व्यक्ति सीधे देवी से संवाद करता है।

भोजपुरी संस्कृति में बासंतिक नवरात्रि प्रकृति, स्त्री-शक्ति, सामुदायिक जीवन और लोकविश्वास का अद्भुत संगम है। यह उत्सव हमें याद दिलाता है कि धर्म केवल शास्त्रों और मंदिरों में नहीं, बल्कि लोकगीतों, परम्पराओं, रिश्तों और प्रकृति के साथ हमारे जुड़ाव में भी जीवित रहता है। आज जब आधुनिकता और बाज़ारवाद के दबाव में लोक परम्पराएँ हाशिए पर जा रही हैं, तब ऐसे उत्सव न केवल सांस्कृतिक धरोहर हैं, बल्कि समाज की आत्मा को जीवित रखने वाले आधार भी हैं। आज संस्थागत धर्म सत्ता के साथ मिलकर मौलिक, प्राकृतिक धर्म को विकृत कर उसे एक राजनीतिक औजार में बदलने की कोशिश में है। बाजार और संस्थागत धर्म के इस दबाव के बावजूद लोक अपने स्वभाव, अपनी लय और अपने रौ में अब भी बह रहा है—यही इसकी सबसे बड़ी जीवटता और आशा है।


Culture Archive
Related Articles
Author
डॉ.आर.अचल पुलस्तेय

डॉ. आर. अचल पुलस्तेय एक बहु-विषयक विद्वान, लेखक और शोधकर्ता हैं, जिनका कार्य क्षेत्र सांस्कृतिक अध्ययन, इतिहास, साहित्य और स्वदेशी ज्ञान प्रणालियों तक विस्तृत है। उनके लेखन में परंपरा, समाज और वैज्ञानिक चिंतन के अंतर्संबंधों की पड़ताल की गई है।
https://orcid.org/0009-0002-8240-2689

Post a Comment

2 Comments

Anonymous said…
बचपन से नवमी के नाम से मशहूर परम्परागत त्योहार को देखते आ रहे हैं। सदैव से सबके लिए उत्साह और उल्लास का पर्व रहा है। इसी दिन से कलश से ठंडा पानी पीने को मिलता था। उस समय यही फ्रिज का‌ पानी था।
ज़माने के हिसाब से परिवर्तित और जमाने से प्रभावित होकर बाजारीकरण के कारण, कुछ कट्टरपंथी लोगों के कारण आमूलचूल परिवर्तन हो रहा है। जनसमुदाय का यह पर्व अब वर्ग और वर्ण विशेष का त्योहार हो रहा है।

बहुत सुंदर जानकारी देने के लिए साधुवाद 🎉🎉
धन्यवाद आभार,निरंतर पढ़कर प्रोत्साहित करते रहें